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विमर्श

किसी भी अनुचित काम का चाहिए लाइसेंस तो नाम के आगे लगा लीजिये बाबा, श्रीश्री, स्वामी या फिर साध्वी

Janjwar Desk
7 Jun 2021 10:00 AM GMT
किसी भी अनुचित काम का चाहिए लाइसेंस तो नाम के आगे लगा लीजिये बाबा, श्रीश्री, स्वामी या फिर साध्वी
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डॉक्टरों और एलोपैथ का मजाक उड़ाने वाले रामदेव कहते हैं हमें किसी का बाप गिरफ्तार नहीं कर सकता

बहुचर्चित रामदेव बाबा ने जितना विवाद 4 दिन में कर डाला उतना तो कंगना रनौत ने 4 महीने में नहीं किया था, उनके अनुसार कोरोना तो कोई प्रॉब्लम है ही नहीं और है भी तो गोमूत्र या कोरोनिल से निल मतलब ख़त्म हो जाएगी...

डॉ. अंजुलिका जोशी की टिप्पणी

जनज्वार। देश की आज़ादी के 74 साल भी हम भारतवासी गुलाम के गुलाम ही रह गए। दरअसल गुलामी की आदत जो पड़ गयी है। पहले मुगलों की, फिर अंग्रेज़ों की और अब अपने खुद की चुनी हुई सरकार की। जो भी गद्दी पर होता है, वो हमारा माई बाप हो जाता है। अब हमारे ये तथाकथित अन्नदाता हमारी संस्कृति, परंपरा और आस्था पर बात करेंगे तो हम भारतीयों का उनके आगे नतमस्तक हो जाना तो बहुत स्वाभाविक है। हम सीधे और सरल जो ठहरे।

अगर इनके नाम के आगे योगी, बाबा, आचार्य, श्रीश्री, स्वामी या साध्वी लगा हो तब तो सोने में सुहागा। ये तमगा उनको हर उचित अनुचित कार्य का लाइसेंस दे देता है और हम मूक बधिर बन कर उसकी हर बात मान लेते हैं। यहीं से शुरू हो जाता है हमारा शोषण, हमारी आस्था का गलत उपयोग करके भ्रमित करने का सिलसिला।

अब देखिये न हमारे बहुचर्चित रामदेव बाबा ने जितना विवाद 4 दिन में कर डाला उतना तो कंगना रनौत ने 4 महीने में नहीं किया था। उनके अनुसार कोरोना तो कोई प्रॉब्लम है ही नहीं और है भी तो गोमूत्र या कोरोनिल से निल मतलब ख़त्म हो जाएगी। ऑक्सीजन सिलिंडर तो शरीर के अंदर ही हैं एक नहीं दो दो.. तो ऑक्सीजन सिलिंडर क्यों चाहिए?

ये बात अलग है कि खुद उन्ही के सहयोगी आचार्य बाल कृष्ण अपने शरीर के दो ऑक्सीजन सिलिंडर से काम नहीं चला पाए और उन्हें बचाने के लिए रामदेव के अनुसार स्टुपिड एलोपैथी डाक्टरों ने ऑक्सीजन सिलिंडर लगा कर जान बचाई। अब ये बाबा शब्द का ही तो चमत्कार है कि एक ही झटके में उन्होंने बरसों शोध और अनुसन्धान के बाद उपयोग में आने वाली तमाम दवाइयों को बेकार करार दे दिया। अपनी दुकान के पकवान मीठे और दूसरों के फीके? अब ये अनुलोम-विलोम, प्राणायाम तक तो ठीक था, सोच का शीर्षासन मत करवा दो। और फिर हेकड़ी ऐसी कि कहते हैं, 'हमें किसी का बाप गिरफ्तार नहीं कर सकता।' तो फिर ये महाशय पुलिस से डर के सलवार पहन कर भागे क्यों थे?

ये कैसी सोच है कि अगर कोई चीज़ प्राचीन है तो सही और नयी है तो नहीं। दोनों भी तो अपनी अपनी जगह सही हो सकते हैं। हम किस मानसिकता में जी रहे हैं? क्यों हर चीज़ को पीछे ही धकेलना चाहते हैं। वही कट्टरपंथी सोच, वही अंधविश्वास। अरे भई आंखें खोलो दुनिया मंगल गृह से भी आगे निकल गयी है और हम हैं कि गोबर और गोमूत्र में ही फंसे हैं।


अगर विश्लेषण करिये तो साफ़ साफ़ नज़र आता है कि ये समाज के ठेकेदार हर उस चीज़ के खिलाफ हैं या शक की निगाह से देखते हैं जो नयी है। जैसे नयी सोच, नयी खोज, नयी प्रणाली, नयी वैक्सीन, यहाँ तक कि नया पहनावा भी। कमाल है? अरे भई ये सब चीज़ें आज के परिवेश में सही और तार्किक हो सकती हैं। लेकिन नहीं वो तो बहुत बड़ी समस्या हो जाती है। सुना है न ऐश्वर्या जी को लॉरिअल के विज्ञापन में कहते हुए '5 प्रोब्लेम्स वन सोल्यूशन" इसी की तर्ज़ पर इन सभी समस्याओं का बस एक ही इलाज होता है वो है पाबन्दी और बहिष्कार।

हर वो वस्तु जो एक निर्धारित सोच के अनुरूप नहीं है उस पर पाबन्दी या बहिष्कार। जैसे कि पाकिस्तानी एक्टर- पाबन्दी, चीनी सामान - बहिष्कार, शराब की लत - पाबन्दी, तनिष्क का विज्ञापन - बहिष्कार, लड़की का आधुनिक पहनावा - जीन्स पहनने पर पाबन्दी, नारी सुरक्षा - लड़कियों की आज़ादी पर पाबन्दी, और तो और कभी कभी इंटरनेट पर भी पाबन्दी।

हद तो ये है कि अगर सोशल मीडिया सरकार के अनुसार काम न करे तो उसका भी बहिष्कार होने लगा है। हाल में ही पिछले महीने ट्विटर ने सरकारी प्रवक्ता की एक की पोल खोल दी तो उस पर पाबन्दी तो पाबन्दी बहिष्कार भी करने का आह्वान। और विडम्बना देखिये कि ट्विटर पर ही 'बैन ट्विटर' ट्रेंड हो रहा था। उस पर तुर्रा ये कि गाँधी जी ने भी तो बहिष्कार किया था। क्या मूर्खता है गाँधी जी ने देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों का बहिष्कार किया था अपनों का नहीं। यहाँ तो अपने ही लोगों पर, उनकी सोच पर और उनकी स्वतंत्रता पर ही पाबन्दी लग रही है। अरे भई पाबन्दी ही लगानी थी तो कोविड पर लगाते... वह कहीं भी, कभी भी मुँह उठाये चला आ रहा है वो भी बिना किसी सूचना के। वहां तो बस चला नहीं तो अफसरी कहीं और ही दिखा दी।

अब देखिये पाबन्दी और बहिष्कार में कोई काम तो करना होता है नहीं, न ही शोध और, न ही अनुसन्धान, तो कौन करे इतना काम जब वोट मिलते हैं धर्म के नाम। मुँह उठाओ चला दो कलम। चाहे इस से राजस्व की हानि ही क्यों न हो हो। देखिये न उन सारे राज्यों में जहाँ शराब पर पाबन्दी है, वहां ही सबसे ज़्यादा शराब पी जाती है। एक पूरा अनाधिकृत नेटवर्क ही खड़ा हो जाता है बिक्री के लिए और घर घर ऊँचे दाम पर शराब का वितरण होता है जिससे बढ़ावा मिलता है भ्रष्टाचार को और सरकार को क्या मिलता है जीरो बटा सन्नाटा।

अरे भई कुछ सोच समझ तो लो इस पाबन्दी से कुछ होने वाला भी है या नहीं। अब गांजा, अफीम या चरस इन्हीं सबको देख लीजिये ये सब तो हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। विज्ञान गवाह है कि उसका सेवन नियंत्रित मात्रा में किया जाए तो शरीर को नुक्सान नहीं फायदा ही होता है। पाबन्दी लगाकर उसको निषेध पदार्थ की श्रेणी में डाल कर आप लोगों को उसके सेवन के लिए उत्साहित ज़रूर कर रहे हैं। लोगों को उसकी अच्छाई और बुराई से अवगत कराइये न कि पाबन्दी। पाबन्दी कोई विकल्प नहीं है।

एक और बड़ी मुश्किल है कि हम हिन्दुस्तानी आहत बड़ी जल्दी हो जाते हैं। किसी ने कुछ भी कहा और हम आहत। अब जैसे हम ये लेख लिख रहे हैं इस से भी कोई आहत हो सकता है और दूसरे की क्या कहें मैं खुद भी किसी के आहत होने पर भी आहत हो सकती हूँ। हिन्दुस्तान में आहत होने की कोई कसौटी नहीं है। धर्म, जाति, राजनीति, आस्था, जगह कुछ भी हो सकता है। लेकिन क्या हमारा, धर्म हमारी संस्कृति, हमारी आस्था इतनी कमज़ोर है कि एक छोटे से विज्ञापन या फिल्म के एक डायलाग से हिल जाती है और हम मार काट पर आमादा हो जाते हैं।

अगर ऐसा है तो हमें खुद पर काम करने की ज़रूरत है। सरकार का क्या है वो तो अपना उल्लू ही सीधा करने में लगे रहते हैं। गंगा गए तो गंगादास, जमना गए तो जमनादास। सवाल ये है कि ये पाबन्दी और बहिष्कार आखिर लगाए क्यों जाते हैं? तो उसका सीधा साधा उत्तर है - हम पर अंकुश रखने के लिए। अगर आप ध्यान से सोचें तो हर बार की तरह इस बार भी शुरू से ही सिर्फ और सिर्फ पहले हमें सम्मोहन में बाँधा गया अच्छे दिनों का लारा लप्पा देकर, बहुत ही लुभावनी योजनाओं का ऐलान करके, अच्छी अच्छी मन की बातें कह कर, और जुमलेबाज़ी से मन मन जीतकर। फिर एक ज़ोर का झटका धीरे से लगाया विमुद्रीकरण करके। और फिर समझाया गया कि इस से काला धन वापस आएगा, आतंकवाद का अंत होगा। कुछ हुआ क्या?

लाइन में लगवा दिया पूरे देश को और पूरी जनता को बना दिया धोबी का कुत्ता जो न घर का रहा न घाट का। अब उससे कुछ उबरे ही थे तो GST लगा दिया गया। सुनहरे सपने तो ऐसे दिखाए कि इससे बड़ा और अच्छा काम तो हो ही नहीं सकता। लोगों ने भी प्रसन्नचित मन से टैक्स पर टैक्स देना शुरू कर दिया। बेरोज़गारी पर बता दिया गया कि रोज़गारी की क्या कमी है हम चाय बेचते थे तुम पकौड़े बेचो। महंगाई, पेट्रोल, तेल, और दूसरे मुद्दों पर बोलने पर पाँच लाख ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था दिखला दी। फिर धीरे धीरे शुरू हो गया दमन का सिलसिला।

जिसने प्रश्न पूछा उसे जेल, जिसने आवाज़ उठाई वो गिरफ्तार या गद्दार। जो जन समूह आवाज़ उठाये वो टुकड़े टुकड़े गैंग। हिटलर ने भी तो यही किया था, यहूदियों की आज़ादी धीरे धीरे छीनी और अंत में उनका दमन ही कर दिया। लोगों को लगता था की हिटलर का कोई विकल्प नहीं है, लेकिन इतिहास गवाह है कि हिटलर के बाद जर्मनी का जितना विकास हुआ उतना पहले कभी नहीं हुआ था।

हमारे देश में वैक्सीन की कमी हो या न हो मनोरंजन की कमी तो बिलकुल भी नहीं है। कभी सुना है कि किसी देश पर सोशल मीडिया ने केस कर दिया? वो भी कस्टमर की प्राइवेसी के लिए और उपभोक्ता बैठ कर तमाशा देख रहा हो जैसे उसे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। है न हास्यास्पद। जागो ग्राहक जागो। आपके ऊपर ही गाज गिरने वाली है।

फैसला आपको ही करना है कि आपको भेड़ बकरी की तरह पाबंदियों में रहना है या स्वतंत्र? ये लोकतंत्र है आप को पूरा हक़ है सवाल पूछने का, अपने हक़ के लिए लड़ने का। अगर आप अभी चुप बैठे तो एक बार फिर आप गुलामी की जज़ीर में जकड़ जायेंगे और जब तक जागेंगे तब तक देर हो चुकी होगी।

(डॉ. अंजुलिका जोशी मूलत: बायोकैमिस्ट हैं और उन्होंने NCERT के 11वीं-12वीं के बायोटैक्नोलॉजी विषय पाठ्यक्रम को सुनिश्चित करने में अपना योगदान दिया है।)

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