विमर्श

Modi On Human Rights : मानवाधिकार विहीन 'न्यू इंडिया' मांगते पीएम मोदी, अल्पसंख्यक मुस्लिमों के लिए खतरनाक बनता जा रहा भारत

Janjwar Desk
16 Oct 2021 9:04 AM GMT
Modi On Human Rights : मानवाधिकार विहीन न्यू इंडिया मांगते पीएम मोदी, अल्पसंख्यक मुस्लिमों के लिए खतरनाक बनता जा रहा भारत
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Modi on human rights : पक्षपातपूर्ण मानवाधिकार (biased Human Rights) को लेकर जो चिंता प्रधानमंत्री जाहिर कर रहे थे असल में उस प्रवृत्ति की स्थापना और विस्तार देने का काम खुद मोदी और अमित शाह ने किया है...

महेंद्र पाण्डेय का विश्लेषण

Modi on human rights। भारत फिर से सयुंक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद (UN Human Rights Council) का सदस्य पुनःनिर्वाचित (Re-Elected) हो गया है, और कम से कम सोशल मीडिया इसे ऐतिहासिक उपलब्धि करार दे रहा है। दरअसल अब वैश्विक मानवाधिकार (Global Human Rights) की बागडोर उन हाथों में सिमट गयी है जो खुलेआम मानवाधिकार का हनन करते हैं और इसे सही साबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों का सहारा लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र में 14 अक्टूबर को गुप्त मतदान द्वारा भारत समेत अर्जेंटीना, बेनिन, कैमरून, एरिट्रिया, फ़िनलैंड, गाम्बिया, होंडुरस, कजाखस्तान, लिथुआनिया, लक्सम्बर्ग, मलेशिया, मॉन्टेंगरो, पैराग्वे, कतर, सोमालिया, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका को वर्ष 2022 से 2024 तक के लिए चुना गया है। मानवाधिकार कौंसिल में कुल 47 सदस्य होते हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प (Donald Trump) ने राष्ट्रपति बनाने के बाद से मानवाधिकार परिषद से नाता तोड़ दिया था, पर अब फिर से इसकी वापसी हो गयी है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि लिंडा थॉमस ग्रीनफील्ड (Linda Thomas Greenfield) ने कहा है कि वह ये सुनिश्चित करेंगी कि अफगानिस्तान, म्यांमार, चीन, इथियोपिया, सीरिया और यमन में मानवाधिकार हनन पर पर्याप्त चर्चा की जाए, सभी देशों में बुनियादी आजादी और महिलाओं के अधिकारों (Ensure Fundamental Freedom And Women's Rights) को सुनिश्चित किया जाए, धार्मिक असहिष्णुता (religious Intolerance) पर लगाम लगे, सभी नागरिकों के लिए समान कानून-व्यवस्था का पैमाना (Radical And Ethnic Justice) हो, अल्पसंख्यकों (Minorities) के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव रोका जा सके। लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड ने यह भी कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि मानवाधिकार के सन्दर्भ में दागी देश इस परिषद् के सदस्य नहीं बन सकें।

लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड के बयान किसी प्रवचन से कम नजर नहीं आते, पर यदि इस बयान के बाद भी भारत लगातार इस कौंसिल का सदस्य भारी मतों से निर्वाचित होता जा रहा है तब यह समझ लेना चाहिए कि पूरी दुनिया में मानवाधिकार की परिभाषा ही बदल गयी है और मानवाधिकार बस प्रवचनों तक ही सिमट कर रह गया है। सामाजिक विकास, भूख, मानवाधिकार, प्रेस की आजादी और व्यक्तिगत आजादी से सम्बंधित दुनिया के जितने इंडेक्स हैं, सबमें भारत सबसे पिछड़े देशों की कतार में खड़ा है – यदि इस तथ्य को नकार भी दें तब भी लिंडा थॉमस ग्रीनफ़ील्ड को इतना तो पता ही होगा कि हरेक वर्ष अमेरिकी कांग्रेस की धार्मिक आजादी और मानवाधिकार से सम्बंधित कमेटी भारत में इसके लगातार हनन से सम्बंधित रिपोर्ट प्रकाशित करती है।

एक ऐसा देश जहां अपने अधिकार की मांग करते लोग कुचल कर मार दिए जाते हैं और कुचलने वाले को पुलिस, प्रशासन, राज्य और केंद्र की सरकारें बचाने में जुट जाती हैं। एक ऐसा देश जहां सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों को देशद्रोही बताकर जेल में अनंत काल के लिए ठूंस दिया जाता है, एक ऐसा देश जहां सरकार अपने राजनैतिक फायदे के लिए धार्मिक उन्माद पैदा कर दंगे भी करवा देती है, एक ऐसा देश जहां कोविड 19 की लहर ने देश को श्मशान में बदल डाला था और सरकार उत्सव और जश्न मनाती रही – वैश्विक मानवाधिकार का रखवाला है। अमेरिका के काटो इंस्टिट्यूट और कनाडा के फ्रासेर इंस्टिट्यूट द्वारा संयुक्त तौर पर प्रकाशित ह्यूमन फ्रीडम इंडेक्स 2020 (Human Freedom Index 2020 by US Based Cato Institute and Canada Based Fraser Institute) में कुल 162 देशों की सूचि में भारत का स्थान 111वां था, जो वर्ष 2019 के इंडेक्स की तुलना में 17 स्थान नीचे था।

देश भर 12 अक्तूबर को 28वां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) स्थापना दिवस मनाया गया, इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने भी वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि कई मौके आए जब दुनिया भटकी पर भारत ने हमेशा मानवाधिकारों को सर्वोपरि रखा। उन्होंने विपक्ष पर हमला करते हुए कहा कि मानवाधिकार का बहुत ज्यादा हनन तब होता है जब उसे राजनीतिक रंग से देखा जाता है, राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, राजनीतिक नफा-नुकसान के तराजू से तौला जाता है। इस तरह का सेलेक्टिव व्यवहार, लोकतंत्र के लिए भी उतना ही नुकसानदायक होता है। पीएम मोदी ने कहा कि हाल के वर्षों में मानवाधिकार की व्याख्या कुछ लोग अपने-अपने तरीके से, अपने-अपने हितों को देखकर करने लगे हैं। एक ही प्रकार की किसी घटना में कुछ लोगों को मानवाधिकार का हनन दिखता है और वैसी ही किसी दूसरी घटना में उन्हीं लोगों को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखता।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ने लगातार विश्व को समानता और मानव अधिकारों के जुड़े विषयों पर नया विजन दिया है। बीते दशकों में ऐसे कितने ही अवसर विश्व के सामने आए हैं, जब दुनिया भ्रमित हुई है, भटकी है, लेकिन भारत मानवाधिकारों के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहा है, संवेदनशील रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज देश 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास' के मूल मंत्र पर चल रहा है और ये एक तरह से मानव अधिकार को सुनिश्चित करने की ही मूल भावना है।

जिस पक्षपातपूर्ण मानवाधिकार (Biased Human Rights) की विस्तार से चर्चा प्रधानमंत्री कर रहे थे, दरअसल वह बीजेपी सरकार और मोदी/शाह की ही देन है, भारत समेत दुनिया में इस दौर में पूंजीपतियों की बैसाखी के सहारे खडी दक्षिणपंथी और सत्ता-भोगी सरकारों का वर्चस्व है। जाहिर है, ऐसी सरकारों के लिए लोकतंत्र, पर्यावरण-संरक्षण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानवाधिकार जैसे मुद्दों के कोई मायने नहीं हैं। हाल में ही फ्रंटलाइन डिफेंडर्स (Frontline Defenders) नामक संस्था द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट, 'ग्लोबल एनालिसिस 2020' (Global Analysis 2020) के अनुसार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्या के मामले में भारत दुनिया में 10वें स्थान पर है और इस सन्दर्भ में देश की स्थिति चीन, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कांगो, लीबिया, पाकिस्तान और सीरिया से भी बदतर है।

इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष, यानि 2020 में दुनिया के कुल 25 देशों में 331 मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हत्या की गई, जबकि वर्ष 2019 में 31 देशों में 304 कार्यकर्ताओं की हत्या की गई थी। वर्ष 2020 के 25 देशों में भारत भी शामिल है। यही नहीं बल्कि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया के बहुत सारे देशों में इन कार्यकर्ताओं को पीटा जा रहा है, बेवजह हिरासत में लिया जा रहा है और उनपर बिना किसी सबूत के आपराधिक मुकदमे चलाये जा रहे हैं। ऐसे देशों की चर्चा में भारत और चीन का विशेष उल्लेख है। मानवाधिकार कार्यकर्ता सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय मुद्दों, नस्लभेद और लैंगिक समानता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं, पर दुनियाभर में की गई कुल हत्याओं में से 69 प्रतिशत का सरोकार पर्यावरण संरक्षण, जमीन से जुड़े मसलों और आदिवासियों के अधिकारों से था। कुल 331 हत्याओं में से लगभग तीन-चौथाई दक्षिण अमेरिकी देशों में की गई हैं।

द साउथ एशिया कलेक्टिव (The South Asia Collective) नामक संस्था ने हाल में ही 'साउथ एशिया स्टेट ऑफ माइनॉरिटीज रिपोर्ट 2020' (South Asia – State of Minorities 2020) को प्रकाशित किया है और इसके अनुसार भारत लगातार अल्पसंख्यक मुस्लिमों के लिए खतरनाक बनता जा रहा है और इनपर हिंसा और अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। कुल 349 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, विशेष तौर पर मुस्लिम कार्यकर्ताओं, की दयनीय स्थिति की भी चर्चा की गई है।

इस रिपोर्ट के अनुसार अल्पसंख्यकों में मामले में दक्षिण एशिया के हरेक देश – भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्री लंका, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान – की स्थिति एक जैसी है और अल्पसंख्यकों के उत्पीडन के सन्दर्भ में मानों इन देशों में ही आपसी प्रतिस्पर्धा रहती है। साउथ एशिया फ्री मीडिया एसोसिएशन (Free Media Association) के सेक्रेटरी जनरल इम्तिआज आलम के अनुसार इन सभी देशों में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों का लगातार उत्पीडन किया जाता है, और भारत की स्थिति इस सन्दर्भ में पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान से किसी भी स्थिति में बेहतर नहीं है। दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों में लोकतंत्र के नाम पर फासिस्ट सरकारों का कब्ज़ा है जो विशेषतौर पर जनता के अभिव्यक्ति और आन्दोलनों के संवैधानिक अधिकारों का हिंसक हनन करने में लिप्त हैं।

रिपोर्ट के अनुसार भारत में जब केंद्र सरकार ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स लागू किया तभी निष्पक्ष सोच वाली जनता, निष्पक्ष मीडिया, शिक्षाविदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने समझ लिया था कि यह देश में अधिकतर मुस्लिमों को बेघर करने की कवायद है।

इसके बाद नागरिकता क़ानून पर देश भर में आन्दोलन किये गए, जिसके अनुसार केवल मुस्लिमों को छोड़कर शेष सभी अवैध तरीके से देश में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ करने वालों को नागरिकता दी जायेगी। इस दौरान सरकार की नीतियों के आलोचकों, विशेष तौर पर मुस्लिमों को सरकारी तंत्र और कट्टरवादी सरकार समर्थक समूहों ने उत्पीडित किया। इस दौर में केवल मंत्री और बीजेपी के दूसरे नेताओं ने ही नहीं, बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री ने भी ऐसे भाषण दिए, जो निश्चित तौर पर "भड़काऊ भाषण" की श्रेणी में थे।

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत सरकार ने फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन एक्ट का इस्तेमाल मानवाधिकार और अल्पसंख्यकों के लिए काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों के विरुद्ध एक हथियार के तौर पर किया, और समाचार माध्यमों पर एक अघोषित सेंसरशिप थोप दी। फरवरी के दिल्ली दंगों में भी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया, और इसके बाद अप्रैल में तबलीगी जमात को केवल मुस्लिम होने के कारण, कोविड 19 का दोषी करार दिया गया। इसमें सरकार और मीडिया की भागीदारी एक जैसी है। लगातार पिछले 7 वर्षों से प्रधानमंत्री जो कहते जा रहे हैं, दरअसल समाज में उसका असर ठीक उल्टा हो रहा है, पर अभी जनता को शायद यह समझ में नहीं आया है।

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