पर्यावरण

Climate change : जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है अमीरी-गरीबी का दायरा

Janjwar Desk
15 July 2022 7:36 AM GMT
Climate change : जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है अमीरी-गरीबी का दायरा
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Climate change : जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है अमीरी-गरीबी का दायरा

Climate change : जलवायु परिवर्तन वैश्विक समाज के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इससे निपटना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता है।


जलवायु परिवर्तन पर महेंद्र पांडेय का विश्लेषण

Climate change : ग्रीनहाउस गैसों के अनियंत्रित उत्सर्जन ( Uncontrolled emissions of greenhouse gases ) के कारण जलवायु परिवर्तन ( Climate Change ) और तापमान ( Temperature ) बढ़ोतरी का सिलसिला बदस्तूर जारी है। दुनिया के देशों पर इसके दुष्प्रभाव का असर भी जगजाहिर है। बावजूद इसके गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए सार्थक प्रयास करने के बदले बड़े देश दुनिया को गुमराह करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहे हैं।

सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैस ( greenhouse gas ) वायुमंडल में उत्सर्जित करने वाले पहले तीन देशों में क्रमश: चीन, अमेरिका और भारत के नाम शामिल हैं। चीन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले कोयले के उपयोग को लगातार बढाता जा रहा है। अमेरिका में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के उत्खनन का दायरा बढ़ा रहा है। भारत के प्रधानमंत्री हमेशा बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन ( Climate Change ) केवल अमेरिका और यूरोपीय देशों के कारण है। भारत में भी कोयले की खपत लगातार बढ़ रही है।

हाल में ही प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों के सबसे बड़े उत्सर्जक देश पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित कर रहे हैं। अमेरिका की रिसर्च यूनिवर्सिटी डार्टमौथ कॉलेज (Dartmouth College) के वैज्ञानिक क्रिस काल्लाहन (Chris Callahan) के नेतृत्व में यह अध्ययन संपन्न हुआ है। अध्ययन रिपोर्ट को क्लाइमेट चेंज (Journal Climate Change) नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रीनहाउस गैसों की वजह से पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिल रहा है, जो काफी नुकसानदेह है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब देशों पर पड़ता है।

डार्टमौथ कॉलेज के अध्ययन को साल 1990 से 2014 तक सीमित रखा गया है। इस अवधि में अमेरिका में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से दुनिया को 1.91 ख़रब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा, जो जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया में होने वाले कुल नुकसान का 16.5 प्रतिशत है। दूसरे स्थान पर चीन है। चीन की वजह से दुनिया को 1.83 ख़रब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा है। यह राशि दुनिया में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले कुल नुकसान का 15.8 प्रतिशत है। तीसरे स्थान पर 986 अरब डॉलर के वैश्विक आर्थिक नुकसान के साथ रूस है। चौथे स्थान पर भारत है। भारत में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण दुनिया को 809 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा और यह राशि वैशिक आर्थिक नुकसान का 7 प्रतिशत है।

इस सूची में पाचवें स्थान पर ब्राज़ील, छठवें पर इंडोनेशिया, सातवें पर जापान, आठवें पर वेनेज़ुएला, नौवें स्थान पर जर्मनी और दसवें स्थान पर कनाडा है। अकेले अमेरिका, चीन, रूस, भारत और ब्राज़ील द्वारा सम्मिलित तौर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण पूरी दुनिया को 6 खरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। यह राशि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 11 प्रतिशत है।

अफसोस की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन से इन देशों में आर्थिक नुकसान कम होता है। बड़े देशों की जगह सबसे अधिक असर दुनिया के गरीब देशों पर होता है। दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन से अमेरिका,रूस, कनाडा और कुछ यूरोपीय देशों को आर्थिक लाभ हो रहा है क्योंकि पहले जो जगहें हमेशा बर्फ से ढकी रहती थीं, वहां अब जमीन है। इस जमीन का उपयोग खेती के लिए किया जाने लगा है। पहले बहुत ठंड के कारण जिन इलाकों में आबादी नहीं रहती थी, वैसे बहुत से इलाके अब रहने लायक हो गए हैं।

अध्ययन रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि आर्थिक नुकसान के लिए केवल उन्ही पैमाने का उपयोग किया गया जिनका समावेश दुनियाभर में सकल घरेलू उत्पाद के आकलन के लिए किया जाता है| इसका अर्थ यह है कि जलवायु परिवर्तन द्वारा जैव-विविधता का विनाश, सांस्कृतिक प्रभाव और प्राकृतिक आपदा के आर्थिक नुकसान का समावेश नहीं किया गया है। जाहिर है, इन कारकों का समावेश करने के बाद वैश्विक आर्थिक नुकसान का दायरा और बड़ा हो जाएगा।

अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और एशिया के गर्म देश पहले से अधिक गर्म होने लगे हैं, बाढ़ और चक्रवात का दायरा और आवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है और प्रशांत महासागर में स्थित देश बढ़ते सागर तल के कारण अपना अस्तित्व खो रहे हैं। यही वजह है कि गरीब देश लगातार जलवायु परिवर्तन के अन्तराष्ट्रीय अधिवेशनों में प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान के आर्थिक भरपाई (Compensation for Loss & Damage) की बात अमीर देशों से करते हैं, पर बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश इसपर चुप्पी साध लेते हैं।

हाल में ही 40 गरीब देशों के प्रतिनिधियों ने ईजिप्ट में आयोजित किये जाने वाले अगले कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज के 27वें अधिवेशन (COP27 in Egypt) के अध्यक्ष को पत्र लिख कर मांग की है कि इस मसले पर बहस कराई जाए| इस पत्र के अनुसार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से 3.6 अरब लोग जूझ रहे हैं। इसलिए इसकी आर्थिक भरपाई अमीर देशों को करनी चाहिए।

यूनाइटेड किंगडम के पत्रकार जेरेमी विलियम्स (Jeremy Williams) ने हाल में ही एक पुस्तक प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है – क्लाइमेट चेंज इज रेसिस्ट (Climate Change is Racist) – यानि जलवायु परिवर्तन नस्लवादी है। सतही तौर पर यह शीर्षक अटपटा सा लग सकता है, पर इस पुस्तक में उन्होंने आंकड़ों और उदाहरणों के साथ यह स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन से सबसे कम प्रभावित गोरे लोग हैं, जबकि यह इन्हीं की देन है। जहां गोरे लोग बसते हैं, वहां के मूल निवासी और जनजातियां, जिनका रंग गोरा नहीं है, जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हैं। दूसरी तरफ गरीब देशों की आबादी, जो गोरी नहीं है, इससे प्रभावित हो रही है। जलवायु परिवर्तन में उसका योगदान नहीं है। यह निश्चित तौर पर मानवता के विरुद्ध अपराध है और अपराध करने वाले ही उपदेश दे रहे हैं।

नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) नामक जर्नल में वर्ष 2021 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अर्थ इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों का एक शोधपत्र प्रकाशित किया गया था। शोध पत्र के मुताबिक 3.5 अमेरिकी अपने जीवनकाल में जितना ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए उत्तरदायी हैं, उससे दुनिया में कम से कम एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। कोयले पर आधारित एक बिजली घर से जितना उत्सर्जन होता है, उससे 900 लोगों की मृत्यु हो जाती है। इस अध्ययन में कार्बन का सामाजिक मूल्य निर्धारित किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार वायुमंडल में 4434 मिट्रिक टन कार्बन के उत्सर्जन से कम से कम एक व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यह आकलन केवल बढ़ते तापमान पर आधारित है। इसमें बाढ़, सूखा, चक्रवात और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली मौतों को शामिल नहीं किया गया है।

जाहिर है भारत समेत दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश ग्रीनहाउस गैसों का अनियंत्रित उत्सर्जन कर मानवता के विरुद्ध अपराध कर रहे हैं। समस्या यह है कि यही देश हरेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के मामले में मसीहा बन जाते हैं। गरीब देशों और अमीर देशों के गरीब आबादी परेशान है।


ग्रीन हाउस उत्सर्जन से दुनिया को नुकसान पहुंचाने वाले शीर्ष 10 देश

1. अमेरिका 2. चीन 3. रूस 4. भारत 5. ब्राजील 6. इंडोनेशिया 7. जापान 8. वेनेजुएला 9. जर्मनी 10. कनाडा

हर साल दुनिया को 6 खरब डॉलर का नुकसान पहुंचाने वाले 5 देश

1. अमेरिका 2. चीन 3. रूस 4. भारत 5. ब्राजील

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