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फादर इन डिसेंडेंट्स आउट मॉडल से सुलझेंगे नौकरियों में आरक्षण के कई पेंच, जानिये कैसे

Janjwar Desk
15 Nov 2022 6:33 AM GMT
फादर इन डिसेंडेंट्स आउट मॉडल से सुलझेंगे नौकरियों में आरक्षण के कई पेंच, जानिये कैसे
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जब अधिकांश परिवार सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक दृष्टि से समुन्नत होंगे तो समाज में छूआछूत की बीमारियां एवं गरीबी /बेरोजगारी के चलते होने वाले अपराधों पर भी खुद ब खुद अंकुश लगता दिखेगा....

राजेश पाठक की टिप्पणी

अभी हाल में मेजर सिन्हो कमीशन (2006-2010) की अनुशंसा पर 103 वें संविधान संशोधन कानून,2019 द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ई डब्ल्यू एस) के लिए उच्च शिक्षा व लोक नियोजन में 10 फीसदी आरक्षण कोटा बरक़रार रखने/नहीं रखने के मामले में शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में इस आरक्षण कोटा को बरकरार रखने को जायज ठहराया है। साथ ही अपने फैसले में यह भी कहा है कि आजादी के 75 साल बाद आरक्षण पर फिर से विचार किए जाने की जरूरत है।

फैसले का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है कि इतने वर्षों के बाद भी इस व्यवस्था के कायम रहने के न केवल सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक निहितार्थ बल्कि राजनीतिक निहितार्थ भी हैं।

नौकरियों में आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर तबकों के साथ-साथ अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग समूहों को समुन्नत एवं सुदृढ़ करना रहा है। परंतु भारत में वर्तमान आरक्षण प्रणाली से आरक्षण प्राप्त कुछ परिवार अधिक समुन्नत एवं सुदृढ़ हो जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर कई ऐसे परिवार है जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त भी है तो वे आरक्षण प्राप्त वर्गों से ही प्रतियोगिता करने में पिछड़ जाते हैं। कारण स्पष्ट है। आरक्षित श्रेणी में आने वाले ढ़ेर सारे परिवार ऐसे हैं जहां आरक्षण के आधार पर एक ही परिवार में अर्थात् पिता एवं उनके एक से अधिक संतानों को विभिन्न श्रेणियों की नौकरियां प्राप्त हुई हैं।

दूसरी ओर आरक्षित श्रेणियों के ऐसे भी परिवार बहुतायत संख्या में हैं, जहां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 एवं 16 के तहत प्राप्त आरक्षण की सुविधाओं का उपभोग करते हुए भी एक भी श्रेणी की नौकरी प्राप्त नहीं हो सकी।

परिणामस्वरूप आरक्षण व्यवस्था के मूलभूत उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति नहीं हो सकी है। साथ ही सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर वर्ग एवं अनुसूचित जाति/जनजाति का एक बड़ा तबका अब तक समुन्नत एवं सुदृढ़ नही हो पाया है।

दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से आरक्षित वर्ग का स्वयं ही विभाजन हो गया जिसमें एक वर्ग सुदृढ़ एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग एवं दूसरा वर्ग कमजोर एस सी/एस टी/बी सी वर्ग का समाज में उदय हो गया।

कौन है सुदृढ़ समुन्नत एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग ?

नौकरियों में आरक्षण का अनवरत लाभ प्राप्त कर एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों में से जब एक सदस्य को नौकरी प्राप्त हुई तो उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति थोड़ी सुदृढ़ हुई। उस सुदृढ़ता का लाभ उठाते हुए उनके बच्चे ने भी बहुत ही आसानी से पिता के समकक्ष या कमतर स्तर की नौकरियां प्राप्त कर लेने में सहज महसूस किया व परिणामस्वरूप प्रगतिशील एवं समुन्नत होते हुए चले गए। परन्तु यहां ध्यान देने योग्य बातें हैं कि आरक्षण व्यवस्था का मूलभूत उद्देश्य सामाजिक शैक्षणिक दृष्टि से कमजोर माने जाने वाले वर्ग एवं एससी/एसटी वर्ग का लगभग समरूप उन्नति एवं विकास रहा है, परंतु वर्तमान आरक्षण प्रणाली इस उद्देश्य को प्राप्त करने में चूकती रही है।

अगर किसी खास या सामान्य कारणवश एससी/एसटी/ओबीसी वर्ग का एक बड़ा तबका आरक्षण से होने वाले लाभों को अपने में समाहित कर किसी भी श्रेणी में नौकरी प्राप्त नहीं कर सका तो इस दिशा में भारतीय संविधान में अनुच्छेद 338,338 क एवं 340 के अर्न्तगत गठित क्रमशः राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एवं पिछडा वर्ग आयोग स्तर पर शोध कर उन वास्तविकताओं की खोज निष्पक्षता के साथ की जानी थी जिसमें आरक्षण से होने वाले वास्तविक लाभों को सभी परिवारों तक पहुंचाया जा सकता था।

उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में आरक्षण की मौजूदा प्रणाली में आवश्यक संशोधन कर के मेरे द्वारा सुझाए गये मॉडल फादर इन डिसेंडेंट्स आउट माडल को अपनाए जाने से संविधान द्वारा प्रदत्त नौकरियों में आरक्षण की असंगत व्यवस्थाओं से आसानी से निबटा जा सकता है। चाहिए तो सिर्फ दृढ राजनीतिक इच्छा-शक्ति और कुछ नहीं।

क्या है फादर इन डिसेंडेंट्स आउट मॉडल?

सर्वप्रथम यह मॉडल सरकार द्वारा प्रदत्त की जाने वाली सभी प्रकार की नौकरियों को श्रेणियों में विभाजन करता है। यथा श्रेणी ए बी सी डी। नौकरियों का विभिन्न श्रेणियों में विभाजन सर्वप्रथम प्रत्येक राज्य अपनी- अपनी अधिकारिता वाले नौकरियों में करता है। पुनः प्रत्येक राज्य अपने द्वारा निर्धारित श्रेणियों का फिटमेंट केन्द्रीय सरकार द्वारा आवंटित की जाने वाली नौकरियों के साथ करता है और तब जाकर राज्य एवं केन्द्रीय स्तर पर प्रदत्त की जानेवाली नौकरियों की श्रेणियों में श्रेणीगत एकरूपता तय की जाती है।

नौकरियों की श्रेणीगत एकरूपता तय कर लिए जाने के बाद आरक्षण प्रदान करने के लिए परम मापक इकाई तय की जाती है। इसकी इकाई नौकरियों में आरक्षण प्राप्त करने वाले व्यक्ति का पिता होता है। इस मॉडल के अनुसरण करने से जब किसी उम्मीदवार के पिता को आरक्षण का लाभ प्राप्त करते हुए अगर श्रेणी - डी की नौकरी प्राप्त हुई हो तो उनकी संतान (पुत्र/पुत्री) श्रेणी - डी की नौकरियों में प्राप्त होने वाले आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिये जाते हैं परन्तु इसके विपरीत श्रेणी- सी,बी एवं ए की नौकरियों मेें आरक्षण प्राप्त करने का अवसर विद्यमान रहता है।

इसी प्रकार अगर आवेदक के पिता आरक्षण के आधार पर श्रेणी- सी की नौकरी प्राप्त कर चुके हों तो उनकी संतान श्रेणी- सी से, अगर उनके पिता श्रेणी-बी की नौकरी आरक्षण के आधार पर प्राप्त कर चुके हों तो उनकी संतान श्रेणी- बी के आरक्षण की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं।

यहां ध्यान देने योग्य बातें हैं कि अगर आवेदक के पिता श्रेणी- ए की उच्चतम स्तर की नौकरी आरक्षण के आधार पर प्राप्त करते हैं तो उनकी संतान को किसी भी श्रेणी की नौकरियों में आरक्षण का लाभ नही मिलता है।

क्या हैं मॉडल से लाभ ?

इस मॉडल को अपनाने से आरक्षण व्यवस्था के लाभों का लगभग समरूप प्रसार एवं विस्तार आरक्षण प्राप्त कर रहे लोगों के बीच होगा एवं उसका लाभ उन परिवारों से हटकर अलग परिवारों में जा सकेगा जो आरक्षण का लाभ उठाते हुए अबतक किसी भी श्रेणी की नौकरी प्राप्त करने में सफल नहीं रहे हों। एक अनुमान के अनुसार यदि यह मॉडल प्रयोग में लाया जाता है तो आने वाले 10 वर्षो में सभी आरक्षित संवर्ग परिवारों को किसी न किसी श्रेणी की नौकरी प्राप्त हो सकेंगी एवं उनकी सामाजिक शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति में यथोचित सुधार एवं सुदृढ़ता आएगी जबकि मौजूदा आरक्षण प्रणाली से आरक्षित संवर्ग के ही सभी योग्य परिवारों में नौकरियां प्रवेश नही कर पा रही हैं।

दूसरे, जब अधिकांश परिवार सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक दृष्टि से समुन्नत होगा तो समाज में छूआछूत की बीमारियां एवं गरीबी /बेरोजगारी के चलते होने वाले अपराधों पर भी खुद ब खुद अंकुश लगता दिखेगा।

तीसरे, इस मॉडल को अपनाए जाने से एक ऐसी आदर्श स्थिति भी आएगी, जबकि धीरे-धीरे ही सही परंतु अधिकांश श्रेणी की नौकरियां आरक्षण की व्यवस्था से मुक्त हो जा सकेंगी एवं उन्हें प्राप्त करने के लिए बिना आरक्षण के लाभ लिए, सभी संवर्ग के व्यक्ति प्रतियोगिता कर सकेंगे।

चौथे, आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था से समाज में आरक्षित एवं गैर आरक्षित संवर्ग में जो विद्वेषपूर्ण विभाजन दिखता है, उसका भी सहज अंत हो सकेगा।

(राजेश पाठक झारखंड स्थित जिला सांख्यिकी कार्यालय गिरिडीह में सहायक सांख्यिकी पदाधिकारी हैं।)

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