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बलात्कार एक पितृसत्तात्मक बीमारी है और एनकाउंटर उसका पितृसत्तात्मक हल

Nirmal kant
8 Dec 2019 2:51 PM GMT
बलात्कार एक पितृसत्तात्मक बीमारी है और एनकाउंटर उसका पितृसत्तात्मक हल
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पुलिस एनकाउंटर इसलिए बुरा नहीं है कि हैदराबाद जैसे बर्बर आरोपी इसके लायक नहीं हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि ‘कानून का शासन’ एक हजार गुना बेहतर अवधारणा है...

हैदराबाद एनकाउंटर पर पूर्व आईपीएस वीएन राय की टिप्पणी

रेप पर उमड़ा जन-आक्रोश एनकाउंटर के संतोष से ठंडा पड़ गया लगता है। एक झटके में पुलिस ने स्वयं को निष्क्रियता के आरोप से बरी कर लिया है और व्यापक समाज ने स्वयं को पितृसत्ता के दंश से। और तो और इस गहमागहमी में, रसूखदार बलात्कारी को राजनीतिक प्रश्रय जैसा ज्वलंत मुद्दा भी पृष्ठभूमि में खिसक गया और त्वरित बदले के जोश में भुला दिया गया कि न्याय में बेवजह होने वाली देरी का हल निकालना प्राथमिक जरूरत होनी चाहिए।

28 नवम्बर, 2019 की सुबह से, हैदराबाद के पाशविक अग्नि बलात्कार से स्तब्ध भारतीय समाज एक स्वर में मुखर हो चला था, 6 दिसंबर की सुबह आग की तरह फैली चारों आरोपियों के पुलिस एनकाउंटर की खबर ने उसे दो फाड़ कर दिया। यहां तक कि एनकाउंटर की बनावटी कहानी और उसकी दूरगामी सार्थकता पर सवाल उठाने वालों को तिरस्कार से बलात्कारियों का समर्थक तक कहा जाने लगा है।

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ब भी कटु सत्य नहीं बदलेगा। एनकाउंटर से आशा लगाये समुदाय को अंततः निराशा ही हाथ मिलेगी क्योंकि बलात्कार एक पितृसत्तात्मक बीमारी है और एनकाउंटर उसका एक पितृसत्तात्मक हल। लिहाजा, एनकाउंटर की संस्कृति पितृसत्ता की संस्कृति को ही मजबूत करेगी, जिससे स्वाभाविक रूप से रेप संस्कृति ही मजबूत होगी।

साथ ही यह समझना भी होगा कि हैदराबाद एनकाउंटर ने व्यापक भारतीय समाज को लैंगिक आत्मग्लानि के दलदल से क्षणिक रूप से सही बाहर निकलने का एहसास कराया है। उन लड़कियों और स्त्रियों की कल्पना कीजिये जिन्हें अपने रोजमर्रा के जीवन में लगातार यौन उत्पीड़न और घरेलू हिंसा को झेलना पड़ता है। गाहे-बगाहे होने वाला एनकाउंटर उन्हें पलट वार का संतोष देगा ही। इसी तरह उन लड़कों और मर्दों की भी कल्पना कीजिये जिनकी मर्दानगी के लिए ‘दूसरों’ के द्वारा किया गया बलात्कार एक विकट चुनौती की तरह होता है और, लिहाजा, एनकाउंटर बन जाता है इस तनाव से एक मर्दाना रिलीज़।

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पुलिस में ‘एनकाउंटर मैन’ या ‘सिंहम’ बनने की प्रवृत्ति क्यों? दरअसल पुलिस संस्कृति में एक मर्दानी शिकारी संस्कृति की तर्ज पर बहादुरी प्रदर्शन के लिए लाश का होना जरूरी है। मर्दानी पुलिस में मारने वाले को ही वीरता पुरस्कार देने का चलन है न कि बचाने वाले को। मुझे भी कुछ अवसरों पर उन कमेटियों में बैठने का अवसर मिला है जिनमें इन वीरता प्रस्तावों पर विचार होता है। कहना न होगा कि ऐसे कितने ही शर्मनाक प्रस्ताव सामने आये जहाँ सम्बंधित पुलिस अधिकारी की वीरता को लाशों से मापा गया।

वीरता प्रदर्शन ही हमेशा एकमात्र कारक नहीं है जो पुलिस अधिकारी के सर पर सवार होकर उससे एनकाउंटर कराएगा। दमघोंटू न्यायिक देरी के माहौल में पुलिस की ऐसी मर्दानी रिलीज़ के पीछे, समकक्षों का दबाव, पेशेवर कार्य संस्कृति, राजनीतिक वफादारी और सामाजिक छुटकारे जैसी प्रवृत्तियां भी काम करती मिलेंगी।

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हैदराबाद एनकाउंटर के पक्ष में नागरिकों के एक बड़े वर्ग का खड़ा होना दर्शाता है कि त्वरित न्याय का ग्लैमर समाज को हमेशा उद्वेलित करेगा, बेशक भारत के प्रधान न्यायाधीश बोबडे ने ‘त्वरित’ को ‘न्याय’ से अलग करने की बेबाक वकालत की हो। हमें भुलाना नहीं चाहिए कि ‘लिंच-जस्टिस’ की अलग-अलग काल खंड में दुनिया भर में मान्यता रही है। लेकिन हाल के वर्षों के रेयान स्कूल या एक्सल गैंग जैसे केस के निर्दोष आरोपी हमें याद दिलाते रहेंगे कि जया बच्चन और मायावती जैसों के सुझाए लिंच-न्याय की दिशा में बढ़ने पर न्याय के रास्ते पर गिरने को गड्ढे ही गड्ढे हैं।

याद रखिए, पुलिस एनकाउंटर इसलिए बुरा नहीं है कि हैदराबाद जैसे बर्बर आरोपी इसके लायक नहीं हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि ‘कानून का शासन’ एक हजार गुना बेहतर अवधारणा है। अगर आप अब भी पुलिस एनकाउंटर के समर्थक हैं तो मेरा अनुरोध है कि थोड़ा थम कर इस सच्चाई पर गौर कीजिये- अमेरिका में 1992 में बनी ‘इन्नोसेंस प्रोजेक्ट’ नामक संस्था ने बलात्कार-हत्या आरोपों में सजा भुगत रहे 189 कैदियों को डीएनए की विकसित तकनीक के आधार पर 17 नवम्बर 2019 तक अदालतों में निर्दोष साबित किया और बरी कराया है। ऐसे भी कई मामले सामने आये जहां इस तकनीक के सहारे अब निर्दोष पाए गए व्यक्ति को पहले ही मौत की सजा दी जा चुकी है।

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