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Kashmiri Hindus Target Killing: कश्मीर घाटी में 1990 के दशक के दौर जैसे असुरक्षित हुए हिंदू, क्या मोदी सरकार अपनी नीतियों पर करेगी पुनर्विचार

Janjwar Desk
1 Jun 2022 11:47 AM IST
Kashmiri Hindus Target Killing: कश्मीर घाटी में 1990 के दशक के दौर जैसे असुरक्षित हुए हिंदू, क्या मोदी सरकार अपनी नीतियों पर करेगी पुनर्विचार
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Kashmiri Hindus Target Killing: कश्मीर घाटी में 1990 के दशक के दौर जैसे असुरक्षित हुए हिंदू, क्या मोदी सरकार अपनी नीतियों पर करेगी पुनर्विचार

Kashmiri Hindus Target Killing: जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में मंगलवार को महिला शिक्षिका रजनी बाला की आतंकवादियों के द्वारा निर्मम हत्या ने एक बार फिर इस आशंका की ओर इशारा किया है कि घाटी में सब-कुछ ठीक नहीं है।

Kashmiri Hindus Target Killing: जम्मू-कश्मीर के कुलगाम में मंगलवार को महिला शिक्षिका रजनी बाला की आतंकवादियों के द्वारा निर्मम हत्या ने एक बार फिर इस आशंका की ओर इशारा किया है कि घाटी में सब-कुछ ठीक नहीं है। खासकर उन 5928 सरकारी पदों पर काम करने वाले हिंदू कश्मीरी पंडितों के परिवार, जिन्हें यह उम्मीद दिलाकर जम्मू से घाटी में वापस लाया गया था कि सरकार उनकी जान की हिफाजत करेगी।

रजनी बाला भी उनमें से एक थीं, जिन्हें आतंकियों ने उनके स्कूल में घुसकर गोलियों से भून दिया। मई के महीने में घाटी में नौकरी कर रहे कश्मीरी हिंदुओं पर यह दूसरा हमला है। 12 मई को बड़गाम के तहसील कार्यालय में घुसकर आतंकियों ने एक कश्मीरी हिंदू क्लर्क राहुल भट की हत्या कर दी थी।

सामूहिक पलायन की धमकी

दोनों घटनाओं के बाद कश्मीर घाटी में पुर्नस्थापित किए गए हिंदू परिवारों के सब्र का बांध टूटता दिख रहा है। मंगलवार को रजनी बाला की हत्या के बाद कश्मीरी पंडितों ने प्रशासन से सभी विस्थापित परिवारों को सुरक्षित जम्मू पहुंचाने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है, वरना घाटी से सामूहिक पलायन की धमकी दी गई है।

इन परिवारों के खौफ, गुस्से और आतंकियों को कश्मीरी हिंदू परिवारों को निशाना बनाने से रोकने में प्रशासन की नाकामी ने 1990 के उस खूनी मंजर की याद दिला दी है, जब घाटी में कश्मीरी हिंदू परिवारों को मुख्य रूप से निशाना बनाया गया था। तब 44167 परिवारों ने घाटी से भागकर जम्मू में पनाह ली थी, जिनमें से 39782 हिंदू और कश्मीरी पंडित थे।

टूट रहा है भरोसा

नब्बे के दशक में कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन को भारत की आजादी के बाद का दूसरा सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। करीब डेढ़ दशक से ज्यादा समय तक शरणार्थी शिविरों में रखने के बाद 2008 में केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार ने इन परिवारों को घाटी में वापस लौटने को प्रोत्साहित करने के लिए पुनर्वास पैकेज के रूप में 6000 नौकरियों और इतनी ही संख्या में आवास उपलब्ध कराने के साथ ही जान की हिफाजत का भरोसा दिलाया था। नरेंद्र मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद कश्मीरी विस्थापितों के लिए नकद सहायता राशि को बढ़ाकर मार्च 2021 में 13 हजार रूपए प्रतिमाह कर दिया गया। हालांकि, वादे यहां भी टूटे। कश्मीरी विस्थापितों का दावा है कि कई परिवारों को लंबे समय से सहायता राशि नहीं मिली है। इसके अलावा 6000 मकानों में से 20% ही रहने के लिए उपलब्ध हो पाए हैं। जिन 6 हजार पदों का ऐलान पूर्ववती यूपीए सरकार ने किया था, उनमें से 5928 पदों पर भर्तियां हो चुकी हैं। लेकिन इनमें पदस्थ लोगों के लिए 1037 मकान ही बनकर तैयार हुए हैं। बाकी कर्मचारी किराए के मकानों में रहते हैं।

हैं सरकारी नौकर, बन गए 'बंधुआ मजदूर'

जिन सरकारी कर्मचारियों को आवास मिला, उनकी शिकायत यह है कि उन्हें प्रशासन की ओर से कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई है। उनके मकान इस कदर कमजोर हैं कि एक पत्थर मारने पर वे गिर जाएंगे। इन्हीं में से एक कमल का दावा है कि 2008 में कश्मीरी हिंदुओं को घाटी में नौकरी देने से पहले उनसे एक बॉन्ड पर दस्तखत करवाए गए थे कि उन्हें 'बंधुआ मजदूरों' की तरह काम करना होगा। न तो उनकी तनख्वाह बढ़ेगी और न ही नौ साल की नौकरी के बाद उन्हें पदोन्नति मिलेगी। विस्थापित कश्मीरी हिंदू पंडितों से कहा गया था कि उन्हें जिलों में सुरक्षित परिवेश में तैनात किया जाएगा। लेकिन हुआ बिल्कुल उल्टा। सरकारी पदों पर भर्ती किए गए कश्मीरी हिंदुओं को पहाड़ी इलाकों में पदस्थ किया गया, जो आतंकवादियों के हॉट-स्पॉट हैं। इसके चलते नौकरी करने वालों को जिले के सुरक्षित स्थान में बने अपने घर से 25-30 किलोमीटर दूर जाकर काम करना पड़ रहा है। आतंकियों के खौफ के मारे हिंदु परिवारों के पुरुष माथे पर तिलक नहीं लगा पाते और न ही महिलाएं बिंदी लगाती हैं।

प्रशासन की बेरुखी

जम्मू भेजने की मांग कर रहे कश्मीरी हिंदू परिवारों का आरोप है कि प्रशासन उनका वेतन रोकने की धमकी दे रहा है। कुलगाम और श्रीनगर में हत्याओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे कश्मीरी हिंदुओं ने लेफ्टिनेंट गवर्नर पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन का पूरा ध्यान कश्मीरी हिंदू परिवारों पर ही है, जिन्हें पीएम पैकेज में नौकरी दी गई है। लेकिन इसी पैकेज में अनुसूचित जाति के परिवारों को भी नौकरी मिली है। उनकी जान की हिफाजत नहीं की जा रही है।

एक तरफ सिर पर मौत का खौफ और दूसरी ओर प्रशासन की बेरुखी के बीच जिंदगी गुजार रहे कश्मीरी हिंदु परिवार मरना नहीं चाहते। वे फिर जम्मू के उन शिविरों में लौटना चाहते हैं, जहां उनका बचपन गुजरा। घाटी में कश्मीरी हिंदू परिवारों के पलायन की आहट एक बार फिर तीन दशक से अधिक समय पहले के काले अतीत की ओर इशारा कर रही है।

सरकार की ऑल इज वैल की नीति पर सवाल

अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से केंद्र सरकार और कश्मीर घाटी के प्रशासन की लगातार यही कोशिश रही है कि वहां की परिस्थिति को ऑल इज वैल के रूप में दुनिया को दिखाया जाए। लेकिन जमीन परिस्थिति ठीक इससे उलट है। इस साल मई में ही घाटी में 7 लोगों को आतंकियों ने निशाने पर लेकर उनकी हत्या की है। इनमें तीन पुलिसकर्मी और 4 नागरिक हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, घाटी में इस साल 62 आतंकी सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए हैं, जिनमें से 32 स्थानीय आतंकी थे। साफ है कि एक ओर जहां केंद्र सरकार की नीति कश्मीर घाटी में आतंक को पूरी तरह से खत्म करने की है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी चाहती है कि कश्मीर की बहुसंख्यक अवाम पर वह अपनी बात थोप भी सके। इस दोहरी नीति के बीच कश्मीरी हिंदू पंडित फंस गए हैं। वे आतंकियों के आसान शिकार बन गए हैं। इसलिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के लिए घाटी में शांति स्थापना एक बड़ी चुनौती है। कश्मीरी पंडितों को सुरक्षा मुहैया कराकर सरकार विश्वास बहाली की शानदार कोशिश कर सकती है। दिक्कत यह है कि सरकार हर बार यह मौका चूक रही है।

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