वेनेजुएला पर अमरीकी हमला : साम्राज्यवाद का एक और नंगा चेहरा—लोकतंत्र, मानवाधिकार और स्थिरता जैसे शब्द सिर्फ़ अमरीका के मुखौटे

धर्मेन्द्र आज़ाद की टिप्पणी
2 जनवरी 2026 की देर रात, अमरीका ने वेनेजुएला पर हवाई हमलों के ज़रिये न सिर्फ़ एक संप्रभु देश की सीमाओं का उल्लंघन किया, बल्कि दुनिया पर एक और युद्ध थोपने का दुस्साहस किया। इसके बाद वेनेजुएला में देशव्यापी आपातकाल घोषित किया गया और आम जनता भय, अनिश्चितता और तनाव के माहौल में धकेल दी गई।
यह हमला कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह दशकों से चली आ रही उस अमरीकी साम्राज्यवादी नीति की अगली कड़ी है, जिसके तहत स्वतंत्र देशों की संप्रभुता को रौंदना, उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति को तोड़ना और उनके संसाधनों पर कब्ज़ा जमाना एक स्थापित रणनीति रही है। एक बार फिर यह साफ़ हो गया है कि “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “स्थिरता” जैसे शब्द अमरीकी सत्ता के लिए सिर्फ़ मुखौटे हैं—असल लक्ष्य है संसाधनों पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक वर्चस्व।
वेनेजुएला का असली “अपराध” यही है कि उसके पास अपार प्राकृतिक संपदा है—तेल, गैस और खनिज—और उसने यह कहने की हिम्मत की है कि इन पर पहला हक़ उसकी जनता का है, न कि विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों का। जैसे ही कोई देश वैश्विक मुनाफ़ाखोर व्यवस्था के आगे झुकने से इंकार करता है, उसके ख़िलाफ़ एक जानी-पहचानी पटकथा लागू कर दी जाती है—पहले आर्थिक प्रतिबंध, फिर वित्तीय नाकेबंदी, फिर राजनीतिक अस्थिरता, और अंततः खुली सैन्य हिंसा को “अंतिम समाधान” की तरह पेश किया जाता है।
यह हमला यह भी उजागर करता है कि आज के युद्ध केवल सीमा रेखाओं पर नहीं लड़े जाते। प्रतिबंध, मुद्रा संकट, बैंकिंग सिस्टम पर दबाव, मीडिया प्रोपेगैंडा और सत्ता परिवर्तन की साज़िशें—ये सब उसी युद्ध के आधुनिक हथियार हैं। जब ये तमाम औज़ार जनता को झुकाने में नाकाम हो जाते हैं, तब बम और मिसाइलें बोलने लगती हैं।
जिसे “लोकतंत्र की रक्षा” कहा जाता है, वह दरअसल मुनाफ़े की व्यवस्था की रक्षा होती है। जिसे “मानवाधिकार” का नाम दिया जाता है, वह अक्सर चुनिंदा कॉरपोरेट हितों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला राजनीतिक औज़ार बन जाता है। और जिसे “स्थिरता” कहा जाता है, उसका वास्तविक अर्थ होता है—ऐसी व्यवस्था जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निर्बाध लूट जारी रख सकें, चाहे उसकी कीमत आम जनता को भूख, बेरोज़गारी, हिंसा और असुरक्षा के रूप में क्यों न चुकानी पड़े।
वेनेजुएला पर हमला यह भी साबित करता है कि आज की दुनिया में राज्य सत्ता और कॉरपोरेट ताक़तें एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सैन्य शक्ति, कूटनीति और आर्थिक नीतियाँ—सब एक ही दिशा में काम करती हैं: वैश्विक असमानता को बनाए रखने और मेहनतकश बहुसंख्यक को लगातार संकट में धकेलने के लिए।
यह कोई नई कहानी नहीं है। लैटिन अमरीका का इतिहास अमेरिकी हमलों और गुण्डागर्दी से भरा पड़ा है—चिली से निकारागुआ तक, क्यूबा से बोलिविया तक। हर जगह वही कहानी दोहराई गई: पहले आर्थिक नाकेबंदी, फिर आंतरिक अराजकता, फिर “तानाशाही” और “लोकतंत्र संकट” का शोर, और अंत में सैन्य या अर्धसैन्य दख़ल। हर बार इसकी क़ीमत आम लोगों ने चुकाई-गरीबी, पलायन, हिंसा और तबाही के रूप में।
वेनेजुएला पर किया गया यह हमला न केवल अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन है, बल्कि उस बुनियादी सिद्धांत पर भी सीधा प्रहार है कि हर देश को अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार है। किसी भी बाहरी ताक़त को यह हक़ नहीं कि वह बमों, प्रतिबंधों और धमकियों के ज़रिये यह तय करे कि किसी देश की जनता कैसे जिए।
इतिहास साफ़ बताता है कि ऐसी आक्रामक नीतियाँ कभी शांति नहीं लातीं। वे केवल आक्रोश, प्रतिरोध और संघर्ष को जन्म देती हैं। वेनेजुएला की जनता पर हमला दरअसल हर उस समाज पर हमला है, जो अपने संसाधनों, अपने श्रम और अपने भविष्य पर अपना अधिकार चाहता है।
इसीलिए वेनेजुएला के साथ खड़ा होना सिर्फ़ किसी एक देश के समर्थन का सवाल नहीं है। यह उस पूरी वैश्विक व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़े होने का सवाल है, जो युद्ध, लूट और असमानता को “सामान्य नियम” बना चुकी है। जब तक इस व्यवस्था को निर्णायक चुनौती नहीं दी जाती, तब तक वेनेजुएला जैसे हमले अपवाद नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाई बने रहेंगे।











