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कोविड -19

कोरोना टीकों के साइड इफेक्ट पता चलेंगे कैसे, जब भारत सरकार ने जांच करने वाली संस्था को ही कर दिया है निष्क्रिय

Janjwar Desk
20 May 2021 1:30 AM GMT
कोरोना टीकों के साइड इफेक्ट पता चलेंगे कैसे, जब भारत सरकार ने जांच करने वाली संस्था को ही कर दिया है निष्क्रिय
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कोरोना टीकों के सभी ट्रायल पूरे होने से पहले फार्माकोविजिलेंस विभाग को भारत सरकार ने क्यों नहीं किया मुस्तैद

देश में कोरोना के टीके लॉन्च होने के साथ ही फार्माकोविजिलेंस विभाग को लगभग निष्क्रिय किया जा चुका है....

प्रदीप सुरीन, वरिष्ठ स्वास्थ्य पत्रकार

जनज्वार। आपमें से कई लोगों के लिए फार्माकोविजिलेंस शब्द नया होगा। इसमें कोई गलत बात भी नहीं, क्योंकि ज्यादातर लोगों का इससे सीधा वास्ता भी नहीं होता। दुनियाभर की दवा कंपनियां इसी विभाग से डरती हैं। लोगों की जान बचाने के लिए इस विभाग को किसी भी देश में होना अनिवार्य है, लेकिन भारत में बस कुछ साल पहले ही फार्माकोविजिलेंस विभाग का गठन किया गया है।

चलिए पहले जान लेते हैं कि आखिर ये फार्माकोविजिलेंस होता क्या है। दरअसल किसी भी देश में मिलने या बिकने वाली दवाओं और टीकों के साइड इफेक्ट्स पर निगरानी रखने के लिए ही फार्माकोविजिलेंस का गठन किया जाता है। दवा और टीके लोगों की जान बचाने के ही काम आते हैं, लेकिन सभी दवाओं और टीकों के साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जिनसे लोगों की जान भी जा सकती है।

फार्माकोविजिलेंस पूरे देश में किसी दवा या टीके से होने वाले हादसों और अप्रिय घटनाओं का लेखा-जोखा रखती है। भारत में इस विभाग द्वारा जुटाए आंकड़ों के आधार पर कई दवाओं और टीकों को बैन किया जा चुका है।

कोरोना महामारी के बीच भले लोगों की जान बचाने के लिए टीकों की बहुत जरूरत है, लेकिन संकट की इस घड़ी में फार्माकोविजिलेंस की जरूरत पहले से भी ज्यादा है। महामारी से निबटने के लिए केंद्र सरकार ने अफरा-तफरी में टीकों के इस्तेमाल की मंजूरी दे दी, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि अभी भी इन टीकों के सभी क्लिनिकल ट्रायल पूरे नहीं हुए हैं। इन टीकों के साइड इफेक्ट्स भी जरूर होंगे।

बस एक बात खटक रही है, जब कोरोना टीकों के सभी ट्रायल नहीं हो पाए थे तो फिर फार्माकोविजिलेंस विभाग को मुस्तैद क्यों नहीं किया गया। देश में कोरोना के टीके लॉन्च होने के साथ ही फार्माकोविजिलेंस विभाग को लगभग निष्क्रिय किया जा चुका है। अब फार्माकोविजिलेंस विभाग भी सूचना के अधिकार कानून की तरह हो गया है, सिर्फ दिखावे के लिए ही मौजूद है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कोविशील्ड और कोवैक्सीन लाखों लोगों की जान बचा रहे हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स पर खुद सरकार का आंख मूंद लेना बिलकुल भी सही नहीं है।

अभी तक जो होता आ रहा है उससे भी कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन आने वाले दिनों के लिए चिंतित होना लाजमी है। अगले कुछ महीनों में 2 साल के बच्चों से लेकर लगभग सभी उम्र के लोगों पर टीकों का क्लिनिकल ट्रायल होगा, लेकिन अगर इन टीकों से मासूम और बेजुबान बच्चों में कोई साइड इफेक्ट होता है तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?

पूरी दुनिया में बेजुबान बच्चों पर बेहद कम क्लिनिकल ट्रायल होते हैं, कोरोना वायरस के लिए कई देशों में छोटे बच्चों पर क्लिनिकल ट्रायल की मंजूरी दी गई है। भारत ने भी इसी नियम को फॉलो किया है, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि बच्चों पर होने वाले हर पांच में से एक क्लिनिकल ट्रायल असफल साबित हुआ है। यानी बच्चों पर होने वाले ट्रायल पर खास नजर रखने की जरूरत होती है।

पिछले कुछ महीनों से ज्यादातर हेल्थ रिपोर्टर्स फार्माकोविजिलेंस विभाग को ट्रैक करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किसी को भी सफलता नहीं मिल पा रही है। फार्माकोविजिलेंस विभाग के नंबर गोल-मोल घुमाकर बंद हो जाते हैं। जब टीकों के साइड इफेक्ट्स की रिर्पोर्टिंग ही नहीं होगी तो इनसे हो रही मौतौं के बारे में भी कोई चर्चा ही नहीं होगी।

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