प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति सोमनाथ के बहाने खोल रही है एक नया विभाजनकारी मोर्चा, इतिहास फिर बना सियासी औज़ार !

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वरिष्ठ लेखक राम पुनियानी की टिप्पणी
राममंदिर आन्दोलन या दूसरे शब्दों में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने से भाजपा और उसकी पितृ संस्था आरएसएस को चुनावों में जबरदस्त फायदा हुआ. अब काशी और मथुरा की बारी है.
इस बीच 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के रूप में एक नया मोर्चा खोल दिया गया है. इस मौके पर धार्मिक धजा में सजे-बजे हमारे नॉन-बायलोजिकल प्रधानमंत्री ने दो बातें कहीं. एक साफ शब्दों में और दूसरी घुमा-फिरा कर. पहली बात जो उन्होंने कही वह यह कि सोमनाथ मंदिर भारत के गौरव का प्रतीक है. मुस्लिम राजाओं ने इस पर बार-बार हमले किए लेकिन वह हर बार और अधिक शान के साथ उठ खड़ा हुआ. महमूद गज़नी ने इसे 1026 ईस्वी में नष्ट किया और 17 बार लूटा. दूसरी बात जो उन्होंने कही वह कांग्रेस और खास तौर पर जवाहरलाल नेहरू पर अपरोक्ष हमला थी. मोदी ने नेहरू, जिनसे वे शायद सबसे ज्यादा नफरत करते हैं, पर मंदिर के पुननिर्माण का विरोध करने का आरोप लगाया.
कोई उपासना स्थल किसी देश या उसके गौरव का प्रतीक हो सकता है, यह अत्यंत संदेहास्पद है. धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होता है उसके नैतिक मूल्य, जैसा कि हमें हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने बताया था.
जहां तक महमूद गज़नी का सवाल है, उसने निसंदेह इस मंदिर को लूटा था. उसके दरबारी इतिहासविदों के अनुसार उसने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि इस्लाम में मूर्तिपूजा की इजाजत नहीं है. फारसी अध्येताओं अल उताबी और अल बरूनी के अनुसार सोमनाथ मंदिर में भारी दौलत थी. मूर्तिपूजा वाले दावे का सबसे शंकास्पद पहलू यह है कि यदि गज़नी का लक्ष्य मूर्तियां तोड़ना ही था तो उसने गज़ना से सोमनाथ के रास्ते में पड़ने वाली असंख्य मूर्तियों को क्यों बख्श दिया.
महमूद गज़नी के सोमनाथ पर आक्रमण करने की कई वजहें हो सकती हैं. सबसे बड़ी वजह थी धन-दौलत, क्योंकि वह भारत के सबसे समृद्ध मंदिरों में से एक था. रोमिला थापर (हिस्ट्री ऑफ एनशिंएट इंडिया, पेंगुइन) के अनुसार वहां सोने की 20,000 दीनारों के बराबर संपदा थी. किसी भी विश्वसनीय स्त्रोत से यह जानकारी नहीं मिलती कि गज़नी ने 17 बार इस मंदिर को लूटा था. यह एक प्रचलित मिथक है. उसने जो संपदा लूटी वह उसे कई हाथियों पर लादकर गज़ना ले गया. तारीख-ए-बायकी के मुताबिक गज़नी की सेना में तिलक, सोंधी, हरजान और हिंद जैसे कई हिंदू सेनापति थे. गज़नी के उत्तराधिकारी मसूद ने मध्य एशिया की एक मस्जिद को लूटने के लिए अपने सेनापति तिलक के नेतृत्व में सेना भेजी थी.
गज़नी ने सोमनाथ से जाते समय एक स्थानीय हिन्दू राजा को वहां का राजकाज सौंपा. उसने सिक्के भी जारी किए जिन पर संस्कृत में कुछ शब्द उत्कीर्ण थे. इतना ही नहीं, थानेश्वर के राजा आनंदपाल ने गज़नी की मदद के लिए हाथी और सैनिक आदि भेजे.
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिरों को नष्ट करने के पीछे आम तौर पर धार्मिक कारण नहीं होते थे. मुगल-पूर्व भारत में मंदिरों को नष्ट किए जाने पर अपने शोध में रिचर्ड ईटन बताते हैं कि हिन्दू राजाओं के बीच युद्ध में जीतने वाला राजा हारने वाले राजा के कुलदेवता की मूर्ति तोड़कर उसी जगह अपने कुलदेवता की मूर्ति स्थापित करता था. मुल्तान के अब्दुल फतह दाऊद और खिलजी के बीच हुए युद्ध में एक मस्जिद तबाह कर दी गई थी.
राजाओं को उनके धर्म के चश्मे से देखना अंग्रेजों के भारत आने के बाद शुरू हुआ जब उन्होंने अपनी ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति के अंतर्गत भारत के इतिहास का साम्प्रदायिक लेखन शुरू करवाया. जेम्स मिल की भारत के इतिहास पर लिखी गई पुस्तक से शुरू कर इलियट और डोसेन की कई खण्डों वाली ‘हिस्ट्री ऑफ इंडिया एज टोल्ड बाय हर हिस्टोरियंस' तक में राजाओं के धर्म के आधार पर उनके राजकाज और कार्यों को परखा गया.
मोदी की राजनीति सोमनाथ के बहाने एक नया विभाजनकारी मोर्चा खोल रही है जिसमें नेहरू को भी जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. मोदी हमें बता रहे हैं कि नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनिर्निर्माण के खिलाफ थे. यह झूठ है. यह मसला जब पहली बार उठा तब गांधीजी जीवित थे. उन्होंने साफ-साफ यह राय दी थी कि मंदिर निर्माण के लिए सरकारी धन का उपयोग कतई नहीं होना चाहिए. राममंदिर के निर्माण के मसले पर विचार करते हुए कुछ साल पहले ठीक यही सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा था. गांधी, नेहरू और पटेल इस संबंध में एकमत थे. 28 नवंबर 1947 को अपनी प्रार्थनासभा में गांधीजी ने कहा था कि जूनागढ़ की सरकार मंदिर बनाने के लिए कोई सरकारी पैसा नहीं दे सकती.
गांधी ने सरदार पटेल से पूछा कि क्या सोमनाथ मंदिर के निर्माण के लिए सरकार द्वारा कोई रकम दी जा रही है. पटेल ने जवाब दिया कि जब तक वे जीवित हैं तब तक ऐसा कुछ भी नहीं होगा और मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए जनता से चंदा इकठ्ठा किया जाएगा. तदानुसार एक न्यास स्थापित किया गया जिसके अध्यक्ष सरदार पटेल बने. केएम मुंशी व गाडगिल उसके न्यासी बनाए गए. इसी न्यास ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया.
झूठा प्रोपेगेंडा यही नहीं रुकता. इसके बाद मंदिर के उद्घाटन का मसला उठाया जाता है. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को मंदिर का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया और उन्होंने नेहरू से इस बारे में राय मांगी. राजेंद्र प्रसाद ने 2 मार्च 1951 को नेहरु को एक पत्र लिखकर बताया कि वे अपनी व्यक्तिगत हैसियत से मंदिर का उद्घाटन करने जाना चाहते हैं. नेहरू ने कहा यदि वे जाना चाहते हैं तो जाएं, इसमें उन्हें कोई ऐतराज नहीं है. यही बात नेहरू ने सी. राजगोपालाचारी से 11 मार्च 1951 को कही (पीयूष बबेले के अनुसार).
पीयूष बबेले स्पष्ट करते हैं कि ये सारी बातें साक्ष्यों पर आधारित हैं. वे वर्तमान प्रधानमंत्री पर भी कटाक्ष करते हुए सवाल करते हैं कि तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और वर्तमान राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को राम मंदिर से जुड़े कार्यक्रमों में क्यों निमंत्रित नहीं किया गया. इन दोनों को राम मंदिर के शिलान्यास और उद्घाटन समारोहों में निमंत्रित न करने का स्पष्ट कारण यह था कि इनमें से एक दलित है और दूसरी आदिवासी!
अजीत दोभाल, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के उच्च पद पर आसीन हैं, ने 11 जनवरी 2025 को दिल्ली में युवा उत्सव के उद्घाटन के मौके पर युवाओं को जो सलाह दी वह घोर प्रतिगामी है. उनके मुताबिक हमारे मंदिरों को लूटा गया, हमारे गांवों को तहस-नहस किया गया और अब इसका बदला लेने का समय आ गया है! बदला लेना आधुनिक न्याय व्यवस्था का हिस्सा नही है. यह सब मध्ययुग की बातें हैं. हर गुनाह के लिए अपराधी को दंड मिलना चाहिए और बेकसूर को संरक्षण. अजीत दोभाल जिन कथित अपराधों का जिक्र कर रहे हैं उनका बदला किससे लिया जाना चाहिए? मुस्लिम और हिन्दू राजाओं द्वारा नष्ट किए गए मंदिरों का बदला किससे लिया जाना चाहिए? अतीत में हुए कई अत्याचारों का तो उन्होंने ज़िक्र ही नहीं किया. अतीत में बौद्ध विहारों को नष्ट किया गया, जैन मंदिरों को तबाह किया गया और दलितों और महिलाओं के साथ नृशंसता की गई. महिला को उसके पति की चिता पर जिंदा जला देने की सती प्रथा भी प्रचलन में थी. इन सबका बदला किससे लिया जाना चाहिए?
इतिहास समाज को बांटने और अतीत के अन्यायों को चिरस्थायी बनाने का औजार नहीं है. इतिहास हमें बताता है कि अतीत में क्या गलत हुआ जो दुबारा नहीं होना चाहिए. हमें एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ना है, जहां सभी सम्मान और गरिमा के साथ रहें - एक ऐसा समाज जिसमें सभी को नागारिक के रूप में एक बराबर हक़ हासिल हों.
(मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे लेख का हिंदी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया ने किया है, लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं।)











