Another Resignation Congress: राज्यसभा की सूची में 'बाहरियों' को लाकर कांग्रेस क्या दिखाना चाहती है?

Another Resignation Congress: राज्यसभा की सूची में ‘बाहरियों’ को लाकर कांग्रेस क्या दिखाना चाहती है?
सौमित्र रॉय की रिपोर्ट
Another Resignation Congress: मुसीबत के समय जीत उन्हीं की होती है, जो जोखिम लेकर अपने फैसले पर अडिग रहते हैं। कांग्रेस पार्टी जोखिम नहीं लेना चाहती। उदयपुर चिंतन शिविर में लिए गए संकल्पों और राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव के लिए 10 उम्मीदवारों की सूची में शामिल 'दरबारियों' के नाम इसका जीवंत उदाहरण है। नतीजतन, कांग्रेस पार्टी से दूसरा इस्तीफा हुआ है। इस बार कर्नाटक के नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील बृजेश कलप्पा ने इस्तीफा दिया है। बुधवार को जारी अपने फेसबुक पोस्ट में कलप्पा ने कहा है कि पार्टी में 'ऊर्जा और उत्साह' की कमी के चलते वे इस्तीफा दे रहे हैं। इससे पहले कांग्रेस के धाकड़ नेता और जाने-माने वकील कपिल सिब्बल भी पार्टी छोड़ चुके हैं।
राहत की बात यह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने पार्टी छोड़ने की अटकलों को अफवाह बताया है। लेकिन कांग्रेस के भीतर जबर्दस्त उथल-पुथल है और यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को गुलाम नबी आजाद को मनाने जाना पड़ा। आजाद, आनंद शर्मा और एक और वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली का नाम भी राज्यसभा की फेहरिस्त में नहीं है।
'बाहरियों' को तवज्जो से गुस्साए नेता
कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में 10 में से 7 नाम बाहरी हैं। इन्हें उनके मूल राज्यों के बजाय दूसरे राज्यों से उम्मीदवार बनाया गया है। इससे राज्यों के कांग्रेस नेताओं में गहरी नाराजगी है। छत्तीसगढ़ से राजीव शुक्ला के नाम को लेकर सबसे ज्यादा नाराजगी है, जिनका राज्य से कोई नाता नहीं है। इसी तरह रणदीप सुरजेवाला को राजस्थान से उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर सचिन पायलट खेमा खासा नाराज है। छत्तीसगढ़ के एक कांग्रेस नेता ने कहा कि 'बाहरियों' को तवज्जो देकर पार्टी आलाकमान यह संदेश दे रहा है कि जिन नेताओं को दूसरे राज्यों से उम्मीदवार बनाया गया है, उन्हें उनके ही राज्यों में पसंद नहीं किया जाता। राजनांदगांव के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर इन्हें थोपा न जाता तो पार्टी की राज्य इकाई ऐसे नेताओं की उम्मीदवारी का कभी समर्थन नहीं करती। रणदीप सुरजेवाला और भूपेंद्र हुड्डा के बीच छत्तीस का आंकड़ा है और हरियाणा में यह सभी को पता है। राजस्थान से ही मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी को भी उम्मीदवार बनाया गया है। वासनिक महाराष्ट्र से हैं तो तिवारी उत्तरप्रदेश के हैं।
गड़बड़ कहां हुई और किसने की?
उदयपुर चिंतन शिविर में यह साफ किया गया था कि पार्टी नए ऊर्जावान चेहरों को तवज्जो देगी, लेकिन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के करीबियों को ही नहीं, बल्कि जी-23 के बागी समूह से किनारा करने वालों को जिस तरह से राज्यसभा की उम्मीदवारी इनाम में दी गई है, उसने पहले से ही खार खाए सचिन पायलट जैसे असंतुष्टों को भड़का दिया है। राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे सचिन पायलट की चुप्पी को राजनीतिक विश्लेषक ज्वालामुखी की तरह मानते हैं, जो कभी भी फट सकता है। छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल के खिलाफ मोर्चा खोल चुके टीएस सिंहदेव के समर्थकों को राजीव शुक्ला और रंजीत रंजन की उम्मीदवारी रास नहीं आ रही है। माना जा रहा है कि राज्यसभा की उम्मीदवारी के इस पूरे खेल से गांधी परिवार ने एक बार फिर यह जताने की कोशिश की है कि पार्टी पर उनका पूरा नियंत्रण है और आगे भी उनकी ही मर्जी चलेगी।
क्या कांग्रेस ने मौका गंवा दिया?
राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव कांग्रेस नेतृत्व के लिए बागियों को मनाने का सबसे बेहतर मौका था, जो असंतुष्टों के गुस्से को शांत कर सकता था। यह मौका पार्टी ने निश्चित रूप से गंवाया है। कांग्रेस में इस्तीफों की बरसात अवाम में एक गलत संदेश देती है कि पार्टी में सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी नेतृत्व अपनी बात लगातार थोप रहा है। दूसरी अहम बात यह भी कि उदयपुर चिंतन शिविर में अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए 50 फीसदी आरक्षण के जिस फॉर्मूले की बात हुई थी, उसकी शुरुआत अगर राज्यसभा की सूची से ही हो जाती तो भी नेतृत्व पर भरोसा बढ़ जाता। ऐसे में यही प्रतीत होता है कि कांग्रेस आलाकमान ने एक बार फिर गांधी परिवार के वर्चस्व को दिखाने की कोशिश की है। इसका नतीजा आने वाले दिनों में पार्टी में भगदड़ की नई शुरुआत कर सकता है।











