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नरसंहार कर रही म्यांमार की सेना को मोदी क्या अडानी के फायदे के लिए दे रही समर्थन

Janjwar Desk
13 March 2021 4:54 AM GMT
नरसंहार कर रही म्यांमार की सेना को मोदी क्या अडानी के फायदे के लिए दे रही समर्थन
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अडानी समूह के मालिक गौतम अडानी प्रधानमंत्री नरेेंद्र मोदी के साथ। फाइल फोटो।

यूनाइटेड किंगडम का प्रस्ताव सख्त शब्दों में म्यांमार की फ़ौज की भर्त्सना कर रहा था और सख्त कार्यवाही की पक्ष में था। पर, भारत, चीन, रूस और वियतनाम के विरोध के बाद इसे पूरी तरह बदल दिया गया और जो प्रस्ताव पारित किया गया है उसमें न तो सेना की भर्त्सना है और ना ही किसी कार्यवाही की बात की गयी है....

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। देश की मोदी सरकार को म्यांमार में सेना द्वारा लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कहीं से भी ऐसा नहीं लगता जिसकी भर्त्सना भी की जा सके। अपने देश में वर्ष 2014 के बाद से लोकतंत्र जिस हालत में है, उसमें मोदी सरकार का यह रवैय्या कहीं से भी आश्चर्यजनक नहीं है, आखिर ट्रम्प जैसे तानाशाह के लिए "अबकी बार ट्रम्प सरकार" का नारा भी तो मोदी जी ने लगाया था - ब्राज़ील के तानाशाह बोल्सेनारो, मानवाधिकार के हनन के लिए कुख्यात इजराइल के प्रधानमंत्री, अपने विरोधियों को विषपान कराने वाले रूस के पुतिन, मानवाधिकार का लगातार हनन करने वाले सऊदी अरब के शासक भी तो मोदी जी के सबसे अच्छे मित्रों में शुमार हैं।

म्यांमार की सेना के साथ अडानी के व्यापारिक रिश्ते भी हैं, जाहिर है मोदी जी अडानी के व्यापारिक नुकसान का कोई काम नहीं करेंगे।

यूनाइटेड किंगडम ने संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद् में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था, जिसमें म्यांमार की सेना द्वारा लोकतांत्रिक सरकार को हिंसक तरीके से गिराए जाने की भर्त्सना की गयी थी और सेना के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत कार्यवाही की बात की गयी थी। सुरक्षा परिषद् में इस प्रस्ताव का चीन, रूस, भारत और विएतनाम ने सख्त विरोध किया। ये चारों देश आसियान के सदस्य हैं, जिसका एक सदस्य म्यांमार भी है।

इन दिनों पूरी दुनिया में मानवाधिकार और नरसंहार कोई मुद्दा ही नहीं है, कुछ देश ऐसे हैं जो इसके विरुद्ध आवाज उठाते हैं, पर सख्त कदम कोई नहीं उठाता। जिस तरह आसियान के सदस्य होने के कारण म्यांमार की तख्ता पलट करने वाली सेना के समर्थन में सदस्य देश खड़े हैं, उसी तरह जी-20 का सदस्य होने के कारण सऊदी अरब को मानवाधिकार हनन की खुली छूट मिली है।

यूनाइटेड किंगडम का प्रस्ताव सख्त शब्दों में म्यांमार की फ़ौज की भर्त्सना कर रहा था और सख्त कार्यवाही की पक्ष में था। पर, भारत, चीन, रूस और वियतनाम के विरोध के बाद इसे पूरी तरह बदल दिया गया और जो प्रस्ताव पारित किया गया है उसमें न तो सेना की भर्त्सना है और ना ही किसी कार्यवाही की बात की गयी है। बस, इतना कहा गया है की सेना को संयम का परिचय देना चाहिए और राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को तत्काल रिहा करना चाहिए। यूनाइटेड किंगडम के मौलिक प्रस्ताव को इतना बदला गया की इसे प्रस्ताव के तौर पर नहीं बल्कि प्रेसिडेंशियल स्टेटमेंट के तौर पर पारित करना पड़ा। सुरक्षा परिषद् में प्रेसिडेंशियल स्टेटमेंट का महत्त्व बस उतना ही होता है जितना रद्दी कागज़ के किसी टुकडे का।

अडानी की कंपनी ने म्यांमार के यांगून में कंटेनर पोर्ट विकसित करने का काम कर रही है। कंटेनर पोर्ट जहां विकसित किया जा रहा है वह भूमि म्यांमार इकोनोमिक कोऑपरेशन नामक संस्था के पास है, जिसका स्वामित्व म्यांमार की फौज के पास है। यानी इस परियोजना का मुनाफा वहां की फ़ौज के पास पहुंचेगा।

वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र ने एक तीन सदस्यीय दल बनाया था जिसे म्यांमार की फौज द्वारा किये जाने वाले मानवाधिकारों के उल्लंघन और नरसंहार के बारे में जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी। म्यांमार की फौज ने रोहिंग्या लोगों के साथ जो अमानवीय व्यवहार किया था, इसी की पुष्टि करने के लिए यह रिपोर्ट बनायी गयी। वहां की फ़ौज ने संयुक्त राष्ट्र के किसी भी सदस्य को म्यांमार में प्रवेश नहीं करने दिया था। फिर इस दल के सदस्यों ने लगभग 875 विस्थापितों के साक्षात्कार के आधार पर 440 पृष्ठों की एक रिपोर्ट सितम्बर 2018 में प्रस्तुत किया। ये सभी विस्थापित फ़ौज द्वारा रोहिंग्या के शोषण और नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी भी थे।

इस रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार की फ़ौज नरसंहार, ह्त्या, बिना कारण जेल में डालना, महिलाओं और बच्चियों से बलात्कार, बच्चों के शोषण और इनके गाँव में आगजनी के लिए दोषी है। रिपोर्ट में सभी देशों से अनुरोध किया गया है कि वे म्यांमार की फ़ौज के साथ किसी भी तरह के रिश्ते न रखें। इसके बाद भी अडानी की कंपनी के इसी फ़ौज के साथ व्यापारिक रिश्ते हैं। ऑस्ट्रेलिया के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अडानी की ऑस्ट्रेलिया में खनन परियोजना से जो लाभ होगा, उसे म्यांमार की परियोजना में लगाया जाएगा।

इसका सीधा मतलब यह है कि अडानी ऑस्ट्रेलिया की कमाई से ऐसे लोगों का भला करेंगे जो मानवाधिकार हनन और नरसंहार के लिए जिम्मेदार हैं। जैसी कि उम्मीद थी, अडानी की कंपनी ने एक बयान जारी कर कहा है कि उनकी कंपनी ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका या फिर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार से सम्बंधित किसी दिशा-निर्देश का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं।

जब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ही कहती हो कि म्यांमार की सेना से किसी भी तरह के सम्बन्ध नहीं रखे जाएँ, फिर संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार के दिशा निर्देशों का उल्लंघन कैसे नहीं हो रहा है, इसका जवाब तो केवल अडानी ही दे सकते हैं। यहाँ ध्यान रखने वाली बात है कि 50 वर्षों के इस परियोजना की लागत 29 करोड़ अमेरिकी डॉलर है और विदेशों में काम करने के लिए जितनी भी अनुमति चाहिए वह मोदी सरकार इस परियोजना को प्राथमिकता के आधार पर पहले ही दे चुकी है।

अपने 75 वर्ष पूरे होते-होते संयुक्त राष्ट्र सामान्य जनता के लिए अपना पूरा महत्त्व खो चुका है, अब यह उन देशों की धरोहर बन गया है जो जनता का दमन करते हैं और मानवाधिकार का खुले आम हनन करते हैं। ऐसे देश दुनिया की नज़रों में अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की सम्बंधित संस्थाओं के सदस्य पद पर पहुँच जाते हैं।

दुनिया में भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान, मेक्सिको और क्यूबा जैसे देश मानवाधिकार हनन के मामले में अग्रणी हैं और ये सभी देश संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संरक्षण से जुडी संस्था, ह्यूमन राइट्स काउंसिल के सदस्य भी हैं और ऐसे देशों को सदस्य बनाने के लिए बड़ी संख्या में अन्य देश भी समर्थन करते हैं।

हाल में ही वर्ष 2021 से 2023 तक के लिए ह्यूमन राइट्स काउंसिल के सदस्यों के चुनाव में चीन, पाकिस्तान, रूस, मेक्सिको और क्यूबा के अतिरिक्त बोलीविया, कोटे द आइवरी, फ्रांस, गैबन, मलावी, नेपाल, सेनेगल, यूक्रेन, यूनाइटेड किंगडम और उज्बेकिस्तान की जीत हुई है और ये देश दुनिया के मानवाधिकार की अब निगरानी करेंगें। भारत वर्ष 2019 से 2021 तक के लिए इसका सदस्य है।

दुनिया में मानवाधिकार का क्यों अधिक से अधिक हनन किया जा रहा है, यह इन देशों की सूची से समझा जा रहा है। लगभग सभी मानवाधिकार संगठनों और कार्यकर्ताओं के अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार काउंसिल अपनी गरिमा खो चुका है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान इसके अधिकतर चुने गए सदस्य स्वयं अपने देश में मानवाधिकार का खुलेआम हनन कर रहे हैं, और अपने कारनामों पर पर्दा डालने और अपने विरुद्ध आवाज दबाने के लिए इस काउंसिल की सीट का उपयोग करते हैं।

इस बीच म्यांमार में 1 फरवरी को सेना द्वारा तख्ता पलट के बाद से लगभग 70 लोग मारे जा चुके हैं और 2000 से अंधिक आन्दोलनकारियों को जेल में बंद कर दिया गया है। पूरी दुनिया लोकतंत्र की इस हत्या का तमाशा देख रही है और तालियाँ पीट रही है।

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