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पिछले एक दशक में ध्वस्त हो गए तापमान के सारे रिकॉर्ड - रिपोर्ट

Janjwar Desk
16 Aug 2020 10:26 AM GMT
पिछले एक दशक में ध्वस्त हो गए तापमान के सारे रिकॉर्ड - रिपोर्ट
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कोविड 19 के दौर में जब दुनिया बंद थी, तब जलवायु वैज्ञानिक लगातार कम होते ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की बात कर रहे थे, अप्रैल के महीने में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के उत्सर्जन में 30 प्रतिशत की कमी आंकी गई थी....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

अमेरिका के मेटेरियोलोजी सोसाइटी के बुलेटिन में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार दुनिया में तापमान का जबसे रिकॉर्ड रखा जा रहा है, उसके बाद से पिछला दशक (2010-2019) सबसे गर्म रहा है। नासा के अनुसार वर्ष 2019 इतिहास का दूसरा सबसे गर्म वर्ष और यूनाइटेड किंगडम के मौसम विभाग के अनुसार तीसरा सबसे गर्म वर्ष रहा है। वर्ष 1980 के बाद से आने वाला हरेक दशक पिछले दशक से अधिक गर्म रहा है।

वर्ष 1880 के बाद से हरेक अगला दशक पिछले दशक की तुलना में 0.07 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म रहा है, पर पिछले दशक में यह बृद्धि 0.39 डिग्री रही है। इसका सीधा सा मतलब है कि समय के साथ-साथ तापमान बढ़ने की दर भी बढ़ती जा रही है। इस शोधपत्र को दुनिया के 60 देशों के 520 वैज्ञानिकों ने तैयार किया है।

वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक के वर्ष के बीच पृथ्वी का औसत तापमान हमारे इतिहास का सबसे गर्म दौर घोषित किया जा चुका है। इस दौरान अमेरिका, यूरोप और भारत में तापमान के सभी पिछले रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर सदियों से जमी बर्फ तेजी से पिघलती रही, बड़ी बाढ़ों और चक्रवातों की घटनाएँ बढ़ गयीं, प्रजातियों के विलुप्तीकरण की दर किसी भी दौर से अधिक हो गई। इस दौर में जंगलों और झाड़ियों में आग लगाने की दर ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ग्रीस और फिलीपींस में अत्यधिक रहीं।

वर्ष 2019 तक पृत्वी का औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले के वर्षों की तुलना में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के जलवायु विशेषज्ञ माइकल मान के अनुसार यदि तापमान में बढ़ोत्तरी को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना है तब दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को आधा से भी कम करना पड़ेगा, पर इस सम्भावना नजर नहीं आती।

ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी की संभावना भले ही न नजर आ रही हो पर जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि के सारे प्रभाव स्पष्ट हैं। महासागरों का तापमान भी बढ़ रहा है और वर्ष 2019 में यह तापमान वर्ष 2016 के बाद सबसे अधिक रहा। पिछले 30 वर्षों के दौरान सागर तल में औसतन 8.64 सेंटीमीटर की बढ़ोत्तरी हो गई है। वर्ष 2019 में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पिछले 8 लाख वर्षों में सर्वाधिक रहा है। यह आकलन दोनों ध्रुवों पर जमी बर्फ के बीच उपलब्ध हवा के विशेषण से किया गया है।

कोविड 19 के दौर में जब दुनिया बंद थी, तब जलवायु वैज्ञानिक लगातार कम होते ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की बात कर रहे थे। अप्रैल के महीने में कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में 25 प्रतिशत की और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के उत्सर्जन में 30 प्रतिशत की कमी आंकी गई थी। पर, हाल में ही नेचर क्लाइमेट चेंज नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार कोविड 19 के दौर में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में अभूतपूर्व कमी का असर जलवायु परिवर्तन और तापमान बृद्धि पर नगण्य रहेगा और वर्ष 2030 तक सामान्य स्थितियों में जितना तापमान बढ़ने की संभावना है, उसमें महज 0.01 डिग्री सेल्सियस का फर्क पड़ेगा।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीड्स के प्रोफ़ेसर पिएर्स फोरस्टर के अनुसार यदि अब अर्थव्यवस्था के विकास पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखकर किया जाता है तब वर्ष 2050 तक सामान्य स्थिति की अपेक्षा तापमान में 0.3 डिग्री सेल्सियस की कमी आ सकती है। पर सरकारों की योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण कहीं नजर नहीं आ रहा है। पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, और ऐसी ही स्थितियां बनी रहीं तब वर्ष 2050 तक तापमान में बढ़ोत्तरी 1.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जायेगी और पेरिस समझौते के तहत जिस 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी का लक्ष्य रखा गया था, वह कहीं से पूरा नहीं होगा।

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