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किसान आंदोलन का दूसरा पड़ाव भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश, कितनी मिलेगी कामयाबी

Janjwar Desk
3 Jan 2022 10:36 AM GMT
किसान आंदोलन का दूसरा पड़ाव भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण की कोशिश, कितनी मिलेगी कामयाबी
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दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का आंदोलन भले ही खत्म हो गया है,पर उनकी आगे की रणनीति नहीं थमी है। ऐसा माना जा रहा है कि काॅरपोरेट भक्त व किसानों की विरोधी मानते हुए भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक गोलबंदी के पक्ष में अभी भी किसान नेता है।

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का आंदोलन भले ही खत्म हो गया है,पर उनकी आगे की रणनीति नहीं थमी है। ऐसा माना जा रहा है कि काॅरपोरेट भक्त व किसानों की विरोधी मानते हुए भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक गोलबंदी के पक्ष में अभी भी किसान नेता है। जिनका प्रयास आंदोलन के दूसरे पड़ाव में पंजाब,हरियाणा व उत्तर प्रदेश का विधान सभा चुनाव में भाजपा विरोधी मतदाताओं के ध्रुवीकरण पर है। जिस कोशिश को अंजाम देने में लगे हुए हैं।

पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव के पूर्व सरकार द्वारा अचनाक किसानों से संबंधित तीनों कानून वापस लेने के फैसले के पीछे चुनावी गुणा गणित की बात जग जाहिर है। इसके अगले क्रम में कानून वापसी के बाद दिल्ली की सीमा पर किसानों का एक वर्ष तक चला आंदोलन भी खत्म हो गया। इसके बाद आगे के जो परिदृश्य बन रहे हैं,उसका आकलन करना जरूरी है। भाजपा के कई नेताओं के हाल के दिनों में आए बयान में कहा गया कि आगे भी किसानों से संबंधित उक्त बिल लाया जा सकता है। इस खतरों से सचेत किसान नेताओं के बयान भी काफी महत्वपूर्ण है। जिसमें भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा कि किसान अपने अपमान को भूल नहीं सकता है।उधर यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत भी कह चुके हैं कि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है।

संयुक्त किसान संघर्ष समिति के साथ आंदोलन में सक्रिय रहे किसान मजदूर संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष शिवाजी राय कहते हैं कि यह आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। काॅर्पोरेट के लगातार किसानों के जमीनों पर कब्जा करने की रणनीति मेें मददगार बनी मोदी सरकार के मंसूबे को हम पूरा नहीं होने देेंगे। किसान इस बात को भली भांति जानते हैं कि किसानों के मुददे पर सरकार के नियत मेें खोट है। उनके अंदर का किसान विरोधी एजेंडा आए दिन बयानों में सामने आ जा रहा है। ऐसे में केंद्र की मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ज्यादा जरूरी है उत्तर प्रदेश से भाजपा सरकार की बेदखली। इसके लिए जरूरी है भाजपा विरोधी मतों के धु्रवीकरण की कोशिश। ऐसे में जिन सीटों पर भाजपा का जिससे मुख्य मुकाबला होगा उनके साथ खड़े होने की हम किसानों से अपील करेंगे।

पश्चिमी यूपी की सीटों से किसान भाजपा को कितना कर पाएंगे बेदखल

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 71 विधानसभा सीटें आती हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यहां से 51 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस भारी जीत की सबसे बड़ी वजह जाट वोटबैंक था। लेकिन इस बार किसान आंदोलन के चलते और आरएलडी व एसपी गठबंधन पश्चिमी यूपी में जाट़ मुस्लिम वोटबैंक का समीकरण एक हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की आबादी लगभग 17 फीसदी है, जो किसान आंदोलन से जुड़ी रही है। राकेश टिकैत इसी समुदाय से आते हैं और किसान आंदोलन का चेहरा होने के नाते उनका कद जाटों में और बढ़ गया है। यह भी कहा जा रहा है कि चैधरी चरण सिंह के बाद पहली बार ऐसी स्थितियां आई है कि जाट,मस्लिम व बड़ी संख्या में दलितों को एक मंच पर लाने की कोशिश में कामयाबी मिल रही है। यह भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। जिसको बड़ा प्लेटफार्म दे रहा है सपा व आएलडी गठबंधन तथा कुछ सीटों पर कांग्रेस पार्टी। लखीमपुर कांड के बाद कांग्रेस पार्टी की प्रियंका गांधी फौरी तौर पर प्रभावित परिवारों से जुड़ने में सबसे अधिक सफल होते दिखी थी। इसके बाद से लगातार कांग्रेस पार्टी की पश्चिम में सक्रियता बनी हुई है।

राकेश टिकैत के अगले कदम पर है सबकी नजर

राकेश टिकैत 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में किसके साथ खड़े होते हैं,इस निर्णय पर सबकी नजरें टिकी है। राकेश टिकैत ने चुनाव लड़ने को लेकर साफ कहा है कि वह या उनके परिवार का कोई भी सदस्य चुनाव नहीं लड़ेगा। हालांकि वह किसी पार्टी को भारतीय किसान यूनियन की ओर से समर्थन भी नहीं देंगे इस पर टिकैत ने कुछ भी साफ नहीं किया है।

उधर पंजाब के बदलते सियासी समीकरण ने अब उत्तर प्रदेश में भी एक नई चर्चा शुरू कर दी है। दरअसल जब से पंजाब के किसान नेताओं ने विधानसभा चुनाव में कूदने की ठानी है, तब से उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं को भी राजनीतिक पार्टियों से ऑफर आने लगे हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं का एक ही प्रमुख चेहरा है, वो हैं भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत। जिन्होेंने चुनाव लड़ने को लेकर अपना नजरिया पहले ही साफ कर दिया है।

एक बात है कि राकेश टिकैत विधानसभा चुनाव को लेकर अपने आगे की रणनीति पर साफ कह चुके हैं कि वह आचार संहिता लागू होने के बाद ही अपने पत्ते खोलेंगे। दरअसल इस वक्त यूपी में राकेश टिकैत के पास समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों पार्टियों का विकल्प है। हालांकि जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राकेश टिकैत का प्रभाव है, वहां समाजवादी पार्टी ने आरएलडी से गठबंधन कर लिया है। राकेश टिकैत से जब एक बार पूछा गया था कि क्या वह अखिलेश यादव के साथ 2022 के विधानसभा में जा सकते हैं, तो उन्होंने साफ कहा था कि वह कहीं नहीं जा रहे हैं।

टिकैत के अन्य दलों से दूरी का बीजेपी को मिलेगा फायदा

राकेश टिकैत अगर किसी भी दल के साथ नहीं जाने की बात बार-बार मीडिया से करते रहे हैं। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद भी वो किसी दल के साथ जाने का मन न बना पाएं। अगर ऐसा होता है तो भी बीजेपी को बहुत सुकून मिलने वाला है। क्योंकि पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी और आरएलडी का गठजोड़ पहले ही बीजेपी नेताओं को परेशान किए हुए है। अगर राकेश टिकैत भी इस गठबंधन को सपोर्ट कर देते हैं तो बीजेपी का बड़ी राजनीतिक नुकसान होना तय हो जाएगा। राकेश टिकैत का किसी को न सपोर्ट करना बीजेपी के सपोर्ट के बराबर ही हो जाएगा। राकेश टिकैत समेत अन्य किसान नेता अगर आगामी विधानसभा चुनावों में साइलेंट रहते हैं तो किसानों का एक बहुत बड़ा तबका बीजेपी को वोट कर सकता है।

दिल्ली में किसान संगठन बनायेंगे आंदोलन की रणनीति

दिल्ली के सीमाओं पर एक वर्ष तक चले आंदोलन के समाप्त होने के बाद यह कहा जा रहा है कि आगामी 15 जनवरी को एक विस्तारित बैठक बुलाई गई है। किसान नेता शिवाजी राय ने इस संभावित तिथि की चर्चा करते हुए कहा कि बैठक में अगले रणनीति पर चर्चा होगी। इस बात पर विशेष जोर है कि काॅरपोरेट परस्त राजनीति को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएं। इसका एक हिस्सा पांच राज्यों में हो रहे विधान सभा चुनाव को भी माना जा रहा है। भाजपा को चुनाव में पराजित किए बिना काॅरपोरेट के जमीनों पर कब्जा करने की रणनीति से मुकाबला नहीं किया जा सकता है। ऐसे में अब समय आ गया है कि किसी एक दल के साथ खड़े होने के बजाए भाजपा विरोधी मतों की गोलबंदी की जाए। इस दौरान यह ध्यान देना होगा कि भाजपा को परास्त करने वाले प्रत्याशी के पक्ष में भी मतदान किया जाए। यही हमारे आंदोलन का सही मायने में दूसरा पड़ाव हो सकता है।

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