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संस्कृति

ओ प्रगतिपंथी! ज़रा अपने कदम इस ओर मोड़ो

Janjwar Team
18 July 2017 3:57 PM GMT
ओ प्रगतिपंथी! ज़रा अपने कदम इस ओर मोड़ो
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नहीं रहे कवि—गद्यकार अजित कुमार

हिंदी के महत्वपूर्ण कवि,आलोचक,अनुवादक अजित कुमार का आज सुबह दिल्ली के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। पिछली आधी शती से रचनाकर्म कर रहे अजित जी का लेखन हिंदी की विरासत है। हरिवंश राय बच्चन के निकट सहयोगी रहे अजित सिंह तकरीबन 84 वर्ष के थे। वर्षों पहले देहदान करने की घोषणा करने वाले अजित कुमार का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा, बल्कि उनका पार्थिव शरीर कल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया जाएगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज से हिन्दी के प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त होने के बाद स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में जन्मे कुमार पुराने जमाने की हिन्दी लेखिका सुमित्रा कुमारी सिन्हा के पुत्र थे और हरिवंश राय बच्चन रचनावली के सम्पादक भी थे। वह अपनी कविताओं के अलावा आलोचना और संस्मरण लेखन के लिए भी जाने जाते थे। साठ के दशक में अपने पहले कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ से चर्चा में आये कुमार की चर्चित कृतियों में ‘दूर वन में’ और ‘सफरी झोले में’ शामिल हैं।

अजित कुमार ने लिखा था,'केसरिया बाना पहन रण में जूझते हुए प्राण गँवा देना हमेशा बहादुरी ही नहीं होती; आत्मघात भी हो सकता है। यह समझ हमारी भाषा को देर से आई, लेकिन दुरुस्त आई है- सब साथ-साथ बढ़ें, एक-दूसरे की गर्दन काट शहीद न बनें, यह नई ताक़त आज हिदी को कायर या कातर होने से बचा रही है और विश्व की प्रमुख भाषाओं के बीच अपनी उचित जगह पाने के वास्ते तैयार करती है।'

हिंदी के संदर्भ में कभी अजित कुमार ने जो कहा था वह आज के राजनीतिक संदर्भों में भी प्रासंगिक है। सबको साथ लेकर चलने का यह भाव साठ के दशक में आए उनके पहले कविता संग्रह 'अकेले कंठ की पुकार' की इसी शीर्षक की कविता में भी व्‍यक्‍त हुआ है। आज जब बड़े पैमाने पर कविताएं विचार और विवरणों के सहारे माथापच्‍ची करते हुए लिखी जा रही हैं, कवि बनने की सोद्देश्यता के साथ तब अजित कुमार की सहज जीवन जीते हुए उससे उपजी कविताओं से गुजरना मरूथल में बारिश का सा आनंद देता है। सरलता, सजलता और नवगीतात्‍मकता उनकी कविताओं की पहचान है। आज अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे। श्रद्धांजलि देते हुए आइए पढ़ते हैं अजित कुमार की कुछ कविताएं- कुमार मुकुल

अकेले कंठ की पुकार

गीत जो मैंने रचे हैं
वे सुनाने को बचे हैं।

क्योंकि-
नूतन ज़िन्दगी लाने,
नई दुनिया बसाने के लिए
मेरा अकेला कंठ–स्वर काफ़ी नहीं है।
इस तरह का भाव मुझ को रोकता है।
शून्य, निर्जन पथ, अकेलापन
सभी कुछ अजनबी बन
मुखरता मेरी न सुनता
टोकता है।

इसलिए मुझ को न पथ के बीच छोड़ो
बेरुखी से मुँह न मोड़ो,
हो न जाऊँ बेसहारे,
इसलिए तुम भूलकर वैषम्य सारे –
ताल–सुर–लय का नया सम्बन्ध जोड़ो।
ओ प्रगतिपंथी! ज़रा अपने कदम इस ओर मोड़ो।

राग अलापो, बजाओ साज़,
कुछ ऊँची करो आवाज़ –
मेरा साथ दो।
यह दोस्ती का हाथ लो।
फिर मैं तुम्हारे गीत गाऊँ,
और तुम मेरे
कि जिससे रात जल्दी कट सके,
यह रास्ता कुछ घट सके

हम जानते हैं
विहग–दल तक साथ देंगे
भोर होते ही, उजेरे... मुँहअंधेरे।

दो निजी कविताएं

1.
ये जो चेहरे पर खिंची लकीरें हैं…
ये हँसने से, गाने से,
गाते रहने से
अंकित होने वाली तस्वीरें हैं।

ये जो अपनी वय से ज़्यादा
दिखनेवाले, माथे पर के
टेढ़े—मेढ़े बल हैं—
ये, वे सारे पल हैं,
जो हमने बाँट दिए,
या आँखों-आँखों में ही
रखकर काट दिए।
सबकी निगाह में ‘बोझ’—
वही तो मेरे संबल हैं।
जो माथे पर टेढ़े—मेढ़े, आड़े-तिरछे
बल हैं।

2.
पहले ही जैसी शांत-सहज
जिज्ञासा आँखों में।
‘जो व्यक्त नहीं की गई’—
खुशी कुछ ऐसी होंठों पर।
सबकुछ तो बदल गया

पर
मुख का भाव नहीं बदला।

संघर्ष, घुटन,
हारी बाज़ी, लाचारी।
पर
जीवन जीने का चाव नहीं बदला।

सब कुछ तो बदल गया
पर मुख का भाव…।

कविता जी

कल मैंने कविता को लिखा नहीं
कल मैंने कविता को जिया

बहुत दिनों बाद
लौटकर घर आए बच्चों के साथ
बैट-बाल खेला,
पहेलियाँ बूझीं
कहानियाँ सुनीं-सुनाई
चाट खाई

वह सब तो ठीक था
और
अपनी जगह ठीक-ठाक रहा
लेकिन यह ख़याल
कि इस तरह
मैंने कविता को जिया,
अपनी कविता जी को
कुछ ख़ास पसंद नहीं आया।

मुँह फुलाकर वे जा बैठीं
पुरानी पत्रिकाओं के ग़ट्ठर में
जिन्हें मैंने दो-छत्ती में धर दिया था
ताकि बच्चों की उछल-कूद के लिए
घर में तनिक जगह तो निकले।

बीते अनुभव से जानता हूँ-
छुट्टियाँ ख़त्म होंगी
बच्चे वापस चले जाएँगे
घोंसले में फैले तिनके समेटने के लिए
हमें छोड़कर

कैरम की गोटें
स्क्रैबिल के अक्षर
देने-पावने के ब्यौरे
क्रेन की बैटरी
जिन्हें हम सहेजेंगे ज़रूर

पर दो-छत्ती में रखी
पुरानी पत्रिकाएँ तो शायद
हमेशा के लिए
वहीं की वहीं रह जाएँगी

रूठी हुई कविता जी
मनुहार के बाद
या
उसके बावजूद
क्या पता?
आएँ कि न आएँ!

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