हाशिये का समाज

रामनगर के मालधन में उत्तराखण्ड की सर्वाधिक दलित आबादी करती है निवास, मगर जगदीश हत्याकांड पर छायी है अजीब चुप्पी

Janjwar Desk
9 Sep 2022 5:19 AM GMT
रामनगर के मालधन में उत्तराखण्ड की सर्वाधिक दलित आबादी करती है निवास, मगर जगदीश हत्याकांड पर छायी है अजीब चुप्पी
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उत्तराखण्ड में सर्वाधिक दलित आबादी वाले मालधन से 20 लोग भी नहीं आ पाये जगदीश हत्याकांड के विरोध में शामिल होने, दिख रही भीड़ में से ज्यादातर सामाजिक कार्यकर्ता हैं

उत्तराखंड प्रदेश में दलितों की सर्वाधिक एकमुश्त आबादी जहां निवास करती है, वह मालधन क्षेत्र ही है, मालधन को अगर उत्तराखंड के दलितों की राजधानी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है....

Almora Kand : उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के सल्ट क्षेत्र से उभरते हुए दलित युवा नेता जगदीश चंद्र की भिक्यासैण में की गई नृशंस हत्या से दहले उत्तराखंड के कई शहरों में लोग अपनी क्षमता भर प्रतिवाद कर रहे हैं तो, वहीं रामनगर के मालधन में इस मुद्दे पर एक अजीब सी खामोशी पसरी पड़ी है।

जिस मालधन का यहां जिक्र किया जा रहा है, संदर्भ के तौर पर उसका परिचय देते हुए बता दें कि उत्तराखंड प्रदेश में दलितों की सर्वाधिक एकमुश्त आबादी जहां निवास करती है, वह मालधन क्षेत्र ही है। मालधन को अगर उत्तराखंड के दलितों की राजधानी कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है।

पनुवाद्योखन गांव के रहने वाले जगदीश के निर्मम हत्याकांड को जहां एक सप्ताह से अधिक हो चुका है और पूरे उत्तराखंड में इस हत्याकांड को लेकर लोग मुखर हो रहे हैं, तब भी मालधन में इस मुद्दे को लेकर कोई प्रतिरोध दिखाई नहीं दे रहा है। बृहस्पतिवार 8 सितंबर को मालधन की इस खामोशी तोड़ने के लिए रामनगर के समाजवादी लोकमंच, महिला एकता मंच, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के करीब आधा दर्जन कार्यकर्ताओं ने मालधन में एक कार्यक्रम का आयोजन कर इस चुप्पी को तोड़ने का प्रयास किया तब भी मालधन की बड़ी आबादी इससे विरक्त ही रही। बमुश्किल दो दर्जन लोगों की मौजूदगी (जिसमें से आधा दर्जन रामनगर से गए थे) में इस कार्यक्रम का निपटारा किया गया। कार्यक्रम के बाद जारी फोटो इसके प्रमाण हैं।

मालधन की इस चेतना शून्य स्थिति पर यहीं के निवासी पत्रकार श्यामलाल ने क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि जगदीश हत्याकांड के विरोध में उत्तराखंड से आ रही मुखर आवाजों में मालधन की आवाज का शामिल न होना बेहद अफसोसजनक स्थिति है, जबकि मालधन की जो सामाजिक स्थिति है, उसके चलते उत्तराखंड में सबसे पहली प्रतिरोध की आवाज यहीं से उठने की अपेक्षा की जाती है।

रामनगर मुख्यालय से करीब बीस किमी. दूरी पर स्थित सर्वाधिक दलित आबादी वाला मालधन अविभाजित उत्तर प्रदेश के उस दौर में बसा था, जब यूपी के मुख्यमंत्री पण्डित गोविंदबल्लभ पंत हुआ करते थे। यह वह दौर था जब देश में पाकिस्तानी पंजाब व बंगाल से आई बहुत बड़ी आबादी शरणार्थी के तौर पर आज़ाद भारत में रह रही थी।

ठीक इसी समय यूपी के पर्वतीय क्षेत्रों (आज के उत्तराखंड) में खुशीराम शिल्पकार व मुंशी हरिप्रसाद टम्टा अपने-अपने ढंग से दलितों में चेतना जगाने का काम कर रहे थे। यूपी की तत्कालीन सरकार ने केंद्र सरकार के कहने पर बाहर से आई शरणार्थी आबादी को बसाने के लिए तराई और भावर में जमीन तलाशनी शुरू की तो खुशीराम शिल्पकार ने भी पर्वतीय क्षेत्र के शिल्पकारों को भूमिहीन बताते हुए उनके लिए भी भूमि उपलब्ध कराए जाने की मांग की थी। साल 1952 में तराई और भावर में शरणार्थियों को बसाने का जब सिलसिला हुआ तो मालधन क्षेत्र की 5400 हैक्टेयर भूमि पहाड़ के शिल्पकारों को आवंटित करने के लिए चिन्हित की गई।

चिन्हित भूमि की आधी भूमि ही शिल्पकारों को आवंटित की जा सकी। कुछ भूमि तुमड़िया डैम के लिए चली गई। इससे सटे गढ़ी नेगी, किलावली क्षेत्रों में बसाए गए पंजाब के शरणार्थियों को प्रति परिवार दस एकड़ भूमि दी गई थी, जबकि मालधन में शिल्पकारों को प्रति परिवार पांच एकड़ भूमि आवंटित की गई थी। मालधन में पर्वतीय शिल्पकारों को बसाने का यह सिलसिला साल 1952 से लेकर 1955 तक चला। वर्तमान में मालधन की आबादी करीब बीस हजार है। इस आबादी को एक ही स्थान पर बसे शिल्पकारों की उत्तराखंड में सर्वाधिक बड़ी आबादी का दर्जा प्राप्त है।

राजनीति की बात करें तो कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा मालधन एक समय में बहुजन समाज पार्टी के उभार के समय बसपा का वोट बैंक बन गया था। बाद में इस वोट बैंक में भारतीय जनता पार्टी ने जमकर सेंध लगाई। वर्तमान में यहां की राजनीति कांग्रेस-भाजपा-बसपा के इर्द-गिर्द ही घूमती है। चुनावी राजनीति की मुख्य धुरी होने के बाद भी मालधन में सामाजिक बदलाव की बयार बहती कभी नहीं देखी गई। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर भी जब प्रतिरोध के लिए मालधन की तरफ देखा जाता है तो करीब निराशा ही हाथ लगती है। अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र में पड़ने वाले पनुवाद्योखन गांव के रहने वाले उपपा के युवा दलित नेता जगदीश चंद्र की नृशंस हत्या के बाद भी इसी मालधन में एक अजीब सी खामोशी पसरी हुई है।

प्रख्यात दलित लेखक राजाराम विद्यार्थी इसे मालधन की पतित हो रही राजनीति के रूप में देखते हुए कहते हैं कि पूर्व में कुछ लोग थे जो ऐसे मुद्दों पर अपना जरूरत भर का प्रतिरोध दर्ज कराते थे। लेकिन चुनावी राजनीति ने मालधन के ताने-बाने को इतनी बुरी तरह प्रभावित कर दिया है कि वह अपने अस्तित्व से जुड़े मुद्दे पर भी खामोशी अख्तियार कर रही है।

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