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भारत के रेडिमेड कपड़ा उद्योग में जा सकती हैं 1 करोड़ नौकरियां, मंदी से उबरने में लग जायेंगे सालों

Nirmal kant
7 May 2020 4:30 AM GMT
भारत के रेडिमेड कपड़ा उद्योग में जा सकती हैं 1 करोड़ नौकरियां, मंदी से उबरने में लग जायेंगे सालों
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खुद कपड़ों के निर्यातक और इंडियन इंडस्ट्रीज़ असोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव राजीव बंसल कहते हैं-'यह सच है कि 2020 के बाकी बचे समय में पूरा करने के लिए हमारे पास कोई ऑर्डर नहीं है....

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पंत का विश्लेषण

वैश्विक लॉकडाउन के चलते भारत में भी रेडिमेड कपड़ा उद्योग के हालात बांग्लादेश जैसे होते जा रहे हैं। वहां कपड़ा उद्योग से जुड़े 40 लाख से भी ज़्यादा कामगारों में से आधे लोग बेरोज़गारी के संकट का सामना कर रहे हैं तो यहां तो 1 करोड़ से भी ज़्यादा कामगारों पर बन आयी है। भारत में कपड़ा उद्योग के संगठन 'क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स असोसिएशन ऑफ़ इंडिया' के चीफ मेन्टोर राहुल मेहता का कहना है कि अगर केंद्र सरकार से सहायता या पैकेज नहीं मिलता है तो देशभर में रेडिमेड कपड़ा उद्योग में 1 करोड़ से भी ज़्यादा लोग बेरोज़गार हो जायेंगे।

गौरतलब है कि 3700 औद्योगिक इकाइयां इस संगठन से जुडी हैं। इन इकाइयों में 7 लाख कामगार काम करते हैं। राहुल मेहता कहते हैं कि रेडिमेड कपड़ा उद्योग के बंद होने का मतलब है कि इस उद्योग को आपूर्ति करने वाले फैब्रिक उद्योग, ज़िप बनाने वाली कम्पनियाँ और लेबल तैयार करने वाली इकाइयां जुडी हैं। ये सब बंद हो जाएंगी।

धर दिल्ली से सटे नोएडा में भी कपड़ा व्यापारियों का बुरा हाल है, खासकर रेडिमेड कपड़ों के क्षेत्र से जुड़े निर्यातकों का। रेडिमेड कपड़ों का धंधा नोएडा के सबसे बड़े उद्योग-धंधों में आता है। यहां 500 से भी ज़्यादा रेडिमेड कपड़ों के निर्माता हैं। इनमें बहुत से बड़ी-बड़ी ब्रांड्स के लिए निर्यातक भी हैं। ये निर्यातक लगभग 50 हज़ार लोगों को रोज़गार देते हैं जिनमें 60 फीसदी महिलाएं हैं जो सिलाई करने, धागा काटने, काज बनाने और बटन टांगने जैसे काम करती हैं।

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खुद कपड़ों के निर्यातक और इंडियन इंडस्ट्रीज़ असोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव राजीव बंसल कहते हैं-'यह सच है कि 2020 के बाकी बचे समय में पूरा करने के लिए हमारे पास कोई ऑर्डर नहीं है।

मारे संगठन से ऐसे-ऐसे निर्यातक जुड़े हैं जो Zara, H & M, M & S, Arcadia, Tom Taylor और Aeropostle जैसे दुनिया के टॉप ब्रांड्स के लिए कपडे तैयार करते हैं। भेजे गए माल की बहुत सी खेप निरस्त कर दी गयी हैं। कुछ आयात होने वाले माल को रोक दिया गया है और रास्ते में चल चुका माल निरस्त किया जा चुका है। भावी ऑर्डर्स भी निरस्त कर दिए गए हैं और पहले का ऑर्डर का भुगतान भी नहीं आया है। इसलिए निर्यातक भारी मुसीबत में हैं।'

धर तमिलनाडु में कपड़ा निर्माण और निर्यात के केंद्र तिरुपुर का भी हाल बेहाल है। लॉकडाउन के चलते वहां की सड़कें सूनी हैं और फैक्ट्रियां ठप्प। तिरुपुर भारत का कपड़ा उद्योग का बहुत बड़ा केंद्र है। भारत द्वारा किये जाने वाले सूती रेडिमेड कपड़ों के निर्यात का 80 फीसदी यहीं से जाता है। यहां छोटी-मझोली 10 हज़ार फैक्ट्रियां चलती हैं और यहां के उद्योग 6 लाख लोगों को रोज़गार देते हैं। यही नहीं, यहां से लगभग 25 हज़ार करोड़ का निर्यात किया जाता है और इतनी ही राशि का व्यापार देश के भीतर भी होता है। अनुमान लगाया जा रहा है कि तीन महीनों में ही यहां के उद्योग को 10 से 12 हज़ार करोड़ रुपयों का नुक्सान हो जाएगा।

नोएडा के रेडिमेड कपड़ा निर्यातकों का भी मानना है कि लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद दुबारा पैरों पर खड़ा होना बहुत मुश्किल होगा। उधर राहुल मेहता बताते हैं कि क्लोदिंग मैन्युफेक्चरर्स असोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने अपने सदस्यों के बीच एक सर्वे किया था और दिए गए डेढ़ हज़ार जवाबों का विश्लेषण किया था। उनका कहना है कि परिणाम बड़े भयंकर निकले। कम से कम बीस फीसदी लोगों ने कहा कि वे लॉकडाउन के बाद अपना धंधा बंद करने की सोच रहे हैं जबकि 60 फीसदी व्यापारियों का अनुमान था कि आमदनी में 40 फीसदी की कमी आ जाएगी. जिसका मतलब है कि बहुत बड़े स्तर पर बेरोज़गारी पैदा हो जाएगी।

चिंता की बात तो ये है कि चीन में ऐसा होते देखा गया है। कोविड-19 का संकट समाप्त होने के बाद चीन में बाजार खुलने के बाद से रेडिमेड कपड़ों के खुदरा व्यापार में 59 फीसद की गिरावट हुई है जबकि खाने-पीने के सामानों और दूसरी चीज़ों के व्यापार में बढ़ोत्तरी हुई है। रिटेलर्स असोसिएशन ऑफ़ इंडिया का कहना है कि पचास फीसदी छोटे खुदरा व्यापारियों ने मन बना लिया है कि वे लॉकडाउन के बाद अपने स्टोर्स नहीं खोलेंगे।

गर सीमांतक और छोटे व्यापारी अपनी दुकानें बंद कर देते हैं तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं क्योंकि बड़ी संख्या में लोगों को रोज़गार से हाथ धोना पड़ सकता है। यही नहीं इसका प्रभाव इससे जुड़े दूसरे सहभागी उद्योग-धंधों पर भी पड़ सकता है।

गौरतलब है कि कपड़े और पोशाक की वैश्विक बाज़ार में भारत की हिस्सेदारी 4 फीसदी की है। कुल उत्पादन, विदेशी मुद्रा की कमाई और रोज़गार पैदा करने की नज़र से कपड़ा एवं पोशाक इंडस्ट्री भारतीय अर्थव्यवस्था को पोषित करने वाले सबसे बड़े और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।

द्योगिक उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 7 फीसदी है, जीडीपी में 2 फीसदी है और देश के निर्यात से होने वाली आमदनी में इसकी हिस्सेदारी 15 फीसदी है। यह क्षेत्र भारत में 4 करोड़ 50 लाख लोगों को रोज़गार देता है लेकिन लॉकडाउन के चलते बहुत सी फ़ैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं और निचली पायदान के कम मज़दूरी पाने वाले बहुत से कामगारों की तो छुट्टी भी हो चुकी है।

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पडा उद्योग में काम करने वाले ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर हैं जो उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और दूसरे राज्यों से आ कर काम करते हैं। लॉकडाउन के चलते इनका खाना-पीना और रहना दूभर हो गया है। इसलिए ये लॉकडाउन ख़त्म होने के पहले ही अपने-अपने गांवों को लौट जाना चाहते हैं। लॉकडाउन ख़त्म होने के बाद ये वापिस लौट कर आना नहीं चाहते हैं। ऐसे में कपड़ा उद्योग को चला पाना बहुत मुश्किल होगा। वैसे भी भारत के रेडिमेड कपड़ों के क्षेत्र को ज़्यादा काम अमेरिका और यूरोप से मिलता रहा है लेकिन वहां भी लॉकडाउन की वजह स्टोर्स बंद हैं और ऑर्डर्स ठप्प हैं।

दीगर है कि केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल से कपड़ा निर्माताओं से लिए जाने वाले केंद्रीय और राज्य स्तर के करों में मिलने वाली छूट की अवधि को बढ़ा दिया है लेकिन इससे इन्हें बहुत राहत नहीं मिलने वाली क्योंकि वैश्विक लॉकडाउन के चलते ये लोग लगभग दिवालिया होने की कगार पर पहुंच ही चुके हैं।

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