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Gender Equality : आइसलैंड की संसद में महिलाओं की संख्या हुई पुरुषों से ज्यादा, क्या वाकई बढ़ेगी लैंगिक समानता

Janjwar Desk
28 Sep 2021 4:54 PM GMT
Gender Equality : आइसलैंड की संसद में महिलाओं की संख्या हुई पुरुषों से ज्यादा, क्या वाकई बढ़ेगी लैंगिक समानता
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आइसलैंड की महिला प्रधानमंत्री कैटरीन जेकब्सदातिर, संसद में महिलाओं का बहुमत (photo : twitter)

कहा जा रहा है आइसलैंड में महिला सांसदों की बड़ी संख्या से दुनिया में लैंगिक समानता को नई दिशा मिलेगी, पर दूसरी तरफ मेक्सिको और संयुक्त अरब अमीरात का उदाहरण हमारे सामने है जहां 50 प्रतिशत महिला सांसदों के बाद भी महिलायें आजाद नहीं हैं...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

जनज्वार। हाल के चुनावों के पहले राउंड के नतीजों के बाद आइसलैंड पहला यूरोपीय देश बन गया था (Iceland became first European country) जहां की संसद, अल्थिंग (Althing), में महिला सदस्यों की संख्या पुरुष सदस्यों से अधिक हो गयी थी, पर दूसरे राउंड के नतीजों के बाद स्थिति बदल गयी और महिला सांसदों की संख्या 48 प्रतिशत रह गयी। वहां संसद में 63 सीटें हैं और इसमें महिलाओं की संख्या पहले राउंड के नतीजों के बाद 52 प्रतिशत यानि 33 थी, जबकि दूसरे और आखिरी राउंड के नतीजों के बाद महिला सदस्यों की संख्या 30 यानि 48 प्रतिशत रह गयी।

यूरोप में महिला संसद सदस्यों के मामले में आइसलैंड के बाद स्वीडन (Sweden) है, जहां 47 प्रतिशत महिलायें हैं। यूरोपीय देशों में यह संख्या सर्वाधिक है। यह खबर इसलिए विशेष है क्योंकि इस वर्ष 2021 में लैंगिक समानता और सशक्तीकरण (Gender equality & Empowerment) से सम्बंधित बहुत कम समाचार मिले हैं, हालांकि इस वर्ष के शुरू में ही यूरोप का देश, एस्तोनिया (Estonia), इस दौर में अकेला देश बना जहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों महिलायें हैं। इसके बाद म्यांमार (Myanmar) में प्रधानमंत्री आंग सुकी (Aang Sui Ki) की सरकार का सेना ने तख्ता पलट दिया।

अफ़ग़ानिस्तान (Afghanistan) में महिलाओं को बराबरी का दर्जा था, पर अब उनकी हरेक गतिविधि पर तालिबान (Taliban) ने अंकुश लगा दिया। दुनिया के सभी पुरुष राष्ट्राध्यक्षों को चुनौती देने वाली जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल (Angela Markel, Former German Chancellor) का युग ख़त्म हो गया।

आइसलैंड, यूरोप का अकेला देश होता पर दुनिया का अकेला देश नहीं होता जहां महिला संसद सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत या इससे अधिक होती, बल्कि दुनिया के 5 देशों में यह स्थिति है। महिला संसद सदस्यों के सन्दर्भ में सबसे आगे रवांडा (Rwanda) है, जहां यह संख्या 61 प्रतिशत है, इसके बाद क्यूबा (Cuba) में 53 प्रतिशत, निकारागुआ (Nicaragua) में 51 प्रतिशत, मेक्सिको (Mexico) में 50 प्रतिशत और आश्चर्यजनक तौर पर यूनाइटेड अरब एमिरात (United Arab Emirates) में भी महिला संसद सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत है। आइसलैंड में संसद में महिलाओं के लिए कोई आरक्षण नहीं है, जबकि अधिकतर लैटिन अमेरिकन, अफ्रीकी और प्रशांत क्षेत्र के देशों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान है।

हमारे देश में राज्य सभा (Upper House) और लोक सभा (Lower House) मिलाकर महिला संसद सदस्यों की संख्या 13 प्रतिशत है, जिसे देश के इतिहास में सर्वाधिक कहा जाता है। राज्य सभा के कुल 245 सदस्यों में से 25 महिलायें हैं, जबकि लोकसभा की 543 सीटों में से 78 महिलायें हैं। हमारे देश के राजनीतिक दलों (Political Parties) की विशेषता यह है कि सभी दल चुनावों से पहले तक लैंगिक समानता की बाते लगातार करते हैं, पर चुनावों में टिकट दुर्दांत अपराधी पुरुषों को प्राथमिकता के आधार पर दिया जाता है।

आइसलैंड की विशेषता यह है कि यूरोप का यह पहला देश था जहां 1980 में महिला सदस्य को चुना गया था। यहाँ हमेशा राजनैतिक अस्थिरता (Political Instability) का माहौल रहता है और वर्ष 2007 से 2017 के बीच इस अस्थिरता के कारण 5 बार चुनाव कराने पड़े थे। वर्ष 2017 में लेफ्ट ग्रीन मूवमेंट की जकोब्सदोत्तिर (Ms Jakobsdottir of Left Green Movement) के नेतृत्व में विभिन्न दलों के गठबंधन की सरकार बनाई जिसने पूरे 4 वर्षों का कार्यकाल पूरा किया।

वर्ष 2008 के बाद यह केवल दूसरा मौका था जब चुनावों के बाद चुनी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया हो। इस गढ़बंधन (coalition) ने फिर से बहुमत हासिल किया है, पर जकोब्सदोत्तिर के भविष्य पर अभी प्रश्नचिह्न लगा हुआ है, उनके दल को पिछले चुनावों की तुलना में कम सीटें मिली हैं। जकोब्सदोत्तिर के दल की लोकप्रियता भले ही कम हो गयी हो पर उनकी अपनी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। कोविड 19 के बेहतरीन रोकथाम वाले नेताओं के तौर पर उन्हें जाना जाता है।

आइसलैंड की कुल आबादी लगभग 4 लाख है और वहां कोविड 19 से केवल 33 मौतें दर्ज की गईं हैं। इसके अलावा जकोब्सदोत्तिर ने प्रोग्रेसिव इनकम टैक्स (Progressive Income Tax) को लागू किया, सोशल हाउसिंग के बजट (Budget of Social Housing Scheme) को बढ़ाया और महिला कर्मचारी के गर्भवती होने पर मातृत्व अवकाश (maternity leave) के साथ ही पितृत्व अवकाश को भी लागू किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने लैंगिक समानता के साथ ही हैप्पीनेस इंडेक्स (Happiness Index) और दूसरी सामाजिक सरोकारों वाले अंतरराष्ट्रीय इंडेक्स में लगातार अपने देश को शीर्ष पर बनाए रखा। आइसलैंड के चुनावों में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) सबसे प्रमुख मुद्दा था, और इसकी रोकथाम के लिए जकोब्सदोत्तिर ने लगातार प्रयास किया था।

यूएन वीमेन (UN Women)) के अनुसार वर्ष 1960 के बाद से दुनिया के 57 देशों में 71 महिलायें राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री का पद संभाल चुकी हैं, जिनमें से लगभग एक-तिहाई चुनाव जीतकर नहीं बल्कि किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की मृत्यु के बाद शेष कार्याकार के लिए नामित की गईं थीं। दुनिया में सबसे पहले देश की सत्ता संभालने का काम श्रीमाओ भंडारनायके ने श्री लंका (Srimao Bhandarnayake in Sri Lanka) में किया था। हमारे देश में भी एक महिला प्रधानमंत्री और एक महिला राष्ट्रपति रही हैं। फ़िनलैंड और न्यूज़ीलैण्ड दो ऐसे देश हैं जहां महिलायें तीन बार सत्ता संभाल चुकी हैं। दूसरी तरफ चीन, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब और अमेरिका में आजतक कोई राष्ट्राध्यक्ष महिला नहीं रहीं हैं। पिछले अमेरिकी चुनावों में पहली बार एक महिला उपराष्ट्रपति कमला हैरिस चुनी गईं।

इस समय दुनिया में 24 देशों में 25 महिलायें राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के पद पर हैं, यह संख्या बड़ी जरूर लगती है पर यू एन वीमेन के आकलन के अनुसार इस दर से राष्ट्राध्यक्ष की लैंगिक समानता में 130 वर्ष और लगेंगे। दुनिया में 21 प्रतिशत मंत्री महिलायें हैं, जिनमें से 14 देश ऐसे भी हैं जहां महिला मंत्रियों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। दुनिया में 25 प्रतिशत संसद सदस्य महिलायें हैं और कुल 6 ऐसे देश हैं जहां महिला संसद सदस्यों की संख्या 50 प्रतिशत या अधिक है। महिला संसद सदस्यों और महिला मंत्रियों के सन्दर्भ में भारत वैश्विक औसत संख्या से बहुत पीछे है। कुल 19 देशों में कुल संसद सदस्यों में से 40 प्रतिशत से अधिक महिलायें हैं – इनमें से 9 यूरोप में, 5 दक्षिण अमेरिका में, 4 अफ्रीका में और 1 प्रशांत क्षेत्र में है।

कहा जा रहा है कि आइसलैंड में महिला सांसदों की बड़ी संख्या से दुनिया में लैंगिक समानता को नई दिशा मिलेगी, पर दूसरी तरफ मेक्सिको और संयुक्त अरब अमीरात का उदाहरण हमारे सामने है जहां 50 प्रतिशत महिला सांसदों के बाद भी महिलायें आजाद नहीं हैं।

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