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वर्ष 2022 रहा पत्रकारों के लिए अब तक का सबसे खतरनाक साल, रिपोर्टिंग के दौरान 67 की हुई हत्या

Janjwar Desk
19 Dec 2022 5:06 AM GMT
वर्ष 2022 रहा पत्रकारों के लिए अब तक का सबसे खतरनाक साल, रिपोर्टिंग के दौरान 67 की हुई हत्या
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1 दिसम्बर 2022 तक 57 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है, 2022 में अब तक मारे गए पत्रकारों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 18.8 प्रतिशत अधिक है, इसके अलावा 49 पत्रकार लापता हैं और 65 का अपहरण किया जा चुका है...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

Year 2022 is most dangerous year for reporters as their murders rose to whooping 40 percent from previous year. वर्ष 2022 पत्रकारों के लिए पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बहुत खराब रहा है – सबसे अधिक पत्रकारों की हत्या की गयी है और अधिक पत्रकारों को जेल में बंद किया गया है। पूरी दुनिया में जिस तरह से प्रजातंत्र का खात्मा किया जा रहा है और अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाया जा रहा है – ऐसे में पत्रकारों पर बढ़ते खतरे दुःख का विषय हो सकता है, पर आश्चर्य का नहीं।

दूसरी तरफ मीडिया जगत भी पत्रकारों पर बढ़ते खतरे के प्रति उदासीन हो चली है। जब एलन मस्क ट्विटर से अपने विरुद्ध लिखने वाले कुछ यूरोपीय पत्रकारों का अकाउंट सस्पेंड कर देते हैं, तब अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इसकी खूब चर्चा की जाती है, पर ठीक उसी दिन मेक्सिको में राजधानी मेक्सिको सिटी में एक टीवी पत्रकार पर जानलेवा हमला होता है, तब मीडिया खामोश रहती है।

9 दिसम्बर को इन्टरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में 1 दिसम्बर तक दुनिया में 67 पत्रकारों को अपने काम के दौरान मारा जा चुका है। पूरे वर्ष 2021 के लिए यह संख्या 47 थी, यानि इस वर्ष 11 महीनों में ही मारे गए पत्रकारों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 40 प्रतिशत अधिक हो चुकी है।

हालांकि रिपोर्ट में इसका मुख्य कारण रूस-यूक्रेन युद्ध बताया गया है, जहां युद्ध क्षेत्र में 12 पत्रकार या फिर उनके साथ जुड़े मीडिया स्टाफ मारे जा चुके हैं। पर निश्चित तौर पर रूस-यूक्रेन युद्ध वैश्विक स्तर पर पत्रकारों पर बढ़ते खतरे का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वर्ष 2021 की तुलना में इस वर्ष शुरू के 11 महीनों में ही 20 अधिक पत्रकार मारे गए हैं। पत्रकारों की ह्त्या के सन्दर्भ में सबसे खतरनाक देशों में मेक्सिको, हैती, खाड़ी के देश, फिलीपींस और पाकिस्तान हैं। 1 दिसम्बर तक मेक्सिको में 11, हैती में 6 और खाड़ी के देशों में 5 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया पत्रकारों की ह्त्या पर तभी जागता है, जब पत्रकार यूरोपीय या अमेरिकी मूल का होता है। इसका उदाहरण ब्राज़ील के अमेज़न के जंगलों में मारे गए ब्रिटिश पत्रकार डॉम फिलिप्स और इजराइल-फिलिस्तिन के बीच गाजापट्टी पर इस्राईली सुरक्षा बालों द्वारा मारी गयी फिलिस्तिनी-अमेरिकी पत्रकार शिरीन अबू अक्लेह ही ह्त्या के तौर पर हम देख चुके हैं। इन दोनों पर ही बड़े-बड़े लेख आज भी प्रकाशित किये जाते हैं, पर म्यांमार, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भारत, पकिस्तान जैसे देशों में निष्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता करते पत्रकारों और मीडिया संस्थानों पर पूंजीपतियों, सत्ता, पुलिस, जांच एजेंसियों और न्यायालयों द्वारा कसते शिकंजे का शायद ही कहीं जिक्र होता है। हमारे देश में तो पूरा का पूरा मीडिया ही गायब हो गया है।

इन्टरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स की रिपोर्ट में दुनियाभर में जेल में डाले गए पत्रकारों की संख्या भी बताई गयी है। वर्ष 2022 के 11 महीनों में दुनियाभर में 375 पत्रकारों को जेल में बंद किया गया है, यह संख्या पूरे 2021 के दौरान गिरफ्तार किये गए पत्रकारों की संख्या से 10 अधिक है। इस मामले में सबसे अधिक 84 गिरफ्तारियों के साथ चीन पहले स्थान पर है – इसके बाद म्यांमार में 64, तुर्की में 51, ईरान में 34, बेलारूस में 33, रूस में 29, ईजिप्ट में 23, सऊदी अरब में 11, यमन में 10, सीरिया में 9 और भारत में 7 पत्रकारों को जेल में बंद किया गया है।

कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स की वेबसाइट पर कुल 65 पत्रकारों और मीडियाकर्मियों की सूची और विवरण है, जिनकी वर्ष 2022 में अबतक हत्या की जा चुकी है। इसमें सबसे अधिक 13, मेक्सिको के पत्रकारों के नाम हैं और 2 नाम भारत से भी हैं। फरवरी में ओडिशा में पंचायत चुनावों के दौरान माओवादियों द्वारा चुनाव बहिष्कार के एक पोस्टर के नजदीक जाते हुए वे लैंडमाइन का शिकार हो गए। बिहार में मई महीने में रेत और शराब माफिया से सम्बंधित रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार सुबोध कुमार महतो को गोलियों से मार डाला गया था।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार वर्ष 2022 में 1 दिसम्बर तक 57 पत्रकारों की हत्या की जा चुकी है, इसमें से 20 प्रतिशत पत्रकार मेक्सिको के हैं। वर्ष 2022 में अब तक मारे गए पत्रकारों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 18.8 प्रतिशत अधिक है। मारे गए पत्रकारों की संख्या के अतिरिक्त वैश्विक स्तर पर 49 पत्रकार लापता हैं और 65 का अपहरण किया जा चुका है।

मेक्सिको में राष्ट्रपति का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है। पिछले राष्ट्रपति एन्रिक पना निएतो के पूरी कार्यकाल में कुल 45 पत्रकारों की हत्या की गयी थी। इसकी तुलना में वर्तमान राष्ट्रपति अन्द्रेस मनुएल लोपेज़ ओब्रदोर के अभी तीन वर्ष ही पूरे हुए हैं और इस अवधि के दौरान 42 पत्रकार मारे जा चुके हैं। वर्तमान राष्ट्रपति के कार्यकाल में पत्रकारों पर हमले के मामले 85 पर्तिशत तक बढ़ चुके हैं। राष्ट्रपति अन्द्रेस मनुएल लोपेज़ ओब्रदोर ने 14 दिसम्बर 2022 के साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में ग्रुपों इमागें नामक राष्ट्रीय टीवी चैनेल के एक प्रतिष्ठित टीवी एंकर सिरों गोमेज़ की आलोचना की थी और उनकी खबरों को झूठ का पुलिंदा बताया था – इसके अगले दिन ही सिरों गोमेज पर मेक्सिको सिटी में जानलेवा हमला किया गया। हालांकि हमले में वे बाल-बाल बच गए, पर पत्रकारों पर हमले किसके इशारे पर किये जाते हैं, यह समझाना कठिन नहीं है। इससे पहले भी मेक्सिको में एक मानवाधिकार संगठन ने जिस दिन पत्रकारों पर बढ़ाते खतरे से सम्बंधित रिपोर्ट सार्वजनिक की, इसके ठीक अगले दिन ही उस संगठन के निदेशक की हत्या कर दी गयी।

पूरी दुनिया में निराकुश शासकों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है और अभिव्यक्ति की आजादी दफ़न होती जा रही है। जाहिर है निरंकुश शासकों को सबसे बड़ा खतरा निष्पक्ष पत्रकारों से ही रहता है, इसलिए उसे जड़ से ही समाप्त करने का विश्व्यापी प्रयास किया जा रहा है। हमारे देश में ही मीडिया की स्थिति देखिये तो बहुत कुछ समझ में आ जायेगा। सभी मेनस्ट्रीम मीडिया घराने पूंजीपतियों या फिर सत्ता के दलालों के हाथ में हैं।

जाहिर है, हम जो भी समाचार देखते हैं या पढ़ते हैं वे सभी सत्तारूढ़ पार्टी के आईटी सेल द्वारा फैलाई जाने वाली भ्रामक खबरों का विस्तार रहता है, समाचार नहीं। कुछ छोटे मीडिया संस्थान निष्पक्ष पत्रकारिता की बागडोर संभाले हुए हैं, वे सरकारी नीतियों के कारण भयानक आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि आर्थिक तंगी से गुजरते मीडिया संस्थान अपने जीवट से कुछ निष्पक्ष और खोजी रिपोर्टिंग करते हैं तब उन पर जांच एजेंसियां और पुलिस टूट पड़ती है।

न्याय व्यवस्था भी पत्रकारों और सत्ता की लड़ाई में सत्ता का ही साथ देती है – सिद्दीक कप्पन का मामला याद कीजिये। अदालतों के बाहर न्यायाधीश न्याय व्यवस्था को सत्ता से प्रभावित करार देते हैं, पर वही न्यायाधीश न्यायालय के भीतर सत्ता से प्रभावित फैसले सुनाते हैं। सत्ता यदि सुबह को शाम कहे तो हमारा मेनस्ट्रीम मीडिया सुबह को शाम बताने में पूरा दिन निकाल देगा, और यदि किसी पत्रकार ने सुबह को सुबह कहा तो वह मारा जाएगा या फिर जेल जाएगा।

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