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राजनीति

गौ गुंडों को उनकी भाषा में कब जवाब देंगे मोदी

Janjwar Team
2 July 2017 10:37 AM GMT
गौ गुंडों को उनकी भाषा में कब जवाब देंगे मोदी

प्रधानमंत्री को भी, जो स्वयं संघ प्रचारक रहे हैं, खूब पता होगा कि इन पर गांधी की अपील नहीं, कानून का डंडा असरकारी होगा...

वीएन राय, पूर्व आईपीएस

देशभर के साठ से अधिक अवकाश प्राप्त आईएएस और आईपीएस अफसरों ने प्रधानमंत्री मोदी से कानून का शासन सुनिश्चित कर गौ भक्ति के नाम पर चल रही खूनी निगरानी मुहिम को समाप्त करने का आह्वान किया है. 24 जून को लिखे खुले पत्र में इन अफसरों ने गंभीरतम आरोप लगाया है कि तथाकथित गौ भक्त राज्य संरक्षण में जघन्य अपराध कर रहे हैं.

इनमें कुछ अफसर पिछले कांग्रेसी ज़माने के पिछलग्गू माने जाते हैं, तो भी ये अनुभवी अफसर जानते हैं कि वे आज किससे क्या कह रहे हैं. न ही इससे स्थिति की भयावह संभावनाएं कम हो जाती हैं. दरअसल, साजिश कहीं गहरी लगती है, संभवतः मोदी और भाजपा के भस्मासुरी खाबो-ख्याल से भी आगे निकलती हुयी.

मेरे पास किसी ने फेसबुक मैसेंजर पर रिकॉर्ड की हुयी बातचीत के स्क्रीन शॉट भेजे हैं. हाल के फरीदाबाद ट्रेन बीफ हमले के सन्दर्भ में हिन्दुत्ववादियों के बीच अंग्रेजी में हुयी बातचीत का सार है कि इस देश में हिन्दू और मुस्लिम साथ नहीं रह सकते. वरिष्ठ हिंसक आवाज का कहना था कि ट्रेन में सीट के लिए एक 16 वर्षीय मुस्लिम लड़के की जान लेने में कुछ खास नहीं; हाँ यदि बीफ के नाम पर उसे मारा गया है तो ठीक है.

सवाल है गौ गुंडों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गांधी की भाषा में कब तक पुचकारते रहेंगे? वे उनसे उन्हीं की भाषा में कानूनी बात कब करना शुरू करेंगे. कानून के शासन की अपील का हश्र यह है कि 29 जून को अहमदाबाद में मोदी एक ओर अहिंसात्मक गौ-भक्ति की चेतावनी दे रहे थे और उधर झारखण्ड में गौ गुंडे मुस्लिम वैन चालक को बीफ के नाम पर मौत के घाट उतारने की फिल्म बना रहे थे.

जगजाहिर है कि परजीवी गुंडों के ये समूह भाजपा शासित राज्यों में ही, जहाँ परदे के पीछे से आरएसएस की भाषा-बोली अमल में लाई जाती है, गौ सेवा के नाम पर सरेआम मुस्लिमों की हत्या कर आतंक फैलाते हैं.

कभी-कभी घंटों चलने वाले इन सुनियोजित हादसों को फिल्म बनाकर प्रसारित किया जाता है. नृशंसता के प्रदर्शन में कोई कसर न रह जाये, हत्या और आगजनी को लात, घूंसों, डंडों और पत्थरों से अंजाम देना आम है. ताकि, इस तरह से गुंडा गिरोहों का दबदबा और फिरौती का सिलसिला बना रहे.

उस दौरान इन गिरोहों की भाव-भंगिमा देखने लायक आत्मविश्वास से भरी होती है. उन पर कानून का किसी किस्म का कोई भय काम कर रहा हो, ऐसा नहीं प्रतीत होता. चंद मामलों में तो वे पुलिस की मूक उपस्थिति में ही हत्याओं को अंजाम दे रहे देखे जा सकते हैं.

प्रधानमंत्री को भी, जो स्वयं संघ प्रचारक रहे हैं, खूब पता होगा कि इन पर गांधी की अपील नहीं, कानून का डंडा असरकारी होगा.

लाख उनके आलोचक मोदी को ‘फेकू’ कहें, बेशक वे कोई भाषाविद न भी हों, पर अपने प्रशंसकों के बीच उनकी छप्पन इंची ख्याति सामने वाले को उसी की भाषा में जवाब देने की रही है. पाकिस्तान को पाकिस्तान की भाषा में तो वे जवाब दे ही रहे थे, अब दावा किया जा रहा है कि चीन को भी वे उसी की भाषा में जवाब दे रहे हैं.

मोदी का यह असर उनके प्रशासन में भी पैठना स्वाभाविक ही माना जाएगा. मसलन, कश्मीर में सिर्फ वे ही आतंकियों को उनकी भाषा में सबक सिखाने के हिमायती वाली छवि के मालिक नहीं रहे हैं, पिछले दिनों उनके सेना अध्यक्ष तो वहां के पत्थर फेंकने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने के नाम पर एक ‘दुश्मन’ कश्मीरी मुस्लिम युवक को जीप से बाँध कर घंटों घुमाने की वाहवाही लूटते दिखे. ऐसे में गौ गुंडों से निपटने में मोदी और उनका प्रशासन इतने फिसड्डी क्यों दिख रहे हैं?

आधार, नोटबंदी और जीएसटी के मोर्चे पर आगे बढ़ने का जो दुस्साहस मोदी ने अब तक दिखाया है, वह यहाँ नदारद क्यों? जबकि दांव पर उनका बहुप्रचारित विकास का एजेंडा और स्वयं की अंतरराष्ट्रीय साख है. जाहिर है, आरएसएस की हिंदुत्व गोलबंदी रणनीति में गौ-हत्या का मुद्दा, मुस्लिम विरोध के मंच का परखा हुआ आयाम रहा है.

2019 के चुनाव तक इस स्थिति में रत्ती भर बदलाव होता नजर नहीं आता. मोदी को स्टेट्समैन का दर्जा देने वाले उनके पाले के बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि गौ गुंडों को लेकर आरएसएस को चुनौती दे पाने का माद्दा मोदी 2019 का चुनाव जीत कर ही दिखाने की सोच पायेंगे.

भाजपा शासन और गौ आतंक का सम्बन्ध समझने के लिए एक नजर जोड़ी राज्यों, पंजाब-हरियाणा और बिहार-झारखण्ड पर डालना काफी होगा. जहाँ भाजपा शासित हरियाणा और झारखण्ड गौ गुंडई में सबसे बदनाम राज्यों में शुमार हैं, बिहार में लालू और पंजाब में अमरेंदर के सत्ता में आने के बाद गाय के नाम पर गुंडा गिरोहों की उगाही पर लगाम लग गयी है. यानी बिहार और पंजाब में जैसे ही गौ आमदनी बंद हुयी, गौ गुंडई भी समाप्त हो गयी.

दरअसल, मोदी शासन के तीन वर्षों में तमाम भाजपा सरकारें, गौ हत्या को लेकर कठोर से कठोर कानून बनाने के बावजूद, गौ गुंडों के सामने बेबस सिद्ध हुयी हैं. इसलिए भी क्योंकि भाजपा शासक ऐसा गौ अर्थशास्त्र नहीं बना सके जहाँ गौ पालक के लिए गाय को जीवित रखना उसे मरने देने से अधिक लाभप्रद हो. इसलिए न देश में बड़े बीफ कारखाने बंद हो पा रहे हैं, न बांग्लादेश को होने वाली व्यापक पशु तस्करी और न गौ हत्या को दंडनीय घोषित करने वाले राज्यों में बीफ मांस का खुदरा कारोबार.

दूसरी तरफ, भाजपा शासित राज्यों में सरकारी संरक्षण के चलते, गौ आतंक का अर्थशास्त्र खूब फल-फूल रहा है. गौ पालन के नाम पर सरकारी अनुदान डकारने की सुविधा तो है ही, गौ गिरोहों द्वारा रोजमर्रा की प्राइवेट उगाही भी आम चलन में आ गयी है. लिहाजा गौ तस्करी या बीफ व्यापार रोकने के नाम पर इन गिरोहों को भगवा स्कार्फ लगाकर धार्मिक गुंडई की खुली छूट पर स्वयं मोदी का वश भी काम नहीं करता.

हो सकता है आगामी 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से मोदी पुनः गौ आतंक पर कुछ न कुछ लपेट कर कहें. हालाँकि, नतीजा वही ढाक के तीन पात रहना है. याद कीजिये गत वर्ष जब वे लाल किले से ऐसा ही आह्वान कर रहे थे, अकाली-भाजपा शासित पंजाब में पुलिस गौ रक्षा दल के राज्य प्रधान की तलाश में भटकने को मजबूर हो रही थी जिस पर सोडोमी और फिरौतीबाजी के दर्जनों संगीन मामलों का आरोप था.

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