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विमर्श

भारत-अमेरिका ही नहीं, दुनियाभर में ऐसा ही है प्रजातंत्र का भविष्य

Janjwar Desk
8 Jan 2021 4:30 PM GMT
भारत-अमेरिका ही नहीं, दुनियाभर में ऐसा ही है प्रजातंत्र का भविष्य
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ट्रम्प ने भले ही सत्ता परिवर्तन के लिए हामी भर दी हो पर जाते-जाते उन्होंने दुनिया के शासकों को यह तो बता ही दिया कि प्रजातंत्र का ऐसा हाल भी किया जा सकता है, भले ही भारत समेत अनेक प्रजातंत्र ने अमेरिका की स्थिति पर खेद प्रकट किया हो, पर अब अनेक देशों में ऐसा ही प्रजातंत्र का भविष्य है.....

वरिष्ठ पत्रकार महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

यह महज एक संयोग ही होगा कि जिस दिन भारत में किसान आन्दोलनकारी गणतंत्र दिवस के दिन राजपथ पर गणतंत्र दिवस के परेड में टैंक और ट्रेक्टर एक साथ चलाने की बात का देश के मरते प्रजातंत्र में नई जान फूंकने की बात कर रहे थे, ठीक उसी दिन अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हार चुके ट्रम्प और उनके समर्थक प्रजातंत्र की हत्या कर रहे थे। लगभग पूरी दुनिया में प्रजातंत्र बेहाल है क्योंकि अब प्रजातंत्र का नाम तो नहीं बदला पर यह पूरी तरीके से शासक तंत्र बन कर रह गया है।

केवल कुछ यूरोपीय देश, न्यूज़ीलैण्ड और कनाडा में प्रजातंत्र का वह स्वरुप आज भी कायम है, जिसे हमने कभी किताबों में पढ़ा था। इन देशों को छोड़ दें तो लगभग पूरी दुनिया में प्रजातंत्र का मुखौटा लगाकर शासक वर्ग तानाशाही से भी बदतर हालात पैदा कर चुके हैं। बड़े से बड़े राजनीति शास्त्र के पंडितों ने भी कभी ऐसी कल्पना नहीं की होगी कि इक्कीसवीं सदी के आते-आते प्रजातंत्र इस हालात में किसी एक देश में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक साथ पहुँच जाएगा।

ट्रम्प ने भले ही सत्ता परिवर्तन के लिए हामी भर दी हो पर जाते-जाते उन्होंने दुनिया के शासकों को यह तो बता ही दिया कि प्रजातंत्र का ऐसा हाल भी किया जा सकता है। भले ही भारत समेत अनेक प्रजातंत्र ने अमेरिका की स्थिति पर खेद प्रकट किया हो, पर अब अनेक देशों में ऐसा ही प्रजातंत्र का भविष्य है।

अमेरिका में ट्रम्प की तमाम कोशिशों के बाद भी प्रजातंत्र की साँसें बाकी है क्योंकि वहां की संवैधानिक संस्थाएं, न्यायपालिका, मीडिया और सेना लगभग निष्पक्ष हैं और अपनी संवैधानिक और जनता के प्रति जिम्मेदारी याद रखती हैं। प्रजातंत्र की अब परिभाषा ही बदल गई है - पहले कहा जाता था, जनता द्वारा और जनता के लिए। अब प्रजातंत्र शासक द्वारा और शासक के लिए खुले आम हो चला है।

सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि अमेरिका जैसे हालात क्या हमारे देश में भी आ सकते हैं? दरअसल अमेरिका और भारत में कट्टरपंथियों और दक्षिणपंथियों की सरकार के बाद भी एक बुनियादी फर्क है। अमेरिका में संस्थाएं, न्यायालय और मीडिया निष्पक्ष हैं, जबकि अपने देश में सब सरकार के सामने नतमस्तक हैं।

अमेरिका में ट्रम्प और उनके समर्थक स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वे चुनाव हार चुके हैं, पर भारत में यह नौबत ही नहीं आयेगी। देश का चुनाव आयोग पूरी तरह से सरकार के इशारे पर काम करता है, ईवीएम पूरी तरह से सरकार के इशारे पर काम करते हैं और रही सही कसर विधायकों और सांसदों की खुलेआम खरीद-फ़रोख्त पूरा करता है। कभी यदि बीजेपी सरकार को हार का सामना करना भी पड़ेगा तो चुनाव आयोग निश्चित तौर पर चुनाव के नतीजों को रोक देगा। कुछ लोग चन्द राज्यों के चुनाव नतीजों का उदाहरण दे सकते हैं, पर दुनिया में प्रजातंत्र का डंका बजाने के लिए शासक वर्ग इतनी कुर्बानी तो करेगा ही। हमारे देश में मध्य प्रदेश का उदाहरण सबके सामने है, जहां बीजेपी चुनाव हारने के बाद भी बेशर्मी के सभी हदें पार कर सत्ता तक पहुँच गई।

अमेरिका का सर्वोच्च न्यायालय और अधिकतर राज्यों के न्यायालय स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं, पर हमारे देश में ऐसा नहीं है। किसी ने भी आज तक सरकार के विरुद्ध कोई कठोर फैसला नहीं देखा होगा, बल्कि याचिका के तथ्य देखकर ही सभी एक लम्बे नाटक के कल्पना कर लेते हैं और वही सही होता है। जिस तरह राज्यों के चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर दल-बदल का नाटक किया जाता है, उसी तरह न्यायालयों में सरकार के विरुद्ध याचिकाओं में एक दो सुनवाई तक न्यायाधीश सरकार को लताड़ते हैं और फिर अंत में सरकार के हित में ही फैसला सुनाते हैं।

याद कीजिये, राम मंदिर की लम्बी सुनवाई और सरकार से पूछे गए तीखे प्रश्नों को, पर अंत में जो फैसला आया वह सभी को शुरू से ही पता था। नयी संसद भवन के साथ सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर भी सरकार को लताड़ा गया, पर फैसला सरकार के पक्ष में आया। अलग-अलग याचिकाओं में न्यायालयों ने मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खूब प्रवचन दिया, पर सरकार लगातार इनकी अवहेलना करती है और न्यायालय मूक दर्शक बने रहते हैं। किसान आन्दोलन से सम्बंधित भी याचिकाएं लंबित हैं, किसान ठण्ड से मर रहे हैं, वार्ताएं असफल हो रही हैं पर न्यायालय खामोश है और बातचीत से हल चाहता है।

अमेरिका और भारत के मीडिया में भी कोई समानता नहीं है। अमेरिका का मीडिया सच दिखाता है और राष्ट्रपति के प्रेस ब्रीफिंग को भी बीच से छोड़ने की हिम्मत रखता है, पर यहाँ तो मीडिया सरकार के झूठ को नमक मिर्च लगाकर दिनरात विस्तार देने का काम करता है और इस तरह जो सच है वह जनता के सामने कभी आता ही नहीं।

इस दौर में भी भारत और अमेरिका के प्रजातंत्र में बहुत अंतर है। अमेरिका में जिस तरह संसद पर हमला किया गया, भारत में इसकी जरूरत ही नहीं है। सरकार समर्थक भीड़ किसी को भी केवल धमकी देने के लिए ही स्वतंत्र नहीं है बल्कि उसकी ह्त्या के लिए भी स्वतंत्र है और पुलिस और कभी-कभी सेना भी हिंसक और नफ़रतगर्दों के साथ खडी रहती है। प्रजातंत्र के हनन में भारत अमेरिका की तुलना में कोसों आगे है।

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