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स्वास्थ्य

डब्लूएचओ की थीम 'स्वास्थ्य के लिए एकजुट हों और विज्ञान के साथ खड़े रहें' पर जनस्वास्थ्य चिकित्सक का सवाल, पूछा अब क्यों आया वैज्ञानिक सोच का ख्याल !

Janjwar Desk
7 April 2026 8:35 AM IST
डब्लूएचओ की थीम स्वास्थ्य के लिए एकजुट हों और विज्ञान के साथ खड़े रहें पर जनस्वास्थ्य चिकित्सक का सवाल, पूछा अब क्यों आया वैज्ञानिक सोच का ख्याल !
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21वीं सदी में भी दुनिया अंधविश्वास के गहरे जाल में फँसी है, जहाँ 57.5% लोग भूतों में विश्वास करते हैं और तांत्रिकों का एक बड़ा साम्राज्य है भारत में, 36.5% लोग शाम को पीपल के पेड़ के पास जाने से डरते हैं, जबकि काली बिल्ली का रास्ता काटना, टायफाइड को ऊपरी हवा समझना जैसे वहम ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में जारी हैं...

विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप्रैल पर जनस्वास्थ्य चिकित्सक डॉ. एके अरुण की खास टिप्पणी

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) इस बार 7 अप्रैल 2026 को विश्व स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर दुनियाभर के लोगों से विज्ञान का समर्थन करने का आह्वान कर रहा है। इस वर्ष डब्लूएचओ का थीम है - "स्वास्थ्य के लिए एकजुट हों और विज्ञान के साथ खड़े रहें"

संगठन अपने थीम के अनुसार साल भर चलने वाले अभियान की शुरुआत आज से कर रहा है और आह्वान कर रहा है कि सभी लोग मिल कर इंसानों के साथ साथ जानवरों, पौधों और ग्रह के सभी तत्वों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए वैज्ञानिक सहयोग की शक्ति को महत्व दें। डब्लूएचओ की अपील है कि पूरी दुनिया एक अभियान चला कर वैज्ञानिक उपलब्धियों और साक्ष्यों को कार्रवाई में बदलने के लिए आवश्यक बहुपक्षीय सहयोग की पहल करे, ताकि दुनिया में एक स्वस्थ्य एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिले।

अंधविश्वास मानवीय डर, अज्ञानता और अनिश्चितता से उपजा एक वैश्विक मानसिक जाल है, जो तर्कसंगत सोच को दबाकर भाग्यवादी और भयभीत समाज का निर्माण करता है। यह न केवल मानसिक व आर्थिक प्रगति में बाधक है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुँचाता है। शिक्षित होने के बावजूद, लोग मानसिक सुरक्षा और पुरानी परंपराओं के कारण इसमें फंसे हुए हैं। 21वीं सदी में भी दुनिया अंधविश्वास के गहरे जाल में फँसी है, जहाँ 57.5% लोग भूतों में विश्वास करते हैं और तांत्रिकों का एक बड़ा साम्राज्य है भारत में, 36.5% लोग शाम को पीपल के पेड़ के पास जाने से डरते हैं, जबकि काली बिल्ली का रास्ता काटना, टायफाइड को ऊपरी हवा समझना जैसे वहम ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में जारी हैं। यह शिक्षा के बावजूद तर्कहीनता और भय का प्रतीक है।

एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 57.5% भारतीय समाज में आज भी पीपल के पेड़ के पास जाने से डरते हैं, क्योंकि वे भूत-प्रेत में विश्वास करते हैं। ताबीज और टोटके: 20.7% लोग धार्मिक या अंधविश्वासी कारणों से वृक्षारोपण करने से बचते हैं। ग्रामीण भारत: गांवों में चिकनपॉक्स को 'माता जी' का प्रकोप और टायफाइड को महाराज का प्रकोप माना जाता है।

वैश्विक अंधविश्वास

केवल भारत ही नहीं, अमेरिका में भी उतना ही है। लोग कब्रिस्तान के पास से गुजरते समय सांस रोक लेते हैं, ताकि बुरी आत्माएं प्रवेश न करें, और नासा के वैज्ञानिक मिशन लॉन्च के दौरान मूंगफली खाते हैं।

अशिक्षा और भय

अंधविश्वास का मूल कारण अज्ञानता, शिक्षा की कमी और अनिश्चितता का भय है। अंधविश्वास के कारण लोग निर्णयहीन, डरे हुए और भाग्यवादी बन जाते हैं, जो समाज की प्रगति में बाधक हैं। अंधविश्वास निश्चित रूप से विकास में एक बड़ी बाधा है, क्योंकि यह तार्किक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मेहनत के बजाय भाग्य व अंधभक्ति को बढ़ावा देता है। यह रूढ़िवादी प्रथाएं समाज को आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर करती हैं, जिससे देश का सर्वांगीण विकास रुक जाता है।

विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर डब्लूएचओ के द्वारा स्वास्थ्य के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण की एकजुटता और पहल की यह अपील अच्छी है लेकिन हैरानी की बात यह है कि अपनी स्थापना के 78 वर्ष पूरे हो जाने के बाद अब डब्लूएचओ को वैज्ञानिक सोंच और पहल की अपील क्यों करनी पड़ रही है? बहरहाल डब्लूएचओ की इस पहल का स्वागत है और सभी लोगों से अपील है कि अंधविश्वास और भय के चंगुल से बाहर निकलें, ताकि उनका जीवन तर्क और विज्ञान के सहारे सम्मानजनक और तार्किक बनें। याद रखिए भविष्य विज्ञान का है अंधविश्वास, पाखंड और झूठ का नहीं। नेताओं और सेलिब्रिटीज़ जान बूझ कर आपके सामने झूठ और पाखंड को बढ़ावा देते हैं ताकि आम लोग गर्त में ही डूबे रहें जब कि ज़्यादातर नेताओं के बच्चे अंतरराष्ट्रीय महत्व के वैज्ञानिक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ते हैं लेकिन वे हमारे,आपके बच्चों को गाय गोबर में उलझा कर जाहिल बनाये रखना चाहते हैं।

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