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Russia-Ukraine War : भारतीय छात्र MBBS की पढ़ाई करने क्यों जाते हैं विदेश, जानिए क्या है असली वजह

Janjwar Desk
1 March 2022 9:02 AM GMT
Russia-Ukraine War : भारतीय छात्र MBBS की पढ़ाई करने क्यों जाते हैं विदेश, जानिए क्या है असली वजह
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Russia-Ukraine War : भारत से हजारों छात्र हर साल चिकित्सा की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं। इस प्रवृत्ति के पीछे एक प्रमुख कारक यह है कि कई अन्य देशों में एमबीबीएस करना अपेक्षाकृत सस्ता है.....

दिनकर कुमार की रिपोर्ट

Russia-Ukraine War : यूक्रेन पर रुस के हमले के बाद यूक्रेन (Ukraine) में एमबीबीएस (MBBS) की पढ़ाई कर रहे हजारों भारतीय छात्रों की सुरक्षित स्वदेश वापसी करवाने में नाकाम रही मोदी सरकार (Modi Govt) की जगहंसाई हो रही है। शर्म महसूस कर देश से माफी मांगने की जगह पीएम मोदी (Narendra Modi) ने भारतीय छात्रों को पढ़ने के लिए विदेश न जाने की नसीहत दे डाली है और उनके अविवेकी भक्त वॉट्सऐप विश्वविद्यालय पर ऐसे छात्रों के माता पिता को कोसने में जुट गए हैं। अगर सस्ती मेडिकल शिक्षा (Medical Education) का ढांचा भारत में तैयार किया गया होता तो भारतीय छात्रों को विदेश जाने की जरूरत नहीं होती। लेकिन मोदी सरकार को ऊंची मूर्तियां बनाने से ही फुर्सत नहीं मिल रही है और शिक्षा उसकी प्राथमिकता में शामिल नहीं है।

भारत से हजारों छात्र हर साल चिकित्सा की पढ़ाई के लिए विदेश जाते हैं। इस प्रवृत्ति के पीछे एक प्रमुख कारक यह है कि कई अन्य देशों में एमबीबीएस करना अपेक्षाकृत सस्ता है। लेकिन एक तथ्य यह भी है कि भारत के मेडिकल कॉलेजों (Medical Colleges In India) की तुलना में इन विदेशी कॉलेजों में से एक में प्रवेश करना आसान है। भारत में सीमित सीटों के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा है।

पूरे एमबीबीएस कोर्स की फीस, जो आम तौर पर विदेश में छह साल की होती है, जिसमें रहने का खर्च और भारत लौटने पर स्क्रीनिंग टेस्ट को पास करने के लिए कोचिंग की लागत शामिल है, इन देशों में से एक में काफी अच्छे कॉलेज में लगभग 35 लाख रुपये खर्च होंगे। इसकी तुलना में, भारत में निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस पाठ्यक्रम के लिए केवल ट्यूशन फीस आमतौर पर 45 लाख रुपये से 55 लाख रुपये या इससे भी अधिक खर्च होती है।

ऐसा अनुमान है कि हर साल 20,000-25,000 छात्र चिकित्सा का अध्ययन करने के लिए विदेश जाते हैं। जबकि सामर्थ्य एक कारक है, स्पष्ट रूप से मेडिकल सीटों में मांग-आपूर्ति का अंतर उतना ही एक कारण है। चिकित्सा के लिए प्रवेश परीक्षा नीट के माध्यम से अर्हता प्राप्त करने वाले सात से आठ लाख छात्रों के लिए भारत में केवल 90,000 से अधिक सीटें हैं।

आधी से कुछ अधिक सीटें सरकारी कॉलेजों में हैं, जो कि सस्ती हो सकती हैं, लेकिन जब तक किसी का नीट स्कोर बहुत अधिक न हो, तब तक उसमें प्रवेश पाना बेहद मुश्किल है। यहां तक ​​​​कि निजी मेडिकल कॉलेजों में सरकारी कोटे की सीटें, जो प्रबंधन कोटे की सीटों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक सस्ती हैं, के लिए उच्च नीट स्कोर की आवश्यकता होती है।

इनके अलावा निजी कॉलेजों में प्रबंधन कोटे की करीब 20,000 सीटें ही उपलब्ध हैं।

एनआरआई कोटा सैद्धांतिक रूप से उन लोगों के लिए भी खुला है जो अनिवासी नहीं हैं यदि वे एक एनआरआई द्वारा प्रायोजित हैं, लेकिन उच्च शुल्क का मतलब है कि वे सभी की पहुंच से बाहर हैं। अकेले प्रबंधन और एनआरआई कोटा सीटों के लिए फीस लगभग 30 लाख रुपये से लेकर 1. 2 करोड़ रुपये से अधिक पूरे 5 साल के कोर्स के लिए है।

"भारत में कई निजी मेडिकल कॉलेजों के छात्र और विदेशी मेडिकल स्नातक जिन्होंने स्क्रीनिंग टेस्ट पास किया है, वे हमारे अस्पताल में इंटर्नशिप करते हैं। स्नातकों की गुणवत्ता में इतना अंतर नहीं है। भारतीय निजी मेडिकल कॉलेजों के स्नातकों की तरह ही विदेशी स्नातकों में भी बेहद खराब गुणवत्ता वाले स्नातक हैं। लेकिन निश्चित रूप से, हमें केवल उन विदेशी स्नातकों को प्रशिक्षण देना पड़ता है जिन्होंने स्क्रीनिंग टेस्ट पास किया है, "एक अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक ने कहा, जो विदेशी छात्रों के लिए इंटर्नशिप करने के लिए पहचाने गए अस्पतालों के पैनल का हिस्सा है।

"स्क्रीनिंग टेस्ट कठिन है और मुझे नहीं लगता कि कई एमबीबीएस छात्र, विशेष रूप से भारत में निजी मेडिकल कॉलेजों के खराब प्रशिक्षण और शिक्षण के साथ, इस परीक्षा को पास करेंगे। 2023 में शुरू होने वाले सभी एमबीबीएस स्नातकों के लिए प्रस्तावित लाइसेंसिंग परीक्षा, यदि भारतीय और विदेशी प्रशिक्षित छात्रों के लिए समान है, तो इसका खुलासा हो जाएगा। यही कारण है कि एक सामान्य परीक्षा लागू करने से रोकने के लिए एक ठोस प्रयास किया जा रहा है। एक बार जब यह स्पष्ट हो जाता है कि विदेशों में पढ़ने वाले छात्र भारत में खराब गुणवत्ता वाले मेडिकल कॉलेजों में भी उतना ही बुरा करते हैं, तो भारत में उनमें से कई को अपनी दुकान बंद करनी होगी क्योंकि विदेशी विश्वविद्यालयों की तरफ और भी बड़ा पलायन होगा, "भारत में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज के एक सदस्य ने कहा।

"विदेश में भी खराब गुणवत्ता वाले मेडिकल कॉलेज हैं। भारतीय छात्र अक्सर पर्याप्त शोध नहीं करते हैं या अनैतिक सलाहकारों द्वारा बहकाए जाते हैं और ऐसी जगहों पर पहुंच जाते हैं। ये छात्र बार-बार स्क्रीनिंग टेस्ट को पास करने में विफल होते हैं और अंत में अस्पताल प्रशासन में मास्टर्स जैसे कोर्स करने के लिए स्ट्रीम बदलते हैं। एक लाइसेंस परीक्षा यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसे छात्रों को अभ्यास करने का लाइसेंस न मिले। लेकिन परीक्षा सभी भारतीय और विदेशी स्नातकों के लिए समान होनी चाहिए, "एक वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा, जो अक्सर भारतीय छात्रों को पढ़ाने के लिए विदेशों में विभिन्न विश्वविद्यालयों की यात्रा करते हैं।

यूक्रेन से किए जाने वाले एमबीबीएस की दुनियाभर में मान्‍यता है। इंडियन मेडिकल काउंसिल, वर्ल्‍ड हेल्‍थ काउंस‍िल, यूरोप और यूके में यहां की डिग्री की वैल्‍यू है। इस तरह यहां से एमबीबीएस करने वाले स्‍टूडेंट्स को दुनिया के ज्‍यादातर देशों में काम करने का मौका मिलता है।भारतीय स्‍टूडेंट्स के यूक्रेन से एमबीबीएस करने की यह भी एक बड़ी वजह है।

भारत के प्राइवेट संस्‍थानों में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए सालाना 10 से 12 लाख रुपये फीस ली जाती है। करीब 5 साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए स्‍टूडेंट्स को 50 से 60 लाख रुपए तक फीस चुकानी पड़ती है, जबकि यूक्रेन में ऐसा नहीं है। यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए सालाना 4 से 5 लाख रुपए की जरूरत होती है। यानी 5 साल तक पढ़ाई पूरी करने का कुल खर्च भारत के मुकाबले काफी कम है।

देश में एमबीबीएस में दाखि‍ले के लिए नीट का आयोजन किया जाता है। परीक्षा में मिले अंकों के आधार पर स्‍टूडेंट्स को सरकारी और प्राइवेट कॉलेज में एडमिशन दिया जाता है। भारत में दाखिले के लिए नीट का स्‍कोर काफी मायने रखता है जबकि यूक्रेन में स्‍टूडेंट्स का नीट क्‍वालिफाई करना ही बड़ी शर्त है। अंक उतने मायने नहीं रखते, इसलिए भी भारतीय स्‍टूडेंट्स एमबीबीएस के लिए यूक्रेन का रुख करते हैं।

एमबीबीएस करने वाले एक स्‍टूडेंट का कहना है, भारत में एमबीबीएस के लिए जितनी भी सीटें हैं उससे कई गुना अध‍िक स्‍टूडेंट्स नीट परीक्षा में बैठते हैं। सीटों की कमी के कारण जो स्‍टूडेंट्स यहां दाखिला नहीं ले पाते हैं उनके पास यूक्रेन का विकल्‍प रहता है। यूक्रेन से एमबीबीएस करने वाले ऐसे स्‍टूडेंट्स की संख्‍या भी कम नहीं है।

यूक्रेन में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे एक स्‍टूडेंट का कहना है, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के मामले में यूक्रेन बेहतर है। इसलिए भी यहां स्‍टूडेंट्स पहुंचते हैं। हालांकि भारत की तरह यहां भी बेहतर प्रैक्टिकल एक्‍सपोजर मिलता है। इस तरह यूक्रेन में एमबीबीएस करने की कई वजह हैं, जिसे स्‍टूडेंट्स अपनी स्‍थ‍िति के मुताबिक तय करते हैं।

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