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कोरोना के "यूपी मॉडल" को सही साबित करने में IIT कानपुर की गई प्रतिष्ठा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही आलोचना

Janjwar Desk
26 Nov 2021 12:23 PM GMT
कोरोना के यूपी मॉडल को सही साबित करने में IIT कानपुर की गई प्रतिष्ठा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही आलोचना
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कोरोना काल में सरकारी नाकामियों के चलते लाखों लोगों की गई जान के सच को मानते हुए आगे की बेहतर तैयारी पर जोर देने के बजाए हमारी सरकार सच को झुठलाने में ही ज्यादा यकीन कर रही है।लिहाजा अब देश के प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी कानपुर की भी साख का बट्टा लगाने से सरकार पीछे नहीं है।

जितेंद्र उपाध्याय की रिपोर्ट

जनज्वार। कोरोना काल में सरकारी नाकामियों के चलते लाखों लोगों की गई जान के सच को मानते हुए आगे की बेहतर तैयारी पर जोर देने के बजाए हमारी सरकार सच को झुठलाने में ही ज्यादा यकीन कर रही है।लिहाजा अब देश के प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थान आईआईटी कानपुर की भी साख का बट्टा लगाने से सरकार पीछे नहीं है। आईआईटी कानपुर द्वारा एक कथित वैज्ञानिक अध्ययन जिसका शीर्षक कोविड संग्राम यूपी मॉडलः नीति, युक्ति, परिणाम है, को पिछले कुछ हफ्तों में मीडिया में व्यापक रूप से प्रसारित व प्रचारित किया गया है। रिपोर्ट के लेखक और मुख्य संपादक प्रोण् मनिंद्र अग्रवाल हैंए जो आईआईटी कानपुर में एक संकाय सदस्य हैं। साथ ही वे तथाकथित सूत्र मॉडल के प्रमुख वास्तुकारों में से एक हैं। सूत्र मॉडल संक्रामक रोगों का एक कंपार्टमेंटल मॉडल है।जिसका प्रचार प्रसार कर सरकार के नुमाइंदे लोगों को गुमराह करने में लगे हैं। ऐसे में लोगों के तरफ से सवाल उठना लाजमी है।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर आलोचना हो रही है। विश्व के विभिन्न प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के 210 लोगों ने रिपोर्ट के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाकर अपना एतराज जताया है।

कोरोना काल की दूसरी लहर के दौरान गंगा में तैरती लाषें से लेकर आक्सीजन के लिए मची आपाधापी के बीच दम तोड़ते लोग। उस पल को याद कर हर किसी की रूह कांप उठती है।इस दौरान किसी ने अपने मां.बाप को खोया तो कोई भाई.बहन को।हालात ऐसे रहे कि कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं रहा जिसके पारिवारिक सदस्य या रिश्तेदार हों या पड़ोसीए को कोरोना महामारी में न खोया हो। ऐसे लोगों को अगर हमारी सरकारें देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी कानपुर के एक सरकारी उपलब्धि भरी रिपोर्ट के सहारे गुमराह करने की कोशिश करेगी तो सवाल उठेगा ही।

खास बात यह है कि आईआईटी के सिटीजन फोरम व हमारा मंच आईआईटीके नाम की दो संस्थाओं ने रिपोर्ट की आलोचना की है। आलोचना को जायज ठहराते हुए विश्व के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े 210 की संख्या में लोगों ने हस्ताक्षर कर अपना समर्थन जताया है।

मुख्य संपादक प्रो. मनिंद्र अग्रवाल की रिपोर्ट के अनुसार 12 अप्रैल को 380 मिट्रिक टन रोजाना ऑक्सीजन की मांग थी। जो कि 25 अप्रैल को ढाई गुना बढकर 840 मिट्रिक टन हो गई। उत्तर प्रदेश ऐसा पहला राज्य था जिसने भारतीय वायुसेना की मदद से खाली टैंकर लिफ्ट कराए। इस दौरान 57 ऑक्सीजन एक्सप्रेस चलाई गई और सख्त ऑडिट की वजह से रोजाना 30 मिट्रिक टन ऑक्सीजन बचाई गई। लगातार टेस्टिंग का नतीजा था कि राज्य में कोरोना की दूसरी लहर आशंकाओं के मुकाबले जैसी गंभीर नहीं हो पाई। राज्य में 11 करोड़ लोगों को कोरोना वैक्सीन की एक डोज लग चुकी है। इसके अलावा राज्य में कोरोना के मामलों में कमी आने के साथ ही व्यापक टेस्टिंग चल रही है । कोरोना की अन्य लहर की निगरानी के लिए 70,000 निगरानी समितियां सक्रिय की गई हैं। वहीं 238 पीएसए प्लांट के चालू होने के कारण 87,174 ऑक्सीजन बेड हो गए हैं। इसके अलावा सभी 549 पीएसए प्लांट शुरू होने के बाद 1.5 लाख से ज्यादा ऑक्सीजन बेड हो जाएंगे। जो भारत के किसी भी राज्य में सबसे ज्यादा होगा। तीसरी लहर को देखते हुए बच्चों के लिए 6700 आईसीयू बेड तैयार किए जा चुके हैं। इन तमाम दावों के बीच यह भी सच है कि कोरोना की दूसरी लहर की तबाही को हमारी सरकारों को कोई संज्ञान नहीं था। लिहाजा अप्रैल.मई माह में तकरीबन एक पखवारा तक आक्सीजन के अभाव में लोग सर्वाधिक संख्या में दम तोड़ते रहे। ऐसे वक्त में सरकार पूरी तरह लाचार दिखी।

ऐसे में यह कहा जा रहा है कि आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट सूत्र मॉडल प्रभावी तौर पर एक कर्व फिटिंग अभ्यास है व जिसकी संक्रामक रोगों के संदर्भ मे भविष्यवाणी करने की शक्ति या वैज्ञानिक योग्यता काफी कम है। इस मॉडल के आधार पर मुख्य संपादक प्रोण् मनिंद्र अग्रवाल व उनके सहयोगियों ने बार.बार ऐसी सार्वजनिक घोषणाएं की हैं जो कि अनुभव के आधार पर गलत साबित हुई हैं। उदाहरण के लिएए 9 मार्च 2021कोए अग्रवाल ने ट्विटर पर घोषणा की कि भारत में कोई श्दूसरी लहरश् नहीं होगी । 30 जनवरी कोए अग्रवाल व उनके सहयोगियों ने एक वैज्ञानिक पत्र में केंद्र सरकार की नीतियों की सराहना की और दावा किया कि यह स्थापित करना आसान है कि लिए गए निर्णयों ने कई लहरों को आने से बचा लिया।

जब ये भविष्यवाणियां गलत निकलीं, तब अपनी गलतियों को स्वीकार करने के बजाय अग्रवाल व उनके सहयोगियों ने नए डेटा को फिट करने के लिए बस अपने मॉडल में मापदंडों व राशियों को बाद में संशोधित कर दिया। उदाहरण के लिए, उनके पेपर के बाद के संस्करण में यह स्पष्ट करने के बजाय कि भारत सरकार की आदर्श नीतियों को स्थापित करने वाला उनका आसान विश्लेषण पहले स्थान पर त्रुटिपूर्ण क्यों था,उन्होंने बस चुपचाप उपरोक्त वाक्य को हटा दिया।

रिपोर्ट अपने आप में सरकारी डेटा और सरकारी कार्यक्रमों के विवरण का एक गैर.आलोचनात्मक पुनरुत्पादन है। जिसका पारदर्शी उद्देश्य यह दर्शाना है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने महामारी का प्रबंधन किसी अन्य राज्य की तुलना में बेहतर तरीके से किया है। इस रिपोर्ट के कई दावे निराधार हैं। इसके निष्कर्ष अक्सर अतिरंजित हैं और इसके डेटा को अस्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया गया है। अग्रवाल और उनकी टीम नियमित रूप से सरकारी खर्च या प्रयास के दावों को इसके इच्छित प्राप्तकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव के साथ भ्रमित करती है। इस तरह के दावों को शोध और फील्डवर्क द्वारा समर्थित होना चाहिए और इस रिपोर्ट में इनमें से कोई भी नहीं है।

जबकि सच्चाई यह है कि दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश पर आधारित विस्तृत सूचना की समीक्षा करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि महामारी के प्रति यूपी सरकार की प्रतिक्रिया अपर्याप्त थी। कई लाख मेहनतकशों पर इन विफलताओं का प्रभाव चौका देने वाला रहा हैए और अभी तक जो नुकसान हुआ हैए उसका पूरी तरह से आकलन होना बाकी है। यह रिपोर्ट सरकार की नीति के ईमानदार मूल्यांकन से बहुत दूर हैए और इसके लेखकों का दोषपूर्ण विज्ञान और राज्य सरकार की त्रुटिपूर्ण नीतियों को मजबूत करने के अलावा और कोई उद्देश्य नहीं है।

आईआईटी कानपुर व अन्य अकादमिक संस्थानों पर महामारी से निपटने के लिए सरकार के प्रयासों व उसके असर का अध्ययन

व मूल्यांकन करने की एक गंभीर जिम्मेदारी है ताकि हमने जो भयावहता देखी है,वह खुद को न दोहराए। ऐसे में यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है कि ऐसे अध्ययन खुले और ईमानदार तरीके से किये जायें,न कि इस तरह से कि लोगों के हितों पर एक विशिष्ट सरकार के हितों को तरजीह दी जाए। आईआईटी कानपुर के निदेशक ने इस तरह की रिपोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन करते हुए एक प्रस्तावना लिखी है। लोगों का मानना है कि महामारी के यूपी सरकार के घोर कुप्रबंधन पर पर्दा डालने के लिए आईआईटी कानपुर की छाप व साख का उपयोग किया जाना बहुत ही निंदनीय है।

हालांकि प्रो. मणीन्द्र का कहना है कि ये किताब यूपी मॉडल के आधार पर हैए इसमें हमने यूपी सरकार से भी डेटा लिया था जिसका पूरा विस्तृत अध्ययन करके हमने छापा है। 120 पेज की यह किताब अब चर्चा का विषय बनी है।जिसे लोग निराधार रिपोर्ट मानते हुए सरकार पर उंगलियां उठा रहे हैं।

आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट के खिलाफ दो प्रमुख संगठन "आईआईटी सीटिजन्स फोरम" व "हमारा मंच आईआईटीके" ने मुखर होकर विरोध किया है।साथ ही इसको लेकर सरकार के खिलाफ अभियान चलाया है। जिसके पक्ष में दुनिया के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्र व अध्यापक के अलावा प्रमुख बुद्धिजीवियों ने अपना समर्थन जताया है। जिनकी संख्या 210 है। जिसमें कैलिफोर्निया, आईआईटी कानपुर, मुंबई,कैंब्रिज समेत देश विदेश के विभिन्न संस्थानों से जुड़े लोग शामिल हैं। ऐसे में पूरी दुनिया में आईआईटी कानपुर की आलोचना हो रही है।

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