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Xi Jinping की ताकत में इजाफे का भारत पर क्या होगा असर?

Janjwar Desk
16 Oct 2022 10:29 AM GMT
सीसीपी में Xi Jinping की ताकत में इजाफे का भारत पर क्या होगा असर?
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सीसीपी में Xi Jinping की ताकत में इजाफे का भारत पर क्या होगा असर?

Indo-China relation : चीन के साथ अपने संबंधों को लेकर भारतीय नेतृत्व स्पष्ट नहीं है। उसे यही नहीं पता है कि वो किस नीति पर आगे बढ़े। एक तरफ भारत सीमा विवाद को लेकर चीन पर हमले करता रहता है लेकिन दूसरी तरफ भारत ब्रिक्स जैसे संगठनों में चीन के साथ है।


शी जिनपिंग की शक्ति में इजाफा और भारत-चीन संबंध पर धीरेंद्र मिश्र की रिपोर्ट

Indo-China relation : चीन ( China ) के इतिहास में माओत्से तुंग (Mao Zedong) के बाद अगर कोई सबसे ताकतवर नेता रहा है तो वह शी जिनपिंग (Xi Jinping) ही हैं। इस बीच 16 अक्टूबर से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ( CPP ) का अधिवेशन शुरू हो चुका है। इस बात की पूरी संभावना है कि मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग को तीसरी बार सत्ता सौंपने पर मुहर लग सकती है।

फिलहाल, 2012 से शी जिनपिंग ( Xi Jinping ) चीन ( China ) के सर्वोच्च नेता हैं। वह आजीवन इस पद पर बने रह सकते हैं। खास बात यह है कि वो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ( China Communist party ) के महासचिव और चीनी सेना के प्रमुख भी हैं। यानि सभी शक्तियां उन्हों के हाथों में है। वो जो चाहें वो कर सकते हैं।

यही वजह है कि भारत ( India ) सहित पूरी दुनिया की नजर सीसीपी ( CCP ) के अधिवेशन पर है। इसलिए अहम सवाल यह है कि शी जिनपिंग का तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने पर उनका अगला क़दम क्या होगा और उसका भारत और चीन के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा। क्या भारत-चीन संबंधों ( Indi-China relations ) में सुधार की गुंजाइश है।

सवालों के घेरे में भारत-चीन के रिश्ते

वैसे तो भारत चीन के संबंध कभी अच्छे नहीं रहे। 1962 के बाद तो दोनों के बीच संबंध पूरी तरह से खराब हो गए थे। हां, हू जिंताओ और वेन जियाबाओ के कार्यकाल में भारत और चीन के संबंधों में काफी सुधार देखने को जरूर मिले थे। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने संबंधों को सुधारने और बेहतर करने में काफी अहम रोल अदा किया था। 2014 मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शुरू के दो-तीन सालों में चीन और भारत के संबंध ठीक रहे। मोदी ( PM Modi ) चीन गए और शी जिनपिंग भारत आये। इस बीच डोकलाम (2017) और गलवान (2020) के बाद दोनों देशों के बीच संबंध फिर से खटाई में पड़ गए हैं।

भारत को इस बात की आशंका है कि भविष्य में संघर्ष की कोई सूरत बनी तो चीनी सैनिक डोकलाम का इस्तेमाल भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जे के लिए कर सकते हैं। सिलिगुड़ी कॉरिडोर भारत के नक्शे में मुर्गी के गर्दन जैसा इलाका है। ये पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ता है। हालांकि ये भारत का ये डर निर्मूल आशंका भी हो सकता है।

शी जब से सीसीपी के 2012 में अध्यक्ष और 2013 में राष्ट्रपति बने तभी से संबंधों में सुधार के जो झलग दिखाई दिए थे वो ओझल होने लगे। मई 2013 में जिनपिंग के सत्ता संभालने के बाद चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ली कचीयांग भारत आये थे। उससे ठीक पहले चीनी सैनिक एलएसी पर लद्दाख़ के डेपसांग में घुस गए थे और चीनी सैनिक तभी वापस गए थे जब भारत ने धमकी दे दी थी कि कचीयांग की भारत यात्रा रद्द कर दी जाएगी। मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बने तो चीन ने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश किया जो व्यापार को बढ़ावा देना चाहते हैं और आर्थिक विकास उनका मुख्य एजेंडा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग सितंबर 2014 में भारत आये लेकिन इस बार भी उनकी यात्रा शुरू होने से ठीक पहले पूर्वी लद्दाख़ के चुमर सेक्टर में चीनी सैनिकों ने घुसपैठ किया था। गलवान तो सिर्फ एक प्वाइंट है, पर सच यह है कि एलएसी पर ऐसी कई जगहें हैं जहां चीनी सैनिकों ने घुसपैठ कर रखी है।

XI भी इंडो-यूएस निकटता से परेशान

इस बीच यूपीए वन और टू और फिर मोदी के काल में भारत-अमेरिका के रिश्तों में सुधार से शी जिनपिंग ( Xi Jinping ) सशंकित हो गए हैं। भारत और चीन के संबंधों में आई कड़वाहट की सबसे बड़ी वजह यही है। यहां पर इस बात की जानकारी भी दे दें कि पूर्व पीएम वाजपेयी ने भारत को अमेरिका के नज़दीक ले जाने की जो शुरुआत की थी उसे मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के दौर में रफ्तार मिली। भारत और अमेरिका के बीच रक्षा संधि (2008) और फिर परमाणु संधि ने चीन को चिंतित कर दिया। इसके जवाब में दक्षिण चीन सागर और सीपेक (चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) पर जोर देकर चीन ने भारत को टेंशन में डाल रखा है। सीपेक का कई हिस्सा पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रता है जिसे भारत अपना क्षेत्र मानता है। धीरे-धीरे दोनों देशों के संबंध ख़राब होते चले गए लेकिन पिछले पांच साल में क्वाड (क्वाड्रीलेटरल सुरक्षा समूह जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ) और ऑकस (अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ) के बीच सुरक्षा साझेदारी कारण भारत और चीन की दूरियां और बढ़ गईंं।दरअसल, चीन अमेरिका को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता है और इसलिए कोई भी अगर अमेरिका के क़रीब जाएगा तो चीन को उससे दिक़्क़त होगी।

भारत-चीन संबंधों में विरोधाभस भी कम नहीं

एक तरफ़ भारत और चीन के बीच सीमा विवाद चरम पर है तो दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। 2007 में दोनों देशों के बीच केवल तीन अरब डॉलर का व्यापार होता था। 2021-22 में यह बढ़कर 115 अरब डॉलर हो गया। 2021 में कोविड के बावजूद भारत-चीन व्यापार में 43 फीसदी का इजाफा हुआ। इसमें भारत और हॉन्ग कॉन्ग के बीच होने वाला व्यापार शामिल नहीं है जो कि क़रीब 34 अरब डॉलर है। जबकि भारत के लिए यह बहुत बड़ा घाटे का सौदा है। 2001 में व्यापार घाटा 1.08 अरब डॉलर था जो कि साल 2021-22 में बढ़कर क़रीब 65 अरब डॉलर हो गया। व्यापार घाटे के अलावा भारत के लिए दूसरी चिंता है कि भारत ज़्यादातर कच्चा माल निर्यात करता है जबकि वो चीन से मनूफ़ैक्चर्ड गुड्स यानी तैयार माल आयात करता है। भारत कहता है कि चीन उसे अपने बाजार तक पहुंच देने में आना कानी करता है। आईटी और फार्मा के क्षेत्र में भारत को चीनी बाजार में पहुंच नहीं दे रहा है।

जलवायु परिवर्तन भी ऐसा ही विरोधाभास वाला मुद्दा है। कई मौके पर ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज और अन्य मुद्दों को लेकर चीन और भारत एक साथ खड़े दिखे हैं। ग्लास्गो सम्मेलन नवंबर 2021 में कोयला के फंज आउट योजना के मामले में पश्चिमी देशों को चुनौती देने के लिए भारत और चीन एक साथ आ गए थे। यूक्रेन के मुद्दे पर हाल ही में दोनों देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था। दूसरी हकीकत यह है कि चीन नहीं चाहता है कि भारत का आर्थिक विकास हो। चीन का असल मकसद भारतीय बाजार का फ़ायदा उठाने की है।

चीन को लेकर भारत की नीति स्पष्ट नहीं

कूटनयिक जानकार मानते हैं कि चीन के साथ अपने संबंधों को लेकर भारतीय नेतृत्व स्पष्ट नहीं है। उसे यही नहीं पता है कि वो किस नीति पर आगे बढ़े। एक तरफ भारत सीमा विवाद को लेकर चीन पर हमले करता रहता है लेकिन दूसरी तरफ भारत ब्रिक्स जैसे संगठनों में चीन के साथ है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार काउंसिल में चीन के अंदर मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में वार्ता पर हुई वोटिंग में भारत तटस्थ रहा। भारत ने वार्ता के पक्ष में वोट डाला था। चीन के मामले में भारत की तटस्थता दर्शाता है कि भारत को पता ही नहीं है कि चीन के साथ भविष्य में वो कैसा रिश्ता बनाना चाहता है।

बेहतरी के लिए सियासी समझ पर एक राय पहली शर्त

Indo-China relation : ऐसे में अगर शी जिनपिंग के तीसरी बार पार्टी महासचिव और फिर अगले साल 2023 में तीसरी बार राष्ट्रपति बनते हैं तो दोनों के संबंधों में क्या बदलाव आएगा। यहां पर यह गांठ बांध लेने की जरूरत है कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद जल्दी हल होने वाला नहीं है। दोनों देशों के बीच जब तक एलएसी के मामले में राजनीतिक समझदारी नहीं होगी, तब तक समस्या का समाधान होना संभव नहीं है। समस्या समाधान से पहले दोनों देशों के नेतृत्व के बीच भरोसा कायम होना जरूरी है। भरोसा कायम न होने की पीछे चीन को यह लगता है कि भारत पूरी तरह अमेरिकी ख़ेमे में चला गया है। सच यह है कि भारत थोड़ा बहुत अमेरिका का समर्थन लेता है, रूस से बहुत मदद लेता है। चीन के साथ भी संपर्क रखना चाहता है। ऐसा भारत इसलिए करता है कि विश्व राजनीति में आपको व्यवहारिक होना होता है। तो क्या सीमा विवाद जंग में तब्दील हो सकता है। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। या इसकी संभावना बहुत कम है। ऐसा इसलिए कि चीन भारत के साथ भले ही किसी भी तरह की रियायत न बरते लेकिन यह भी तय है कि शी जिनपिंग एलएसी पर विवाद को मैनेज करने की पूरी कोशिश करेंगे। ताकि मामला हद से पार न हो सके। यानि भविष्य में सीमा पर बड़ी हिंसा की कोई आशंका नहीं है क्योंकि दोनों देशों को इस बात का एहसास है कि इस तरह की हिंसक झड़प में किसी की भी जीत संभव नहीं है और ऐसा करके चीन दुनिया में और भी अलग-थलग पड़ सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध इस बात का उदाहरण है कि भारत भी पूरी तरह अमेरिकी ख़ेमे में कभी नहीं जाएगा क्योंकि उसे रूस की जरूरत है। पिछले कुछ समय से रूस और पाकिस्तान भी करीब आ रहे हैं। मध्यपूर्व, अफ़्रीका और लैटिन अमेरिका में चीन और भारत के हितों का टकराव होता रहेगा। ऐसे हालात में भारत-चीन के संबंधों में तत्काल सुधार की कोई उम्मीद नहीं है।

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