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दिल्ली में 11 नाबालिग बंधुआ मजदूरों को कराया गया मुक्त, कराया जा रहा था 12 घंटे से ज्यादा काम

Janjwar Desk
21 Feb 2021 1:44 PM GMT
दिल्ली में 11 नाबालिग बंधुआ मजदूरों को कराया गया मुक्त, कराया जा रहा था 12 घंटे से ज्यादा काम
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प्रतीकात्मक फोटो

बंधुआ मजदूर बनाये गये बच्चों से कराया जा रहा था 12 घंटे से अधिक काम, दिये जा रहे थे न्यूनतम 100-150 रुपए प्रतिदिन...

नई दिल्ली। दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) ने समयपुर बादली पुलिस थाने के अधिकार क्षेत्र के तहत 7 स्थानों पर छापेमारी और बचाव अभियान चलाया है। इस दौरान 11 बाल श्रमिकों को उनके कार्यस्थल से मुक्त कराया गया। यह बच्चे उत्तरी दिल्ली जिले के अलीपुर क्षेत्र की बेकरियों, खरैत मशीन इकाइयों और ऑटो केंद्र इकाइयों में बंधुआ मजदूरी के रूप में खतरनाक स्थिति में काम कर रहे थे।

एक बच्चे को एक रिहायशी जगह से मुक्त कराया गया, जहां वह एक घरेलू कामगार के रूप में काम कर रहा था। मुक्त कराए गए बच्चों को कोविड-19 महामारी का ध्यान रखते हुए सभी प्रकार के शारीरिक और मानसिक आघात से अवगत कराया गया। डीसीपीसीआर ने बंधुआ मजदूरी की जानकारी देने के लिए एक हेल्पलाइन नंबर 9599001855 भी जारी किया है।

डीसीपीसीआर के अध्यक्ष अनुराग कुंडू ने कहा, छापेमारी दल का संचालन एसडीएम अलीपुर अजीत सिंह ठाकुर, समयपुर बादली पुलिस दल, श्रम विभाग, उत्तर पश्चिम जिला, सहयोग केयर फॉर यू संगठन और दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग (डीसीपीसीआर) द्वारा किया गया। सभी बच्चों को संबंधित सीडीएमओ की देखरेख में चिकित्सा देखभाल और कोविड परीक्षण प्रदान किया गया। संबंधित बाल कल्याण समिति, अलीपुर के समक्ष पेश किए जाने के बाद देखभाल और सुरक्षा के लिए चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूट में रखा गया है।

दिल्ली सरकार ने आधिकारिक वक्तव्य जारी करते हुए कहा, मुक्त कराए गए सभी 11 बच्चे नाबालिग थे, जिसमें सबसे कम उम्र का बच्चा 8 साल का पाया गया। उत्तरी जिले के डीएम द्वारा तैनात सिविल डिफेंस टीम ने ऑपरेशन के दौरान आवश्यक सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करते हुए शानदार काम किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मुक्त किए गए सभी बच्चे परिसर में सुरक्षित महसूस करें और उनकी अच्छी तरह से देखभाल की जाए। उनका काम बेहद सराहनीय है।

पिछले 28 जनवरी को आयोजित एक अन्य बचाव अभियान में पश्चिम जिले की डीएम नेहा बंसल और पंजाबी बाग के एसडीएम निशांत बोध के नेतृत्व में 51 नाबालिगों को सफलतापूर्वक मुक्त कराया गया था। इन 51 मासूम बच्चों में से 10 लड़के थे और बाकी 41 लड़कियां थीं।

डीसीपीसीआर ने दोनों छापे और बचाव अभियानों में समन्वय की भूमिका निभाई। दोनों बचाव कार्यों में बच्चे ज्यादातर 12 घंटे से अधिक काम करते पाए गए और उन्हें न्यूनतम 100-150 रुपए प्रतिदिन मिलते थे। इसके अलावा, इन बच्चों के जीवन पर, विशेष रूप से महामारी के दौरान एक गंभीर खतरा पैदा करने वाले बेहद अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में काम करते हुए पाया गया।

डीसीपीसीआर के अध्यक्ष अनुराग कुंडू ने कहा कि 2023 तक दिल्ली बाल-श्रम मुक्त बनाने के आयोग के लक्ष्य को उचित सामाजिक पुनर्निवेश और मुक्त कराए गए बच्चों का पुनर्वास लोगों के सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है। बच्चों को चाइल्ड केयर संस्थानों में रखा गया है और उन्हें जल्द से जल्द उनके माता-पिता के साथ बहाल कर दिया जाएगा।

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