जनज्वार विशेष

यहां भाजपा कार्यालय के सामने बिक रहा गौ मांस लेकिन पार्टी को नहीं कोई ऐतराज

Janjwar Team
2 Jun 2017 8:38 AM GMT
यहां भाजपा कार्यालय के सामने बिक रहा गौ मांस लेकिन पार्टी को नहीं कोई ऐतराज
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जनज्वार। गौ मांस सेवन को प्रतिबंधित करने पर आमादा भाजपा का इसे दोहरा रवैया ही कहा जाएगा कि वह कुछ राज्यों में गौ मांस के नाम पर दंगों—फसादों को न्यायोचिक ठहरा देती है, वहीं कुछ राज्यों में वह इस मामले में चूं भी नहीं करती। भले ही भाजपा कार्यालय के सामने ही गाय के मीट का बना स्वादिष्ट व्यंजन क्यों न परोसा जा रहा हो !

कुछ ऐसा ही वाकया अरुणाचल प्रदेश के एक जिले में सामने आया है। पार्टी कार्यालय के ठीक सामने, एक ही चौराहे पर गाय का मीट बेचा जा रहा है लेकिन न तो कोई बजरंगी, न संघी और न भाजपाई गाय को मां—मां कह कर वहां बवाल काट रहा है, प्रदर्शन कर रहा है। जबकि वहां भाजपा के समर्थन से सरकार चल रही है।

फेसबुक पर सामाजिक मसलों को लेकर सक्रिय तौर पर लिखने वाले श्रवण इन दिनों अरुणाचल प्रदेश में हैं। वह वहां से जीवन, सौंदर्य, राजनीति और प्रकृति से जुड़ी तस्वीरों और पोस्ट के माध्यम से लगातार लिख रहे हैं।

उन्हीं में से एक में श्रवण ने फोटो पोस्ट करते हुए लिखा है, 'देश के पूर्वी राज्य अरुणाचल प्रदेश के पासीघाट जिले के मुख्य चौराहे पर भाजपा कार्यालय है। इसी चौराहे पर बीफ का होटल है।'

वह इस पोस्ट में आगे लिखते हैं, 'बीफ मतलब यहाँ गाय का माँस ही है, भैंस का नहीं। चौराहे पर ही माँस काट कर बेचा जा रहा था और एक स्टॉल पर गाय का कटा सिर रखा था। फोटो मैंने जान-बूझकर नहीं ली और न लगायी।'

अपनी पोस्ट की अगली पंक्ति में वे बताते हैं, 'यहीं पर यूपी, बिहार से आए लोगों की दुकानें भी हैं। लेकिन किसी की भावना आहत नहीं हो रही है। और न ही कोई दंगा भड़का है। इसके उलट यूपी, राजस्थान, गुजरात की घटनाएँ देखिए जहाँ गाय के नाम पर गुंडागर्दी जारी है और गुंडागर्दी को भाजपा सरकार राज्य और केंद्र दोनों की समर्थन प्राप्त है।'

एक खबर का हवाला देते हुए श्रवण ने लिखा है, 'कुछ दिन पहले असम ट्रिब्यून में संघ के हवाले से खबर आई थी कि वे पूर्वोत्तर वासियों को गौमाँस छोड़ने का आग्रह करेंगे।'

संघ के आग्रह से भी जाहिर है कि पूर्वोत्तर में हिंदू और आदिवासी गौ मांस का सेवन करते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि यूपी, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश में गौ का मांस का 'मां का मांस' कैसे हो जाता है और पूर्वोत्तर में वही मांस जब भाजपाइयों के दर पर बिकता है तो वह मीट का होटल मात्र क्यों मान लिया जाता है?

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