कोविड 19 से होने वाली मौतों के सरकारी आंकड़ों को खारिज करती लांसेट की रिपोर्ट | Excess Deaths due to COVID 19 Pandemic |

महेंद्र पाण्डेय की रिपोर्ट
Excess Deaths due to COVID 19 Pandemic | पूरी दुनिया कोविड 19 के दौर के आरम्भ से ही भारत सरकार द्वारा इसके कारण होने वाली मौतों को कटघरे में खडी करती रही है, और दूसरी तरफ भारत सरकार हरेक ऐसी रिपोर्ट को खारिज करती रही है, वैज्ञानिक विश्लेषणों और गणितीय मॉडल पर सवाल उठाती रही हैं, नदियों में लाशों के नहीं बहने और ऑक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं का दावा कर कोविड 19 के नियंत्रण पर अपनी पीठ थपथपाती रही है| 10 मार्च को प्रतिष्ठित स्वास्थ्य जर्नल, द लांसेट (The Lancet), में एक अध्ययन प्रकाशित किया गया – Estimating Excess Mortality due to COVID 19 Pandemic: A systematic Analysis of COVID 19 Related Mortality 2020-2021| इसके अनुसार भारत में 2021 के अंत तक सरकारी मौत के आंकड़ों की तुलना में आठ-गुना अधिक मौतें हुईं हैं| इस अध्ययन के अनुसार 31 दिसम्बर 2021 तक भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार कुल 4.89 लाख मौतें हुईं थीं, पर वास्तव में 40.7 लाख मौतें हुईं थीं|
कोविड 19 से होने वाली मौतों के सरकारी आंकड़ों और वास्तविक आंकड़ों के बीच के अंतर को "अतिरिक्त मौत" (Excess Deaths) कहा जाता है, और हरेक सरकार इसका सच जानते हुए भी हमेशा इसे नकारती है| लांसेट में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार वर्ष 2020 से 2021 के बीच दुनिया में कोविड 19 के कारण 1.82 करोड़ अतिरिक्त मौत हुई, जो सरकारे आंकड़ों, 59 लाख, की तुलना में तीन गुना है, पर भारत में ऐसी मौतें आठ-गुना हैं| दुनिया में कुल अतिरिक्त मौतों के आंकड़ों में अकेले भारत का योगदान 22.3 प्रतिशत है, और सबसे अधिक ऐसी मौतें भी भारत में ही हुईं हैं| भारत में 40.7 लाख अतिरिक्त मौतों के बाद, 11.3 लाख के साथ अमेरिका और 10..7 लाख के साथ रूस तीसरे स्थान पर है| इस अध्ययन के अनुसार भारत में सरकारी आंकड़ों के अनुसार कोविड 19 के कारण प्रति लाख आबादी में 18.3 मौतें हुईं हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि यह आंकड़ा लगभग 153 है|
जैसी कि उम्मीद थी, भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में इस अध्ययन को बकवास करार दिया है, और साथ ही इस अध्ययन के लिए प्रयुक्त मैथेमेटिकल मॉडल पर भी सवाल खड़ा कर दिया है| भारत छोड़कर किसी भी देश की सरकार किसी भी वैज्ञानिक अध्ययन को बिना पढ़े ही विशुद्ध अवैज्ञानिक और राजनैतिक तरीके से नकारती नहीं है, पर हमारी सरकार तो इसे किसी भी अध्ययन को प्रकाशित होने के कुछ मिनटों के भीतर ही खारिज कर देती है|
यह कोई पहला अध्ययन नहीं है, जिसमें भारत सरकार के कोविड 19 के आंकड़ों पर सवाल उठाये गए हैं| मई 2021 में द इकोनॉमिस्ट (The Economist) ने कोविड 19 से अतिरिक्त मौतों पर एक विश्लेषण प्रकाशित किया था, जिसके अनुसार भारत में जब सरकार 2 लाख मौतों का आंकड़ा बता रही थी, तबतक वास्तविक मौतों का आंकड़ा 23 लाख से अधिक था| द प्रिंट ने 10 फरवरी 2022 को देश के सभी बड़े बीमा कंपनियों के हवाले से एक समाचार प्रकाशित किया था, जिसके अनुसार कोविड 19 की दूसरी लहर की अवधि, अप्रैल से सितम्बर 2021 के बीच जीवन बीमा के क्लेम में 136 प्रतिशत की बृद्धि दर्ज की गयी थी|
इन दिनों कोविड 19 खबरों से गायब है, सरकारें निश्चिन्त हैं और लगभग सभी प्रतिबन्ध हटा दिए गए हैं| जाहिर है, इनदिनों जिसे कोविड 19 होता होगा, उसका पर्याप्त इलाज किया जा रहा होगा, और अब तो स्वास्थ्य सेवाओं के पास इससे निपटने का 2 वर्ष से अधिक अनुभव भी है| अब ऑक्सीजन की कमी नहीं है और आईसीयू बेड्स की कमी भी नहीं है| फिर भी इन दिनों हरेक दिन लगभग 4000 नए मामले आ रहे हैं और लगभग 200 व्यक्तियों की मृत्यु हो रही है – ऐसा सरकारी आंकड़े बता रहे हैं| यह एक सामान्य स्थिति है, फिर भी यदि मामलों और मृत्यु के अनुपात में देखें तो देश में अबतक लगभग 22 लाख मौतें हो चुकी होंगी, क्योंकि कोविड 19 के कुल मामले 4.3 करोड़ दर्ज किये गए हैं| पर, सरकारी आंकड़ों के अनुसार कुल मौतों की संख्या 5.16 लाख है|
अमेरिका के सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट (Centre for Global Development) नामक संस्था ने भारत में कोविड 19 से होने वाली मौतों का गहराई से अध्ययन किया था और इसे जुलाई 2021 में प्रकाशित किया था| यह अध्ययन वर्ष 2020 के जनवरी से वर्ष 2021 के मई महीने तक के गैर-सरकारी और सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर किया गया है| इस अध्ययन का निष्कर्ष है, सरकारी आंकड़ों के अलावा देश में मुख्यतः कोविड 19 के कारण दस गुना अधिक मौतें हुईं हैं, जिसे सरकार ने छुपाया है| इस अध्ययन के अनुसार जून 2021 के अंत में सरकारी स्तर पर मौत के आंकड़े 4 लाख थे, जबकि इस अध्ययन के अनुसार मौत के आंकड़े 34 लाख से 49 लाख के बीच हैं|
इस अध्ययन का आधार देश में जन्म और मृत्यु के पंजीकृत आंकड़े, सीरो सर्वे के आंकड़े और 9 लाख व्यक्तियों का वर्ष में तीन बार किया गया आर्थिक सर्वेक्षण है| इस अध्ययन में देश के अनेक निष्पक्ष पत्रकारों और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा इस विषय पर अध्ययन और विश्लेषण की समीक्षा भी की गयी है| इस अध्ययन के एक लेखक, अरविन्द सुब्रमण्यम के अनुसार इसमें अनेक चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए थे| माना जाता रहा है कि कोविड 19 के पहले दौर में मौतें कम हुईं थीं, पर इस अध्ययन के अनुसार इस दौर में भी 20 लाख से अधिक मौतें हुई थीं| प्रधानमंत्री समेत पूरी सरकार कोविड 19 के नियंत्रण और कम मौतों के लिए आपनी पीठ थपथपाती रही, पर इस रिपोर्ट के अनुसार कोविड 19 से होने वाली मौतों के सन्दर्भ में भारत कोई अजूबा नहीं था, बल्कि यदि सरकार में मौत का वास्तविक आंकड़ा उजागर किया होता तो हम इस सन्दर्भ में पहले स्थान पर पिछले वर्ष ही पहुँच गए होते|
जनवरी 2022 में प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल, साइंस, में प्रकाशित लेख के अनुसार भारत में कोविड 19 से होने वाली मौतों की वास्तविक संख्या 30 लाख से अधिक है, और यह संख्या सरकारी आंकड़ों की तुलना में 6-गुना अधिक है| वर्ष 2020 से ही पूरी दुनिया भारत के मौत के आंकड़ों पर प्रश्न कर रही है| अमेरिका में बसे भारतीय मूल के कैंसर विशेषज्ञ सिद्धार्थ मुख़र्जी कहते हैं कि इस रहस्य का उत्तर पूरी दुनिया में फिलहाल किसी के पास नहीं है| विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दुनिया के अधिकतर देश अपने यहाँ के पूरे आंकड़े प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं, संभव है भारत सरकार भी यही कर रही हो| न्यूयॉर्क टाइम्स ने अप्रैल 2020 में ही अमेरिका, कनाडा समेत 12 देशों में कोविड 19 से सम्बंधित मृत्यु के आंकड़ों का विश्लेषण कर बताया है कि इन देशों में सम्मिलित तौर पर सरकारी आंकड़ों के अलावा 40000 से अधिक मौतें हुईं हैं| इसी तरह फाइनेंसियल टाइम्स ने 14 देशों के आंकड़ों का गहराई से विश्लेषण कर बताया कि इन देशों में सरकारी आंकड़ों की तुलना में 60 प्रतिशत अधिक जानें गईं|
यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो के भारतीय मूल के वैज्ञानिक प्रभात झा पहले भी भारत की मृत्यु दर पर अध्ययन कर चुके हैं| इनके अनुसार भारत में मृत्यु के सही आंकड़े जुटा पाना कठिन काम है, क्योंकि लगभग 80 प्रतिशत मौतें घरों में ही होतीं हैं और उनका लेखा-जोखा नहीं रहता| प्रभात झा के अनुसार देश में प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ लोग मरते हैं, जिनमें से सरकारी आंकड़ों के अनुसार महज 22 प्रतिशत की सूचना अस्पतालों के पास रहती है|
जिस समय दुनिया की मीडिया भारत सरकार के मौत के आंकड़ों पर प्रश्न कर रही थी, पर हमारी सरकार का चरित्र देखिये – जब अप्रैल और मई 2021 में दुनिया ने हमारे देश को जलती हुई लाशों, नदी में बहती लाशों और नदी किनारे गडी लाशों में तब्दील होते देख लिया तब सरकार ने संसद को बताया कि नदियों में कोई लाश नहीं बही और ऑक्सीजन की कमी से कोई नहीं मरा| आखिर, हम वैसे ही विश्वगुरु थोड़े ही हैं, विश्वगुरु बनाने के लिए लाशों का ढेर लगाना पड़ता है, और इस सन्दर्भ में हमारी सरकार से अधिक माहिर दुनिया की कोई सरकार नहीं है|











