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संस्कृति

कि यह हँसी मेरी क्यों नहीं?

Janjwar Team
25 Aug 2017 4:54 PM GMT
कि यह हँसी मेरी क्यों नहीं?
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सप्ताह की कविता में आज पढ़िए हिंदी के वरिष्ठ कवि विष्‍णु नागर की कविताएं

अपने निबंध ‘काव्य की रचना-प्रक्रिया: एक’ में मुक्तिबोध लिखते हैं, ‘जगत-जीवन के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना में समाई हुई मार्मिक आलोचना-दृष्टि के बिना कवि-कर्म अधूरा है।’ विष्णु नागर की कविताओं से गुजरते हुए उनके कवि की मार्मिक आलोचना-दृष्टि की झलक बार-बार मिलती है। नागर की कविताओं में व्यंग्य की उनकी धार बारम्बार विचलित करती सामने आती है। उनके व्यंग्य की सबसे बड़ी खूबी उसकी सादगी है, वह मुँहफट व्यंग्य नहीं है, बल्कि वे बड़े सलीके से समाज की दुष्टतापूर्ण, अवसरवादी शक्तियों के प्रतिनिधियों के कान पकड़ उसका छिपा चेहरा सामने लाते हैं। इस तरह की ‘नवजीवन देने वाली सादगी’ की ताकत से नागर पहली बार हिंदी के पाठकों का परिचय कराते हैं – बुश बेचारा तो युद्ध होने पर भी नहीं चाहता था / कि इराक का एक नागरिक भी मरे /लेकिन पहले प्रिसीज़न बमों ने घपला किया /और वे नागरिक इलाकों पर गिर पड़े...

यूँ यह सादगी नागर के यहाँ शुरू से है। हम उनकी ‘बाजा’ जैसी कविता याद कर सकते हैं, जिसमें बाजा बजाने वालों की पीड़ा को स्वर देते वे कहते हैं कि मैं बाजा हूँ। मैं क्या करूं कि मुझे बजाने वालों के दिल रोते हैं। नई चीज, जो इधर की उनकी कविताओं को आगे ले जाती है, वह है व्यंग्य की ताकत। यह उनकी क्षमता ही है कि व्यंग्य की इस ताकत के बावजूद वे पुरानी सादगी को बनाए रखते हैं। हिंदी कविता में यह बात नागार्जुन के यहाँ मिलती है और ज्यादा सादगी के साथ केदारनाथ अग्रवाल के यहाँ।

रघुवीर सहाय को लगातार याद करने के बावजूद नागर अपनी कविता में ऊँचाई की जगह विस्तार की समृद्ध परंपरा से खुद को जोड़ते हैं। वहाँ फक्कड़पन और बेलौसपन है। वह चोट करती है, तो गुदगुदाती भी है और साथ लेकर चलती है। ऐसे समय में जब युवा कवि स्त्रियों और बच्चों पर प्रबंध काव्य लिखने में अपनी सारी कुव्वत लगा रहे हैं, नागर की कविता फिर से जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने की माँग को बल प्रदान करती है। अपनी तरह से ज्ञानेंद्रपति और एक हद तक अरुण कमल भी यह काम कर रहे हैं। आइए पढ़ते हैं विष्‍णु नागर की कविताएं। —कुमार मुकुल

प्‍यार में रोना

प्यार ने कई बार रुलाया मुझे
मुश्किलों से ज्यादा प्यार ने
मैं यहाँ प्यार की मुश्किलों की बात नहीं कर रहा
न मुश्किलों में प्यार की।

बाजा

मुझे बाजा बनाया गया
और मैं बजने से पहले ही रो दिया
क्या करँ कि मुझे बनाने वालों के दिल रोते हैं

मुझे बाजा बनाया गया
और मैं बजने से पहले ही हँस दिया
हँसने से काम नहीं चलेगा
और हँसना बाजे का काम भी नहीं
लेकिन यह हँसी उनकी है
जिनका मैं हूँ

मैं हैरान हूँ कि बाजा होते हुए भी मैं कैसे हँस दिया
मुझे हँसना नहीं चाहिए था
दरअसल यह हँसी मेरी थी भी नहीं
मैं तो सिर्फ़ इसलिए हँसा
कि यह हँसी मेरी क्यों नहीं?

मैं हैरान हुआ कि बाजा होते हुए भी
मैं अपने आप कैसे बजने लगा
और पृथ्वी ने कहा, तुम्हारे तो पाँव हैं
और हवा ने कहा, तुम्हारे तो हाथ हैं
और सिर तो मेरा ख़ुशी से झूम ही रहा था

मैं परेशान हूँ
बाजे का जीवन पाकर
यह जो कुछ मैं कर रहा हूँ
यह ठीक-ठीक है भी या नहीं?
कल मैं बोलने लगूँ
तो सब मुझे प्रेत समझकर
भागने तो नहीं लगेंगे?
मुझे गोली मार देना
मगर भागना नहीं, मुझसे मेरे लोगो।

क्या कव्वा भी चहचहा रहा था

उसने कहा -
आज क्या सुबह थी
क्या हवा थी
कितनी मस्ती से पक्षी चहचहा रहे थे
मैंने कहा रुको
क्या तुम्हारा मतलब ये है
कि कव्वे भी चहचहा रहे थे?

व्‍यंग्‍य

मैंने उन पर व्यंग्य लिखा
वही उनका सबसे अच्छा विज्ञापन निकला
वही मेरी सबसे कमाऊ रचना निकली
वही हिन्दी साहित्य में समादृत भी हुई।

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