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संस्कृति

बुढ़ापे का सौन्दर्य होता है लेकिन सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का अजय भवन आगमन

Janjwar Desk
14 March 2026 1:51 PM IST
बुढ़ापे का सौन्दर्य होता है लेकिन सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का अजय भवन आगमन
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वैसे तो हर बुज़ुर्ग के पास अनुभव की गहरी थाती होती है। उस पर भी त्रिपाठी जी ने तो इतना पढ़ा है, इतना सोचा है, इतने विद्वानों की संगत की है कि उनके पास ऐसे अनेक सूक्त वाक्यों का भंडार है। दिलशाद गार्डन में उनके निवास पर लगभग रोज़ ही उनसे मिलने वाले लोग पहुँचते हैं और जीते-जागते ग्रंथों से रिसने वाले ज्ञान का लाभ लेते हैं...

विनीत तिवारी की टिप्पणी

फ़रवरी के महीने में भी दिल्ली में सर्दी बहुत थी । जिस दिन मैं विश्वनाथ त्रिपाठी जी के घर गया उस दिन भी बहुत ठंड थी और वे टोपी,-शॉल आदि से सुसज्जित बख्तरबंद पहने हुए योद्धा लग रहे थे। जो फ़रवरी के महीने को प्रेम का महीना कहता है वह यह बताये कि कौन-सा महीना प्रेम का नहीं होता!

"पेड़ सबको छाया देता है, लकड़हारे को भी।"

तो हर महीने की अलग खुसूसियात है, लेकिन फिर भी फ़रवरी का महत्त्व इस लेख में इस बात से बढ़ जाता है कि 16 फ़रवरी को समूचे हिन्दी साहित्य के और प्रगतिशील लेखक संघ के महान लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी जी का जन्मदिन भी आता है। तो बात यह कि फ़रवरी के महीने में मैं, डॉ. वेदप्रकाश, डॉ. नीरज और होने वाले या हो चुके डॉ. ओम, विश्वनाथ जी के घर पर बैठे थे। नये साल के तोहफ़े के तौर पर मैं अशोक दुबे और मुकेश बिजौले द्वारा बनाया गया रूपांकन, इंदौर का एक कैलेंडर उनके लिए लेकर गया था। इस बरस का कैलेंडर देशी-विदेशी कहावतों पर है जिसके आवरण पर ही मेरी पसंदीदा कहावत लिखी हुई है कि - "पेड़ सबको छाया देता है, लकड़हारे को भी।" बहरहाल, कैलंडर का फ़रवरी महीना खोलकर विश्वनाथ जी से विमोचन करवाया गया तो फ़रवरी के पन्ने पर लिखा था - "सुंदरता से प्यार करने वाला दिल कभी बूढ़ा नहीं होता।" मैंने उसमें जोड़ा कि "ऐसे दिलों के संपर्क में रहने वाले भी कभी बूढ़े नहीं होते।" सुनकर त्रिपाठी जी थोड़े समय सोचते रहे, फिर बोले - "बुढ़ापे का सौन्दर्य होता है लेकिन सौन्दर्य कभी बूढ़ा नहीं होता।" यह वाक्य जितनी बार दोहराता हूँ उतनी बार 'वाह' निकलती है।

वैसे तो हर बुज़ुर्ग के पास अनुभव की गहरी थाती होती है। उस पर भी त्रिपाठी जी ने तो इतना पढ़ा है, इतना सोचा है, इतने विद्वानों की संगत की है कि उनके पास ऐसे अनेक सूक्त वाक्यों का भंडार है। दिलशाद गार्डन में उनके निवास पर लगभग रोज़ ही उनसे मिलने वाले लोग पहुँचते हैं और जीते-जागते ग्रंथों से रिसने वाले ज्ञान का लाभ लेते हैं।

मै जब भी गया तो साहित्य के साथ-साथ उनके कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ाव की भी चर्चा हो जाती थी। आज़ादी के पहले से लेकर आज़ादी के बाद तक उनके देखे गए आंदोलन, उन आंदोलनों में समाजवादियों और कम्युनिस्टों की मौजूदगी, फिर कॉमरेड डांगे से होकर कॉमरेड राजेश्वर राव और कॉमरेड बर्धन तक की उनकी यादें - अतीत का वह टुकड़ा जीवंत होकर उनकी बातों से बहता रहता था और हम लोग सुनते रहते थे।

ऐसी ही बैठकों में कभी यह बात भी निकली कि आपको अजय भवन जाए बहुत वर्ष हो चले हैं, तो क्यों न आप अजय भवन चलें? इस प्रस्ताव से वे तुरंत ही उत्साहित हुए लेकिन फिर बोले कि अब मुझे उतारने में बहुत मुश्किल होती है। मन तो होता है लेकिन मुश्किल सोचकर रह जाता हूँ। यह सुनकर मैंने सोच लिया था कि जिस दिन भी उनका मन और स्वास्थ्य हुआ, उन्हें ज़रूर अजय भवन लाया जाए। जब उन्होंने ज्ञानरंजन, विनोद कुमार शुक्ल और वीरेंद्र यादव के निधन की ख़बर सुनी थी और जब उनकी शोकसभा दिल्ली में सभी संगठनों की तरफ़ से सुरजीत भवन में आयोजित की गई थी, तब भी वे आना चाहते थे और उनके लाने का बंदोबस्त भी अर्जुमंद आरा और अभय जी ने सोचा हुआ था लेकिन वे ऐन वक़्त पर ठंड की वजह से हिम्मत नहीं कर पाये थे।

उनको अजय भवन लाने में एक विचार यह भी था कि पार्टी के मौजूदा नेतृत्व में वे व्यक्तिगत तौर पर कॉमरेड अमरजीत से ही परिचित थे, इसलिए मेरा विचार यह था कि जब वे यहाँ आयें तो कॉमरेड अमरजीत भी हों। यह अपने आप में एक मुश्किल चुनौती थी। अव्वल तो विश्वनाथ जी के स्वास्थ्य और मन के चलते उनका भी कोई निश्चित नहीं कहा जा सकता था कि अगर तय कर लिया तो वे चल ही सकेंगे। दूसरे कॉमरेड अमरजीत की भागदौड़ के चलते उनके साथ ऐसा कोई कार्यक्रम तय कर पाना, जिसमें दोनों एक वक़्त पर इकट्ठा हो सकें, मुश्किल काम था। लेकिन कोशिश तो करनी ही थी - एक बार, दो बार, तीन बार, कामयाब होने तक।

तो दो बार तारीखें तय हुईं, फिर बदलीं। फिर 10 मार्च को दोपहर तीन बजे की बात दोनों से तय हुई। मैं इसे अधिक प्रचारित इसलिए नहीं कर सकता था क्योंकि यह जब तक हो न जाए तब तक जरूरी नहीं था कि हो ही जाएगा। तो मैंने विश्वनाथ त्रिपाठी जी को जानने वाले गिनती के 15-16 लगों की सूची बनायी और उन्हें एक रोज़ पहले 9 मार्च को इत्तिला दी कि संभव है 10 मार्च को तीन बजे विश्वनाथ त्रिपाठी जी एक घंटे के लिए चाय पर गपशप करने के लिए अजय भवन आयें तो आप भी आइए। फोन पर बात करके यह भी बता दिया कि आने के पहले या तो मुझे फोन करके निश्चित समाचार ले लीजिए या मेरे फोन का इंतज़ार कीजिए।

अब आयी 10 मार्च। सुबह से उन युवा साथियों को फोन लगाना शुरू किया जो विश्वनाथ जी को अजय भवन तक लाने में मददगार हो सकते हों। अधिकांश देर से सोकर उठने वाले हैं तो बेचैनी बढ़ गई। लेकिन अंततः कॉमरेड धीरेन्द्र तिवारी, कॉमरेड शीजो वर्गीज़, कॉमरेड मोहित के आश्वासन से निश्चिंतता हुई। अब लगाया विश्वनाथ जी को फोन कि हम आपको लेने आ रहे हैं। जिसका मुझे अंदेशा था वही हुआ। उन्होंने कहा कि "मुझे तो बहुत थकान लग रही है, मेरे लिए बहुत मुश्किल है। आप तो सबको मना कर दीजिए। फिर कभी देखेंगे।" मैं यह तो चाहता था कि वे अजय भवन आयें, क्योंकि मैं उनकी ही इच्छा पूरी करना चाहता था लेकिन एक 95 वर्ष के बुज़ुर्ग को मैं बिल्कुल भी परेशान नहीं करना चाहता था। मैंने कहा कि कोई बात नहीं, आप आराम कीजिए। आपके स्वास्थ्य से ज़्यादा महत्त्व का कुछ भी नहीं। मैं सबको मना कर देता हूँ। फोन रखकर मैं दो मिनट अपने आप को तसल्ली देता हुआ थोड़ा मायूस बैठा रहा, फिर मैंने कॉमरेड अमरजीत और अन्य लोगों को मना करने के लिए फोन उठाया कि तभी फोन बज उठा।

विश्वनाथ जी का ही फोन था । मैंने खुद को उम्मीद करने से रोका। उन्होंने पूछा कि आपको तीन लोग लाने होंगे मुझे कुर्सी पर बिठाकर उतारने के लिए। मैंने कहा हम चार आ जाएँगे। उन्होंने कहा कि मैं एक घंटे से ज़्यादा नहीं बैठ सकूँगा। मैंने कहा अप दस मिनट बाद वापस जाना चाहेंगे तो आपको वापस ले चलेंगे। बोले- ठीक है, आ जाइए।

मैं और मोहित तुरंत निकले और रास्ते में से कॉमरेड दिनेश वार्ष्णेय, कॉमरेड भालचंद्र कानगो, कॉमरेड गिरीश, कॉमरेड रामशरण जोशी, कॉमरेड अर्जुमंद, कॉमरेड अनिल राजिमवाले, कॉमरेड महेश राठी आदि को सूचित किया। विश्वनाथ जी के घर पहुँचने पर डॉ. अभय भी आ गए और डॉ. ओम भी अपने एक साथी विद्यार्थी के साथ पहुँच गए। जब उन्हें लेकर हम सब अजय भवन पहुँचे तो कॉमरेड डी. राजा भी कार्यालय में मौजूद होने से विश्वनाथ त्रिपाठी जी से मिलने के लिए आये। त्रिपाठी जी ने खड़े होकर कॉमरेड राजा के हाथों को अपनी आँखों से लगाकर अपनी पार्टी के महासचिव के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। फिर तो यादों की बारात चल निकली। विश्वनाथ जी ने कहा कि मैं अजय भवन के उद्घाटन के वक़्त मौजूद था और मुझे कॉमरेड डांगे और कॉमरेड राजेश्वर राव के भाषण भी याद हैं। उन्होंने स्मृति से उन भाषणों के अंश सुनाये भी। उन्होंने कहा कि उस ज़माने में किरोड़ीमल कॉलेज को शॉर्ट फ़ॉर्म में के. एम. यानि कार्ल मार्क्स कॉलेज कहा जाता था। वे कॉमरेड फ़ारुक़ी, कॉमरेड प्रेम सागर गुप्ता, कॉमरेड शमीम फ़ैज़ी, कॉमरेड नजमा, और तमाम पुराने बिछड़ चुके दिल्ली के कॉमरेडों को याद करते रहे।

कॉमरेड अमरजीत और कॉमरेड दिनेश वार्ष्णेय के विद्यार्थी राजनीति में सक्रियता के दौर से लेकर बहुत-सी बातें उन्होंने याद कीं। कॉमरेड महेश राठी और कॉमरेड कृष्णा झा को पहचानते ही उनकी आँखों में पुरानी पहचान और स्नेह उभर आया। उनकी याददाश्त का आलम यह था कि दशकों बाद मिले कॉमरेड गिरीश को पहचानकर उन्होंने उनके अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्कृत के गुरू रहे प्रोफ़ेसर राम सुरेश त्रिपाठी को भी सम्मान के साथ याद किया। कॉमरेड डॉ. भालचंद्र कानगो से मिलकर वे इसलिए भी बहुत खुश हुए कि भारत में प्रगतिशील साहित्य के प्रकाशन का पर्याय रहे पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस को अब वे नेतृत्व दे रहे हैं। कॉमरेड डी. राजा ने कहा कि आपके होने से हमें संबल भी मिलता है और प्रेरणा भी। आप आये, आप पार्टी के सदस्य हैं - यह हम सबके लिए गौरव की बात है। विश्वनाथ जी की आँखों की कोरों पर हल्की नमी दिखायी दी।

कॉमरेड अमरजीत ने कहा कि आप आते रहिए तो मैंने कहा कि आपकी शताब्दी का जन्मदिन हम सब अजय भवन में ही मनाएँगे।

सुनकर वे चुप हो गए। तब तक बंगाली मार्केट से शीजो पेड़े लेकर आ गया था तो एक पेड़ा खाकर बड़ी गंभीरता से कॉमरेड अमरजीत से बोले - "अगर तुम मुझे साल में दो-तीन बार, या चलो एक बार ही सही, अजय भवन बुलाकर इतने स्वादिष्ट पेड़े खिलाती रहोगी तो मैं सच में सौ पूरे कर लूँगा।" कहकर एक ठहाका लगाया और पूरा हॉल सबकी हँसी से गूँज उठा। इस संक्षिप्त अनौपचारिक बैठक में कॉमरेड राजन क्षीरसागर, कॉमरेड निर्मल, कॉमरेड राकेश विश्वकर्मा, साबिर, आयुष और हर्ष भी शामिल हुए।

सबसे मिलने और पहचानने और सबके साथ तस्वीरें खिंचवाने में एक घंटा गुजर गया तब मैंने याद दिलाया कि वापस भी चलना है वर्ना रास्ते में भीड़ हो जाएगी। तब हम सब विदा हुए। अजय भवन के प्रवेश द्वार पर एक तस्वीर लेनिन के साथ खिंचवायी गई और रास्ते भर उनकी यह बात सुनते हुए हमने उन्हें उनके घर छोड़ा कि "सारी थकान उतार गई।"

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