संस्कृति

विभा रानी की कहानी 'पकिया भूत'

Prema Negi
3 Sep 2019 4:16 AM GMT
विभा रानी की कहानी पकिया भूत
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बहुमुखी प्रतिभा की धनी विभा रानी केवल कहानियां ही नहीं लिखतीं, वह अच्छी कविताएँ भी लिखती हैं तथा नाट्य लेखन में भी सक्रिय हैं। इसके अलावा वह एक रंगकर्मी भी हैं।हिन्दी और मैथिली में समान रूप से सृजनरत हैं और गत दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अपनी पहचान भी बनाई है। पिछले दिनों भोपाल में उनके कहानी पाठ ने मेरा ध्यान खींचा। आज उनकी एक कहानी 'पकिया भूत' यहाँ पेश की जा रही है, जो एक भूत की सामान्य कथा न होकर यौन शोषण की कहानी है। यह एक me too अनुभव है, जिसे बहुत ही कलात्मक तरीके से संकेतों में उन्होंने प्रस्तुत किया है। भूत की कथा कहते हुए वह समाज की भयावह सच्चाई की कहानी कहती हैं, जहां हर जगह भेड़िये बैठे हैं और वे आसपास ही हैं। इस कहानी में स्त्री का विरोध उतना मुखर भले न हो, पर उसका प्रतीकात्मक प्रतिवाद तो करती है शिक्षिका, घर से सुबह निकल कर। आइए पढ़ते हैं विभा रानी की कहानी 'पकिया भूत' : विमल कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और कवि

पकिया भूत

विभा रानी

सने कभी भूत को नहीं देखा था, लेकिन भूतों के बारे में सुना जरूर था। उसने कई भुतहा कहानियां पढ़ी भी थी और भुतहा हिन्दी फिल्में भी देखी थी। इन फिल्मों से उसका जनरल नॉलेज काफी बढ़ा था। उसे पता चला था कि लड़कियां अगर भूत होती हैं तो वह सफेद कपड़े में रहती हैं और भूत होकर भी काफी कमनीय और खूबसूरत होती हैं, जबकि आदमी अगर भूत होते हैं तो वे काले लिबास में रहते हैं और भयानक, काले और खूंखार होते हैं। भूतों के इन तथ्यों के साथ-साथ उसके आस पड़ोस में भी भूत प्रेत चढ़ने और उसे झाड़ने-उतारने के ढेर सारे किस्से थे, जिनमें से कुछ उसने खुद भी देखे थे।

सके घर के बगल में एक नई बहुरिया आई थी। कहते हैं कि उसका आदमी उसे बहुत प्यार करता था। लेकिन वह अपने बाप के साथ ट्रक पर महीने में 28 दिन रहता था और एक-दो दिन के लिए बाप के साथ ही घर लौटता था। घर एक ही कमरे का था, जिसमें उसका बाप एक दिन खुद सोता और दूसरे दिन कमरा बेटे को दे देता। तब बाप मोहल्ले में किसी के दालान की चौकी पर सो जाता और उसकी मां कमरे के सामने के ओसारे पर। लेकिन तब वह रात भर जागती बड़बड़ाती रहती। भगवान जाने, इस बडबडाने की वजह से या किसी और वजह से, कमरे में अलबत्ता शांति पसरी पड़ी रहती।

कुछ दिनों बाद पता चला कि उस बहुरिया पर भूत आया है और बार-बार आता रहता है। झाड़-फूंक के लिए ओझा-गुनी को बुलाया गया। नीम के पत्तों की झाड़ू बनाकर उससे बहुरिया को झाड़ा गया और उस पर मुट्ठी-मुट्ठी करके कई मुट्ठी मिर्च झोंकी गई । खुले बाल और इधर उधर अटकते भटकते कपड़ों के साथ झूमती बहुरिया को मिर्ची लगती या नहीं मालूम नहीं, लेकिन हैरानी की बात होती कि वह मिर्च किसी को भी नहीं लगती। ओझा विजय भाव से सभी को देखता और कहता, “देखो कैसी जबरिया भूतनी है। मिर्च की झाँस को भी खाकर पचा जाती है। किसी को सूंघने तक नहीं देती।”

संसार का कोई भी विषय हो, उसकी तमाम जानकारी का स्रोत उसकी मां हुआ करती थी और उससे भी अगर मन नहीं भरता तो वह दादी के पास चली जाया करती। भूतों के बारे में उसने मां से पूछा कि क्या सचमुच में भूत होते हैं? पढ़ी-लिखी मां ने कहा कि भूत मन का वहम है। असल में, अपने ही मन में भूत होते हैं। दादी ने कहा कि किसी की आत्मा जब मोक्ष नहीं पाती है तो वह प्रेत और भूत में बदल जाती है।

दादी ने यह भी कहा कि भूत भी अच्छे और बुरे होते हैं। प्रमाण में दादी ने बताया कि उनके अपने ही ऊपर उनके खेत में काम करने वाले जीतन भगत का भूत आता रहता था। जीतन भगत जब भी खेत में कुछ गड़बड़ी होते देखता तो वह उन पर आ जाता और बताता कि फलाने-फलाने लोग फलाने-फलाने गड़बड़ करने वाले हैं। घर के लोग सजग हो जाते, साथ ही उनके खेत में काम करने वाले भी। बल्कि, कईयों ने वहां काम करना इसलिए बंद कर दिया कि भूत ने उन्हें चोर और बेईमान ठहरा दिया।

ह शहर में थी और अपनी पढ़ाई कर रही थी। उसे भूतों की कहानियां दिलचस्प और रोमांचक लगतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका मन नहीं मानता कि कोई भूत प्रेत होता भी है। एक बार बचपन में उसे लगा था कि कोई एक भूत उसके पास आया है और अपने लम्बे साए से उसे सर से पाँव तक ढंककर चला गया है। वह बेहद डर गयी, मगर उसने भूत के इस साए के बारे में जानने के लिए माँ या दादी से नहीं पूछा। फिर उसे लगने लगा कि उसके आसपास ढेर सारे भूत हैं। अब वह सपनों में भी भूतों को देखती और डर के मारे पसीने-पसीने हो जाती।

से वे सब भूत हकीकत में नजर आते। वह देखती कि उनमें से एक भूत उसके आंगन में आता है और बेहयाई से उसको मुस्कराकर देखते हुए उससे भर लोटा, भर ग्लास पानी मांगकर पीता है। उसको जब तक वह देखती, समझती, तब तक देखती कि एक दूसरा भूत आता है, उससे चाय की फरमाइश करता है। जब तक वह उसके लिए चाय लेकर जाती है, तब तक वह देखती कि कोई तीसरा भूत उसके बाबूजी के पास बैठता है और चाय और पान के साथ-साथ चूरा का भूजा और प्याज के पकौड़े का नाश्ता छककर करता है और बाउजी से बोलता है, "अब ई बड़ी हो गई है। बियाह कहिया कीजिएगा?" ऐसा बोलते हुए वह बोल तो बाउजी से रहा होता, लेकिन कनडेरिए आँख से वह उसी की ओर देख रहा होता। फ़ाइल में उलझे बाउजी सरल भाव से कह देते कि "अभी तो वह पढ़ाई कर रही है।"

सका मन करता कि वह मां से पूछे कि भूत क्या जमीन पर असली आदमी के रूप में रहते हैं? लेकिन वह डर जाती। उसे लगता, उसकी इस बात पर कहीं मां नाराज न हो जाए, बाबूजी उसे थप्पड़ न मार बैठे और पास पड़ोस के लोग कहीं उसे चिढ़ाने न लगे। दादी अब रही नहीं थीं, जिनकी कमी वह शिद्दत से महसूस करती।

ब वह डरने लगी। डर से सिकुड़ने लगी। इतना कि उम्र के साथ-साथ उसकी देह तो लंबी होने लगी, लेकिन उस पर उम्र चढ़ने के लक्षण कहीं से भी नजर नहीं आते। वह सूखे डंडे या लंबे बांस की तरह दिखती, जिस पर लगता, कपड़े का एक खोल चढ़ा दिया गया है।

सने दादी के मुंह से सुना था कि भूतों को भगाने के लिए हर शनिवार को काले कपड़े पहनकर सरसों के तेल और काले तिल से शनि की पूजा करनी चाहिए। इससे शनि महाराज भी प्रसन्न रहते हैं और भूत प्रेत का साया भी दूर रहता है। उसके घर में काले और सफेद कपड़े पहनने की सख्त मनाही थी। सफेद में केवल बाबूजी और भैया सफेद गंजी पहनते थे और मां सफेद ब्रा। पेटीकोट भी एक आध उनके पास सफेद थे और रंगीन पेटीकोट पर ख़ुद हाथ से बुनी क्रोशिए से बनी हुई सफेद लेस। इसके अलावा उस घर में कोई भी सफेद चीज नहीं पहनी जाती। हां बाबूजी की धोती अलबत्ता सफेद होती। काले कपड़े तो शनि के आगमन की तरह अशुभ और गुनहगार सरीखे थे।

सने बड़ी जिद करके एक काले रंग की सलवार कमीज सिलवाई, जिसे वह सबसे छुपकर अहले सुबह शनिवार के दिन पहनती और शनि महाराज के नाम पर बगल में खड़े पीपल के पेड़ के पास काला तिल और सरसों का तेल चढ़ाकर झट से आ जाती और अपने सामान्य कपड़े पहन लेती। लेकिन इन सबके बाद भी भूतों से उसका पीछा नहीं छूटा। वह जहां जाती, भूत उसके पीछे लगे रहते।

ह अपनी सहेलियों से पूछती कि भूत क्या सचमुच में आम आदमी, लड़कों की तरह दिखते हैं? सहेलियां उसकी बेवकूफी पर हंसते हंसते लोटपोट हो जाती। वे सब कहती कि भूत जिंदा नहीं, केवल मरा हुआ होता है । मरे हुए लोग ही भूत बन जाते हैं। वह उन मरे हुए लोगों के भूतों को देखने की इच्छा प्रकट करती। सहेलियां फिर से हंस—हंस कर लोटपोट हो जाती। उसकी समझ में नहीं आता कि इसमें ऐसे लोटपोट होकर हंसने की क्या बात है।

क दिन एक सहेली ने उससे अपने रहस्य का खुलासा किया कि उसने कल भूत देखा। सहेली ने बताया कि वह हॉस्टल में रहती है और हॉस्टल में एक रात जब वह फारिग होने के लिए बाहर निकली तो उसने देखा कि सामने एक कोई सफेद सी आकृति खड़ी है। डर के मारे पहले तो उसके पैर वहीं के वहीं जम गए। फिर उसने हिम्मत करके आवाज़ लगाई, "कौन है?" उसके बोलने पर वह आकृति गायब हो गई। सहेली डर के मारे बगैर फारिग हुए ही अपने कमरे में लौट आई और चादर के नीचे खुद को छुपा लिया। वह लगातार सोने की कोशिश करने लगी। नींद आई कि नहीं आई, उसे भी नहीं पता चला।

सके मन में अब भूत को देखने की इच्छा बलवती होने लगी। ऐसा भूत जो परछाई सा आता-जाता और हिलता-डोलता है, लेकिन बोलने या टोकने पर गायब हो जाता है। उसकी सहेली दूसरी बार फिर हॉस्टल से आई और उसने फिर से बताया कि उसने इस बार भी भूत को देखा। उसके हॉस्टल के कॉमन बाथरूम उसके कमरे से काफी दूर हैं, इसलिए वह वहां न जाकर छत पर चली जाती है फारिग होने के लिए। इस बार भी जब वह छत पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने लगी और सीढ़ियां चढ़कर छत पर पहुंची तो उसे छत की मुंडेर पर सफेद कपड़े में बैठी हुई एक पुरुष आकृति दिखी।

सकी पीठ सहेली की तरफ थी और पैर छत की मुंडेर की दूसरी तरफ लटके हुए थे। सहेली टॉर्च लेकर गई थी। सचमुच में कोई आकृति है या उसके मन का वहम, इसकी पुष्टि के लिए उसने टॉर्च की रोशनी उस आकृति पर फेंकी। सहेली ने बताया कि टॉर्च की रोशनी जिस तरफ जाती, आकृति उसके दूसरी ओर खिसक जाती और इस तरीके से उसके टॉर्च के उल्टा दाएं-बाएं होने लगती। सहेली फिर डर गई और बगैर फारिग हुए अपने कमरे में आकर चादर में घुसकर पैर समेटकर सो गई।

स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई करते हुए आगे की पढ़ाई के लिए इस बार उसे हॉस्टल जाना पड़ा। हालांकि घरवाले तैयार नहीं थे। काफी जद्दोजहद के बाद उसे दूसरे शहर में पढ़ने के लिए भेज दिया गया। वहां के हॉस्टल में भी उसे जगह मिल गई। हर हॉस्टल के आम नियम की तरह एक लोकल गार्जियन होना चाहिए। उसके लिए भी एक लोकल गार्जियन तलाश दिया गया। वह लोकल गार्जियन उसके अपने शहर में पढ़ाने वाली टीचर थी- खूबसूरत, उदार और मिलनसार।

टीचर के काम करने से अब उनका घर डबल इनकम ग्रुपवाला हो गया था। वे अब किराए के मकान से निकलकर अपने नए बनाए मकान में आ गई थी। शहर पुराना था, इसलिए पुराने शहर में बनने वाले मकानों के ढर्रे का ही यह मकान भी था, जिसमें अटैच्ड बाथरूम जैसी कोई अवधारणा नहीं थी। वह अपनी लोकल गार्डियन के यहां दिन में कभी-कभी चली जाती, जहां उसे परवल का भरवा और कटहल की खूब तेल-मसाले वाली सब्जी खाने को मिलती। हॉस्टल के खाने से ऊबा हुआ मन ऐसे समृद्ध खाने से तृप्त हो जाता और वहां जल्दी-जल्दी जाने को करता। शिक्षिका बहुत उदार थी और उसे बहुत प्यार करती थी। शायद इसका कारण यह भी रहा हो कि उनकी नौकरी लगवाने में उसकी अपनी शिक्षिका मां की थोड़ी बहुत भूमिका थी।

क दिन शिक्षिका ने उससे कहा कि आद्रा नक्षत्र चढ़ा हुआ है। वह शाम में वह दाल भरी पूरी, खीर और आलू परवल का दम बनाएगी और साथ में मालदा आम, इसलिए वह शाम में ही आ जाए। उसने कहा कि हॉस्टल लड़कियों के लिए शाम 7:00 बजे के बाद बंद हो जाता है। शिक्षिका ने कहा, कोई बात नहीं। वह रात में उसके घर ठहर जाए और दूसरे दिन सुबह खा पीकर दोपहर या शाम तक हॉस्टल लौट जाए। शिक्षिका की सुंदर शक्ल और बढ़िया खाना उसे अच्छा लगता था और इस लालच में वह उस दिन शनिवार की शाम आद्रा नक्षत्र मनाने और दाल पूरी, आलू परवल का दम, खीर और मालदा आम का भोग लगाने चली गई।

शिक्षिका के साथ उसने उस दिन खूब हंसी मजाक किया। उसके दो छोटे बच्चे भी थे, जो उसे दीदी कहते थे। उनके साथ उसने लूडो खेला, गप्पें मारीं। रात हुई और शिक्षिका ने उसे उसका कमरा दिखा दिया। उसके बाद वह बच्चों को लेकर अपने कमरे में सोने चली गई।

ई जगह होने के कारण या पेट से ज्यादा खीर-पूरी खा लेने के कारण उसे काफी देर तक नींद नहीं आई। उसे आद्रा नक्षत्र में माँ के हाथों की बनाई गई दाल भरी पूरी, खीर, सब्जी आदि के स्वाद याद आने लगे। अपने घर की तंगी उसे पता थी। वह देखती कि उसके यहां दाल भरी पूरी में दाल कम मात्रा में भरी जाती और तवे पर नाममात्र के तेल में सेंकी जाती। खीर में भी आधा पानी आधा दूध रहता। आलू-परवल के दम में तेल काफी कम तो रहता ही, आलू की मात्रा ज्यादा रहती, इसलिए शिक्षिका के घर के तेल में तैरते रहने वाली सब्जी और तेल में छानी गई पूरियों और पूरे दूध में बनाई गई खीर से उसका मन तृप्त हो गया था। धीरे-धीरे उसकी आंखें मुंदने लगी और वह आद्रा नक्षत्र की दाल भरी पूरी के स्वाद में खो गई।

द्रा नक्षत्र से निकलकर वह धीरे-धीरे किसी सपने में डूबती गई। उस सपने में उसे दूध की नदी दिखी, तेल का तालाब दिखा, पूरियों का पहाड़ दिखा और आम का मचान दिखा। वह उन सबके बीच तैरती, कूदती मन को हिलरानेवाला कोई गीत गाती जा रही थी। वह आम के बगीचे में बने मचान पर चढ़कर ‘आज मैं ऊपर, आसमाँ नीचे' जैसा कोई गीत गाने लगी। वहां से उसने ‘नदियों की ताल पर झूम रही ज़िंदगी, मांझी रे…’ गाते हुए दूध की नदी में छलांग लगाई फिर वह पूरी के पहाड़ से पूरियां निकालकर खाने लगी।

तेल के तालाब से चंद बूंदे तेल लेकर सिर में मालिश करने लगी। उसने कहीं पढ़ा था कि रात में सोते समय ढीले कपड़े पहनने चाहिए। उस दिन के बाद से सोते समय वह केवल नाइटी पहनती। सर की मालिश करते हुए कुछ बूंदे उसने और निकाली और नाइटी तनिक ऊपर उठाकर अपने दोनों पैरों में लगाकर पैरों की मालिश करने लगी कि अचानक वह सकते में आ गई।

पूरी के पहाड़, तेल का तालाब, दूध की नदी और आम का अचार- सब गायब हो गए। उसके सामने कोई एक भूत खड़ा था, जो उसके पैरों की मालिश कर रहे उसके दोनों हाथों को हटाकर दोनों पैरों के बीच के हिस्से को अपनी मुट्ठी में भींचे जा रहा था। वह हड़बड़ाकर जगी। कमरे में अंधेरा था, लेकिन इस हड़बड़ाहट में उसने मसहरी में घुसे हुए और अपनी नाइटी के बीच में फंसे हुए हाथ को देख लिया था। उसके जगते ही वह हाथ तेजी से मसहरी के बाहर निकला और गायब हो गया। वह थरथरा उठी। उसकी नींद खुल गई। वह डर से कांपने लगी। अपनी धड़कन पर थोड़ा सा काबू पाकर उसने तकिए के पास रखे टॉर्च को टटोला। शहर छोटा था और लाइट गुल हुआ करती थी, इसलिए सभी अपने सिरहाने एक टॉर्च लेकर सोते थे।

हिम्मत करके वह उठी और उस टॉर्च से उसने मसहरी के भीतर देखा। कहीं कुछ नहीं था- मच्छर और खटमल तक नहीं। वह मसहरी से बाहर आई। कमरे में टॉर्च जलाकर देखा। सारा दिन घर में दौड़ लगाने वाले चूहे भी अपने बिल में कहीं सोए पड़े थे। उसने थोड़ी और हिम्मत की और बाथरूम में भी टॉर्च जलाकर देखा। वहां उसे एकाध छिपकली और तेलाचात्ती नजर आए। चारों और भांय-भांय सन्नाटा शोर मचा रहा था। टीचर का कमरा बंद था और अन्दर से कोई भी आवाज नहीं आ रही थी।

से समझ में नहीं आया कि यह सपना था या हकीकत, लेकिन उसे इस बात का एहसास हो गया कि यह हकीकत ही होगा, क्योंकि उसके जांघों के बीच बहुत तेज दर्द और नोचने की तकलीफ भरी हुई थी। उसे बाथरूम जाने की जरूरत थी, लेकिन हिम्मत नहीं कर सकी और वापस मसहरी में घुस गई। दादी ने उसे सिखाया था कि संकट पड़े तो हनुमान चालीसा पढ़ना। वह मन-ही-मन हनुमान चालीसा पढ़ने लगी। इस बीच कब सुबह हो गयी, इसका पता उसे कौवे की कांव-कांव से चला।

ह उठी और हॉस्टल जाने के लिए तैयार होने लगी। शिक्षिका के कमरे का दरवाजा खुला। वह अपने नए गाउन का बटन बंद करती हुई बाहर निकली और अलसाए स्वर में बोली- 'आज तो इतवार है ना! इतनी जल्दी क्या है जाने की! अभी तो नाश्ता-पानी और दिन का खाना भी बाकी है। रहो। पुरी-जिलेबी मंगवाती हूँ नाश्ते के लिए। पुलाव बनाउंगी दिन में। शाम में प्याज के पकौड़े बनाउंगी। खा-पीकर फिर जाना। ये बड़ी रात लौटे। इनको खिलाते-पिलाते देर हो गई। अभी ये सोए हुए हैं। तुम्हारा इनसे परिचय नहीं हुआ है। जान पहचान करवा दूंगी तो जब कभी मैं नहीं भी रहूंगी तो तुम यहां आकर रह सकती हो, अंकल से बोल-बतिया सकती हो।'

सकी आंखों का भ्रम टूट गया था। वह समझ गई थी कि रात उसने सपना तो देखा था, लेकिन साथ में कुछ कुछ हक़ीकत भी देखा था। सुबह के नाश्ते, दिन के खाने और शाम के चाय-पकौड़े की योजना पर उसका ध्यान गया। एक झटके में उसने उनके यहाँ के तर मालवाले नाश्ते, खाने का लोभ त्यागा। शिक्षिका से उसने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ एक शब्द बोली- ‘भूत’ और अपना बैग उठाकर निकल गई।

सने तय किया कि अब वह अपनी सहेली को बताएगी कि उसने भी भूत देख लिया है-पकिया भूत!

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