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विमर्श

सिंगरौली में घुलते जहर से कृषि उपज हुई आधी, सूख रहीं नदियां, फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त है बड़ी आबादी

Janjwar Desk
19 July 2020 6:30 AM GMT
सिंगरौली में घुलते जहर से कृषि उपज हुई आधी, सूख रहीं नदियां, फेफड़े की बीमारी से ग्रस्त है बड़ी आबादी
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ऊर्जा राजधानी सिंगरौली का स्याह सच मुख्य धारा मीडिया में कम ही चर्चा में आ पाता है। इसकी वास्तविक स्थिति पर किए गए भिन्न अध्ययन हालात की गंभीरता को बयान करते हैं...

राज कुमार सिन्हा का विश्लेषण

सिंगरौली विंध्य प्रदेश का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। जहां हरिजन, आदिवासी की बहुलता और जीवन यापन का मुख्य आधार प्राकृतिक संपदा थी।जब इस क्षेत्र के भू. गर्भ में कोयले के अतुल भंडार, वन संपदा एवं जल की प्रचुर मात्रा आदि ज्ञात हुआ। तब 1957 में रेलवे लाइन का काम शुरू हुआ और 1963 से निकाला गया कोयला पश्चिम क्षेत्र में स्थित ताप संयंत्रों को निर्यात किया गया। विद्युत संयंत्रों का निर्माण कोयला क्षेत्र के समीप ज्यादा मितव्ययी होने के उद्देश्य से सिंगरौली क्षेत्रों को प्रमुख ऊर्जा केंद्र हेतु सर्वाधिक उपयुक्त पाया गया। राष्ट्रीय ऊर्जा राजधानी बनने के दृष्टिकोण से विकसित क्षेत्र का अधिकांश भाग मध्यप्रदेश के सिंगरौली तथा कुछ भाग उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में आता है। कोयला भंडार से परिपूर्ण इस क्षेत्र में विद्युत उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पानी के लिए 60 के दशक में रिंहद नदी पर बांध बनाया गया।


आज इस क्षेत्र में 21 हजार मेगावाट की 10 थर्मल पावर प्लांट और नार्दन कोल लिमिटेड यानी एनसीएल समेत निजी कम्पनियों की 16 कोल माइन्स संचालित हैं, जिससे लगभग 70 मिलियन टन अर्थात 7 करोड़ मिट्रिक टन कोयला प्रति वर्ष निकाला जाता है।एनसीएल के चेयरमैन पीके सिन्हा ने दिसम्बर 2019 के एक कार्यक्रम में कहा कि सिंगरौली क्षेत्र में 2021 तक 10 करोड़ 60 लाख मैट्रिक टन और 2023.24 के लिए 11 करोड 50 लाख मैट्रिक टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए क्षेत्र में मोरवा बाज़ार, पिटरवाह, सुलियरी, सिधौली, बरका महुली आदि नये कोल ब्लॉक से उत्पादन करने की तैयारी चल रही है। देश के कुल कोल रिजर्व का आठ प्रतिशत मध्यप्रदेश में है। सिंगरौली सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र है।


जिले के चितरंगी क्षेत्र में चकरिया और गुरार पहाड़ में सोने के अयस्क का पर्याप्त भंडार है। 147 हैक्टयर में सरकार ने खनन का निर्णय लिया है। सिंगरौली क्षेत्र के थर्मल पावर प्लांट और कोयला बेचने से लगभग 5 हजार करोड़ का राजस्व पैदा होता है। परंतु विषमता देखिये नीति आयोग ने 2018 में देश के 20 अति पिछड़े जिलों में सिंगरौली शामिल है।

ये है असली असली विकास का चेहरा?

1991 में विश्व बैंक और एनटीपीसी द्वारा गठित पर्यावरणीय आयोग ने पाया कि 90 प्रतिशत स्थानीय समुदाय को इन सभी उद्योगों के कारण एक बार विस्थापित किया गया है और इसमें से 35 प्रतिशत लोगों को बार-बार विस्थापित होना पड़ा है। विगत एक साल में एस्सार, एनटीपीसी और सासन रिलांयस पावर प्लांट का राखड़ बांध टूटने से छह लोगों की मौत हुई, दर्जनों मवेशी मारे गए और सैकड़ों एकड़ फसल बर्बाद और जमीन बंजर हो गयी। 6 अक्तूबर 2019 को एनटीपीसी विंध्यांचल का शाहपुर स्थित विशालकाय राखड़ बांध टूट गया था।इससे 35 मैट्रिक टन राख रिंहद बांध में समा गया जो नदी के पानी को जहरीला करेगा। रेणुका नदी पर बने इस बांध से सोनभद्र और सिंगरौली जिले के लाखों लोगों के लिए पेयजल व्यवस्था की जाती है।

देश की ऊर्जा राजधानी के रूप में ख्यात सिंगरौली क्षेत्र गहरे संकट की ओर बढ़ रहा है। जो जमीन कभी घने जंगलों, वन्य जीवों और भारी वर्षात के कारण बीहड़ और रहस्यमंय मानी जाती थी, वह आज उजाड़ है। हवा में जहर घुल गया है, चारों तरफ कोयला की राख और धूल ने खेतों और पानी के स्रोतों को जहरीला बना दिया है। नदियां सुखती जा रही है और खेती की उपज आधी हो गई है। पूरी आबादी फेफड़े और पेट की तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त है। बच्चे कई गंभीर बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के निर्देश पर गठित विशेषज्ञ कोर कमेटी की रिपोर्ट भी यहां की मुसीबतों का कुछ ऐसा ही उल्लेख करती है।

कोर कमेटी के आंकड़े अनुसार इस क्षेत्र में 350 से अधिक उद्योग संचालित हैं। इसमें 10 थर्मल पावर प्लांट, 16 कोल माइन्स, 10 केमिकल कारखाने, 8 एक्सपलोसिव, 309 क्रशर और स्टील, सीमेंट एवं अल्युमिनियम का एक-एक उद्योग है। जिससे करीब 45 लाख टन कचरा हर साल उत्सर्जित होता है। इसमें लगभग 35 लाख टन तो सिर्फ़ कोयले की राख है। 21 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन करने के लिए साल भर में 10.3 करोड़ टन कोयले की जरूरत होती है। इतनी बड़ी मात्रा में कोयले की खपत से हर साल 3.5 करोड़ टन फ्लाई ऐश यानी पैदा होता है, जिसका सही तरीके से निस्तारण नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा 10 लाख टन से अधिक लाल कीचड़ यानी रेड मड व अन्य रसायन उत्सर्जित होते हैं। परंतु इसके निस्तारण के लिए उचित प्रबंध नहीं होने के कारण 20 लाख टन से अधिक कचरा सिंगरौली क्षेत्र में खुले में फेंका जा रहा है।

कमेटी रिपोर्ट के अनुसार करीब 17 हजार टन सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन आक्साइड जैसी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक गैस हवा में तैरने के साथ ही हर साल 8.4 हजार टन यानी 8.4 लीटर मरकरी भी पावर प्लांटों से निकल रहा है, जो इस इलाके की जल संरचनाओं में समाहित हो रही है। मरकरी की इतने बड़े पैमाने पर मौजूदगी मानव भर ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी अत्यधिक खतरनाक बताया गया है।

राख से खाक होते जिंदगी को बचाने के लिए कमेटी ने कुछ सुझाव भी दिये हैं। पीने के पानी का किसी भी तरह से उद्योगों में इस्तेमाल नहीं हो, बांध के समीप सभी राखड़ बांध हटाया जाए, कोयले की ढुलाई किसी भी स्थिति में सड़क मार्ग से नहीं हो, सिंगरौली और सोनभद्र जिला निकाय वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाए। वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एंवियेंट क्वालिटी सिस्टम लगातार सक्रिय रहने जैसी महत्वपूर्ण सुझाव भी इसमें शामिल हैं। परंतु बीते चार सालों में इन सुझावों पर अमल हुआ होता तो राखड़ बांध फूटने जैसी हादसा से बचा जा सकता था। विकास में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी जैसे सवालों पर वर्षों से केवल राजनीति हो रही है और विकास के नाम पर स्थानीय समुदाय की बलि चढ़ाई जा रही है।

(लेखक बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से संबद्ध हैं।)


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