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पोलियो की वैक्सीन ही बन रही पोलियो फैलने का कारण, दुनिया से इस रोग के ख़त्म होने के अभी नहीं आसार

Janjwar Desk
20 Nov 2020 12:08 PM GMT
पोलियो की वैक्सीन ही बन रही पोलियो फैलने का कारण, दुनिया से इस रोग के ख़त्म होने के अभी नहीं आसार
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file photo

'दो बूँद जिन्दगी के' ने हमारे देश से तो पोलियो को मिटा दिया, पर पड़ोसी देश से इसके वायरस दुबारा देश में प्रवेश नहीं करेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है...

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। पोलियो के टीकाकरण के बाद पिछले कुछ दशकों के दौरान यह भारत समेत अधिकतर देशों से मिट गया है, पर अफ्रीका के कुछ देशों में पोलियो की वैक्सीन से ही पोलियो के फ़ैलने के मामले सामने आने लगे हैं। इसे वैक्सीन डेराइवड पोलियो का नाम दिया गया है। इस वर्ष दुनिया में पोलियो की वैक्सीन से पोलियो के फ़ैलने के 23 देशों में अब तक 600 मामले सामने आ चुके हैं, जबकि पिछले वर्ष केवल 105 मामले सामने आये थे और 35 मामलों में इसका कारण प्राकृतिक वायरस थे।

वैसे दुनिया की जनसंख्या की तुलना में यह संख्या नगण्य लग सकती है, पर पोलियो वायरस से संक्रमित 200 व्यक्तियों में से केवल एक को ही लकवा होता है। लकवा के बाद ही पोलियो का पता लगता है, इसका सीधा सा मतलब है कि पोलियो के वायरस से संक्रमित आबादी हजारों में होगी। वर्तमान में पोलियो का जो टीका है उसके इस्तेमाल लगभग 60 वर्ष पहले यूरोप में और बाद में दुनिया के अन्य देशों में शुरू किया गया था।

मानव के आधुनिक इतिहास में इसे सफलतम टीकों में शुमार किया जाता है, पर अब वैज्ञानिकों के लिए यही टीका चिंता का कारण बन चुका है। इसके टीके के वायरस ही अब पोलियो फैला रहे हैं। लन्दन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन की विशेषज्ञ कैथलीन ओ रेइली के अनुसार इस तरह से पोलियो का प्रसार निश्चित तौर पर चिंता का विषय है, और इसका बढ़ता भौगोलिक दायरा खतरनाक होता जा रहा है।

वैज्ञानिकों ने पोलियो की वैक्सीन से फ़ैलाने वाले पोलियो के लिए भी नया टीका ईजाद कर लिया है, और इसके सारे परीक्षण सफल रहे हैं, पर इसे अब तक लाइसेंस नहीं दिया गया है। पोलियो पर काम करने वाले अधिकतर वैज्ञानिक चाहते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन इस नए टीके को इमरजेंसी यूज लिस्टिंग प्रोसेस के तहत व्यापक उपयोग की स्वीकृति दे। वैज्ञानिक इस सन्दर्भ में कोविड 19 के टीके का हावाला दे रहे हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन इमरजेंसी यूज लिस्टिंग प्रोसेस के तहत ही स्वीकृति प्रदान कर रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन को उम्मीद थी कि वर्ष 2019 में दुनिया से पोलियो का नामोनिशान मिट जाएगा, पर इस संगठन में पोलियो अनुसंधान के मुखिया रोलैंड सतर के अनुसार ऐसा अब मुमकिन नहीं हो सका और ताजा हालात में यह बताना भी कठिन है कि दुनिया पोलियो-मुक्त कब होगी? विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और रोटरी फाउंडेशन वर्ष 1988 से दुनिया को पोलियो मुक्त करने का प्रयास कर रहे हैं और इस कार्यक्रम पर लगभग 16 अरब डॉलर खर्च किये जा चुके हैं। इस वर्ष दुनिया के अधिकतर देशों में कोविड 19 के कहर के कारण पोलियो के टीकाकरण का काम नहीं किया जा सका है।

भारत में 2014 के बाद पोलियो के नए मामले सामने नहीं आये हैं और वर्ष 2016 में पोलियो मुक्त घोषित किया जा चुका है, पर समस्या पड़ोसी देश पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ है। पाकिस्तान में तो पोलियो के मामले बढ़ते जा रहे हैं। पिछले वर्ष पाकिस्तान में पोलियो के 51 मामले सामने आ चुके थे, जो वर्ष 2018 की तुलना में चार गुना से भी अधिक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की परेशानी यह है कि पाकिस्तान में चार-गुना अधिक मामले ऐसे महीनों में सामने आये जब पोलियो के वायरस लगभग निष्क्रिय रहते हैं। इसका मतलब यह है कि आने वाले महीनों में इससे कहीं अधिक मामले उजागर होंगे। पिछले वर्ष पाकिस्तान से पोलियो के वायरस इरान तक पहुँच गए थे। दुनिया में तीन देश ऐसे हैं – पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और नाइजीरिया - जहां पोलियो के प्राकृतिक वायरस अभी तक मौजूद हैं। तीनों ही देश राजनैतिक तौर पर अस्थिर हैं, जिससे समय-समय पर टीके का काम बाधित होता है।

'दो बूँद जिन्दगी के' ने हमारे देश से तो पोलियो को मिटा दिया, पर पड़ोसी देश से इसके वायरस दुबारा देश में प्रवेश नहीं करेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। दुनिया के अधिकतर देशों में पोलियो के टीकाकरण का काम जोर—शोर से चलाया गया, पर अनेक देशों में कई उग्रवादी संगठनों ने इसका विरोध भी किया था। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने इसका विरोध किया और इस कार्यक्रम को लोगों तक पहुँचने नहीं दिया।

पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता ने इस कार्यक्रम को प्रभावित किया। पिछले वर्ष वहां के चुनावों के समय लम्बे अंतराल तक इस कार्यक्रम पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। अब तो इंतज़ार इस बात का है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन कब दुनिया को पोलियो-मुक्त घोषित करता है।

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