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'हम एसिड पीड़िताओं को लोग अपशकुन की तरह देखते हैं'

Prema Negi
3 Oct 2019 6:22 AM GMT
हम एसिड पीड़िताओं को लोग अपशकुन की तरह देखते हैं
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तेजाब हमले की ​पीड़ितायें कहती हैं, आखिर एक औरत की जिंदगी की कीमत सरकार 1 लाख कैसे तय कर सकती है, जबकि एसिड अटैक के मामलों मे मुआवजा राशि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (एनएलएसए) ने 7 लाख तय की हुई है...

नैनीताल से विमला की रिपोर्ट

साहिना मलिक दिल्ली की रहने वाली हैं। HRLN से जुड़ी हैं, जो खुद एक एसिड सर्वाइवर हैं। साहिना सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। फिलहाल 22 राज्यों में काम कर रही हैं। साहिना कहती हैं, 'एसिड अटैक के मेरी जानकारी में कुल 300 केस हैं। दिल्ली में ही 60-70 केस हैं, जिन्हें मैं देख रही हूँ।'

सिड पीड़ित साहिना कहती हैं, 'तेजाब हमले की शिकार बनीं गुलनाज खान का मामला जो हाईकोर्ट नैनीताल में चल रहा है, इस केस में हमारे संगठन ने उत्तराखंड सरकार को चैलेंज किया है। इसमें उत्तराखण्ड सरकार ने 1 लाख 60 हजार का मुआवजा गुलनाज को देने को कहा था, जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश था कि एसिड पीड़िता को 3 लाख मिले। वहीं गुलनाज और हमारी तरफ से 25 लाख के मुआवजे की मांग की गयी है। आखिर एक औरत की जिंदगी की कीमत सरकार 1 लाख कैसे तय कर सकती है, जबकि एसिड अटैक के मामलों मे मुआवजा राशि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (एनएलएसए) ने 7 लाख तय की हुई है।

गौरतलब है कि एसिड अटैक में गुलनाज खान का एक कान पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था। अभी उन्हें कोर्ट ने मात्र 3 लाख का मुआवजा दिया है। खुद एसिड पीड़ित साहिना कहती हैं कि हम अपने संगठन HRLN के माध्यम से एसिड पीड़ित महिलाओं से संपर्क करते हैं। कई बार फ्री में इलाज भी करवाते हैं।

तेजाब हमले की पीड़ित रह चुकीं साहिना कहती हैं, एसिड अटैक होने के बाद हमें समाज का बहुत बडा सपोर्ट चाहिए होता है, लेकिन बजाय सपोर्ट के हमें हर जगह नकारा जाता है। एसिड पीड़ित लडकी जब घर से बाहर निकलती है तो लोग उसे अजीब नजरों से देखना शुरू कर देते हैं। हम भी इसी समाज का हिस्सा हैं। हम भी सामान्य लड़कियों की तरह थे, मगर इस विकृत समाज ने हमें विद्रूप बनाकर रख दिया।'

क अन्य तेजाब पीड़ित युवती कहती है, 'एसिड अटैक के मामलों के निपटारे में हमसे अच्छा देश तो पाकिस्तान है, जहां ऐसे मामलों को न सिर्फ बेहद गंभीरता से लिया जाता है बल्कि इनकी सुनवाई आतंकवादी निरोधी अदालतों में होती है। वहां एसिड अटैक के दोषियों को 10 साल की सजा और 10 लाख का जुर्माना दे दिया जाता है, जिससे पीड़ित महिला को मोरल सपोर्ट भी मिलता होगा।

हीं एसिड पीड़ित जहाँआरा कहती हैं, 'एसिड अटैक ने मेरी पूरी जिन्दगी बदलकर रख दी। ये मेरे लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। समाज हम लोगों के प्रति बहुत नकारात्मक हो जाता है। मुझ पर एसिड अटैक की उस कंपा देने वाली घटना को 15 साल बीत चुके हैं, मगर आज तक सरकार की तरफ से कोई मुआवजा नहीं मिल पाया है। अब तक मेरी 3 सर्जरी हो चुकी हैं। एसिड अटैक में मेरी एक आंख पूरी तरह खराब हो चुकी है। अब एक आर्टिफिशियल आंख के साथ मैं अपनी 70 वर्षीय बुजुर्ग मां के साथ हल्द्वानी में रहती हूं।

14 वर्षीय मासूम फैजान भी तेजाब का हमला झेल चुका है। 14 साल का ये मासूम अपने घर के बड़ों के बीच हुई लड़ाई का शिकार बना। फैजान कहता है, 'घर में चाचा और पापा के बीच झगड़ा हुआ। मेरे चाचा ने मेरी मां, मेरे पापा और मुझ पर तेजाब फेंक दिया। इस हमले में मेरे पापा की दोनों आंखों की रोशनी चली गयी। मां भी इसकी शिकार हुई। हमारा पूरा परिवार तबाह हो गया। अब मैं स्कूल जाना चाहता हूँ, मगर वहां जाता हूं तो साथ के बच्चे भूत कहकर चिढाते हैं, इसलिए नहीं जाता। अगर मुझे ऐसा स्कूल मिले जहां मुझे चिढ़ाया न जाये, मेरे साथ दुर्व्यवहार न हो, तो मैं भी पढ़—लिखकर बड़ा आदमी बनने की ख्वाहिश रखता हूं।'

सिड अटैक पीड़ित अन्य महिलाओं का कहना है कि बिना किसी गलती के न सिर्फ हम अपनी खूबसूरती खो देते हैं, हमें बदसूरत बना दिया जाता है, बल्कि हमारी खुद की पहचान भी खो जाती है। अपनी पहचान छिनने का बहुत दुख होता है। इस अवसाद से बाहर निकलने और हमें आत्मनिर्भर बनाने में सरकार भी कोई खास मदद नहीं करती। अगर हमें मदद मिले तो हमारा खोया आत्मविश्वास लौट सकेगा और हम फिर से मुख्यधारा में इज्जत से जी पायेंगे।

पिछली 28 सितंबर को सामाजिक संगठन HRLN द्वारा एसिड पीड़ितों के लिए उत्तराखण्ड के नैनीताल स्थित नैनीताल क्लब में एक सेमिनार आयोजित किया गया था। इस सेमीनार में देश के विभिन्न हिस्सों से आई एसिड पीड़िताओं ने हिस्सेदारी की। कार्यक्रम में जाने माने बुद्विजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने भी हिस्सेदारी की। एसिड अटैक पीड़ित महिलाओं को लेकर चले सत्र में तमाम पीड़िताओं ने अपनी तकलीफें साझा कीं।

गौरतलब है कि एसिड अटैक की वजह से बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं की जान जा चुकी है। बहुत सारी महिलाएं बदतर हालात में अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं। एसिड अटैक पर न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार को भी कुछ ऐसे सख्त कदम उठाने चाहिए जिससे एसिड पीड़िताओं को सभी तरह की सुरक्षा और सुविधाएं मिल पायें और पीड़िताओं को मुफ्त इलाज के साथ साथ सरकारी नौकरी और सामजिक सुरक्षा की गारंटी भी मिले, ताकि वे सम्मान की जिंदगी जी सकें।

हालांकि एसिड अटैक रोकने के लिए हमारे देश में कई सख्त कानून बने हैं, मगर असल सवाल है उन्हें सही तौर पर लागू करने का। पहले एसिड अटैक के मामले में आईपीसी की धारा में अलग से किसी तरह का प्रावधान नहीं था, आईपीसी की धारा 326 (गंभीर रूप से जख्मी करना) के तहत ही मामला दर्ज किया जाता था और दोषी को 10 साल या उम्रकैद की सजा देने का प्रावधान था। मगर अब एसिड अटैक को लेकर कानून सख्त बन चुका है। आईपीसी की धारा 326 में बदलाव के बाद 326A और 326B बनाया गया है। आईपीसी की धारा 326A के तहत अगर किसी व्यक्ति ने जानबूझ कर तेजाब फेंका और उसे स्थाई या आंशिक रूप में नुकसान पहुंचाया तो इसे एक गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जायेगा। इतना ही नहीं यह अपराध गैर जमानती होगा। दोषी को कम से कम 10 साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा मिलेगी। इतना ही अपराधी पर जो जुर्माना राशि लगेगी, वह रकम पीड़िता को देने का प्रावधान है।

हीं आईपीसी की धारा 326B का संबंध एसिड अटैक की कोशिश किये जाने से है। इसके मुताबिक किसी ने अगर किसी दूसरे व्यक्ति पर तेजाब फेंकने की कोशिश भी की तो उसे एक संगीन और अक्षम्य अपराध माना जायेगा। यह अपराध गैर जमानती है और इसके लिए अपराधी को कम से कम पांच साल तक की सजा हो सकती है साथ ही पीड़ित को जुर्माने की राशि भी देनी पड़ेगी।

तने सख्त कानून होने के बावजूद देश में इनका खुलेआम मखौल उड़ाया जा रहा है। मीडिया में एसिड अटैक की खबरें आये दिन सुर्खियां बनती रहती हैं।

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