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भीड़ का अपराध, भीड़ का न्याय और भेड़ों का जयकारा! दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भीड़तंत्र का तमाशा बन गया है!

Nirmal kant
7 Dec 2019 10:29 AM GMT
भीड़ का अपराध, भीड़ का न्याय और भेड़ों का जयकारा! दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भीड़तंत्र का तमाशा बन गया है!
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आज की वर्चस्ववादी सता धर्मान्धता को राष्ट्रवाद की आड़ में पुन: स्थापित कर रही है। दुखद यह है कि समाज का एक हिस्सा ही भेड़ नहीं बना है। यह भेड़ बनने का प्रकरण संविधान की रक्षा करने वाली संस्थाओं में भी तेजी से फ़ैल रहा है जिसकी नुमाइश हैदराबाद जैसे एनकाउंटर से होती है...

मंजुल भारद्वाज की टिप्पणी

ज सुबह हैदराबाद में हुआ एनकाउंटर ‘भीड़ का अपराध, भीड़ का न्याय और भेड़ों का जयकारा!’ का दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को भीड़तंत्र का तमाशा बना दिया! इस तरह की घटना उसी तरह के अपराध की स्टेट यानी राज्य व्यवस्था द्वारा पुनरावृति है जिस तरह का अपराध ‘एनकाउंटर में मारे गए जघन्य अपराध’ के आरोपियों ने किया था। किसी भी न्याय संगत व्यवस्था में ‘पुलिस’ न्याय एजेंसी नहीं होती। जहाँ पुलिस न्याय अपने हाथ में लेती है वो सिर्फ़ एक सनकी तानाशाह के राज में ही हो सकता है।

पूरा समाज बेटियों पर हो रही यौन हिंसा और उसके बाद उनको जलाकर मारने की अमानवीय घटनाओं से उद्वेलित है। पूरे समाज में रोष है। पूरे समाज का इस तरह उद्वेलित होना जायज और मानवीय है। यह एक संवेदनशील और न्याय प्रिय समाज की निशानी है। पर इसी आक्रोश को चंद भीड़ मानसिकता वाले ‘आँख के बदले आँख’ वाले न्याय की व्यक्तिगत भड़ास में बदल देते हैं।

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वो भारत की लचर न्याय व्यवस्था की आड़ लेकर अपने कुकृत्य को सही ठहराते हैं। मुनाफ़ाखोर मीडिया इनके इस कुकृत्य को सच्ची देशभक्ति के रूप में बेचता है। दरअसल देशभक्ति कोई भांग की गोली नहीं है जिसे खाकर होश खो बैठो। देश भक्ति विवेक और न्याय की पवित्र भावना है। पर राष्ट्रवाद के उन्माद में भेड़ बन चुके समाज के एक हिस्से से बाकी जनता को विवेक का संघर्ष करना पड़ेगा।

ब आओ रेप के बुनियादी बिन्दुओं पर गौर करें। हमारा समाज संस्कृति की चद्दर, संस्कारों के लिहाफ़ और परम्पराओं के तकिये को सिरहाने लगा कुंभकर्ण की नींद सोता है। सीता की अग्नि परीक्षा के समय किसने आवाज उठाई थी? धोबी के शक को मर्यादा पुरुषोत्तम राजा ने सत्य माना।उसी शक का खामयाजा आज भी भारतीय नारी भुगत रही है।

से मृत्यु तक दोयम दर्जे के जीवन को जीते हुए संस्कृति के ढकोसलों के माता स्वरूप में बंधवा मजदूर बनकर जीते जी दफ़न हो जाती है। तब कौन हाय तौबा मचाता है? हर रोज मैरीटल रेप की शिकार होती हैं महिलाएं,पर कौन आवाज उठाता है? हम सब संस्कृति के पाखंड की आड़ में अपने शोषणकारी मर्द और मर्दवाद को सहलाते रहते हैं। समाधान के लिए सतही नहीं विषय की बुनियाद पर विमर्श हो!

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रेप हमारे समाज के निर्माण सूत्र में है। सामंत और पितृसत्तात्मक समाज में रेप मर्द, मर्दवाद और उसकी सनक को साबित करने का वर्चस्वादी हथियार है। जब तक समाज के निर्माण बुनियाद से यह हटेगा नहीं तब तक कानून प्रभावी नहीं होगा। इसलिए हमारे समाज निर्माण के मूल सूत्रों को बदलने की जरूरत है!

लेकिन आज की वर्चस्ववादी सता धर्मान्धता को राष्ट्रवाद की आड़ में पुन: स्थापित कर रही है। दुःखद यह है कि समाज का एक हिस्सा ही भेड़ नहीं बना है। यह भेड़ बनने का प्रकरण संविधान की रक्षा करने वाली संस्थाओं में भी तेजी से फैल रहा है जिसकी नुमाइश हैदराबाद जैसे एनकाउंटर से होती है।

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