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कट्टर आरएसएस कार्यकर्ता से कम्युनिस्ट बनने तक की यात्रा का नाम है मास्साब

Janjwar Team
19 March 2018 3:18 PM GMT
कट्टर आरएसएस कार्यकर्ता से कम्युनिस्ट बनने तक की यात्रा का नाम है मास्साब
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पढ़िए उन्हें याद करता सामाजिक कार्यकर्ता हेम पंत का विश्लेषण कि कैसे वे बता रहे हैं समाज को और भी कई प्रताप मास्साब चाहिए

कल 18 मार्च 2018 को दिनेशपुर के प्रताप सिंह मास्साब अंततः जिंदगी की लड़ाई से हार ही गए। उनका पूरा जीवन मजदूर-किसानों और युवाओं के लिए संघर्ष करने में गुजरा। बरेली जिले के शाही कस्बे में किसान परिवार में जन्मे मास्साब ने सामाजिक कार्यों की शुरुआत शिशु मंदिर में आचार्य बनने के साथ ही शुरू कर दी थी।

अपने आसपास के समाज को बेहतर बनाने की ललक ने उनको कभी चैन से बैठने नहीं दिया। पिछले 2 साल में हड्डी के कैंसर के कारण उनका शरीर दुर्बल होता चला गया था, लेकिन अपने अंतिम दिन तक मानसिक रूप से वो बहुत मजबूत थे। उनकी बातें सुनकर लगता था कि मानसिक मजबूती से वो कैंसर को जरूर हरा देंगे। बीमारी उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और मानसिक बल को तो नहीं तोड़ पाई लेकिन शरीर ने साथ छोड़ ही दिया।

मास्साब के जीवन में जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वह ये थी कि मास्साब कभी किसी राजनीतिक विचारधारा के गुलाम बनकर नहीं रहे। मजदूर-किसानों की जिंदगी को बेहतर बनाना, जुल्म के ख़िलाफ़ आवाज उठाना उनके जीवन का लक्ष्य था और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्हें जो माध्यम ठीक लगा वो उसी पर चले। तराई में हर छोटे बड़े जनसंघर्षों के साथ पूरी सक्रियता से जुड़े। बीमारी से जूझते हुए भी वो जब तक आंदोलन में शामिल हो सकते थे उत्तराखण्ड के कोने कोने में पहुँचकर आंदोलनों को आगे बढ़ाया।

तराई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मजबूती देने वाले लोगों में उनका नाम आज भी याद किया जाता है। बाद में वैचारिक मदभेद पैदा होने के बाद वो कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े और समाज हित के काम में लगातार सक्रिय रहे। राजनीतिक दलों की आंख की किरकिरी तो वो पहले से ही थे, राज्य बनने के बाद उनको फर्जी मुकदमे लगाकर परिवार सहित बहुत प्रताड़ित भी किया गया।

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उनकी फर्जी गिरफ्तारी का मुद्दा उत्तराखण्ड विधानसभा में भी उठा था। उत्तराखण्ड राज्य प्राप्ति के दौर में तराई में वो उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन के अग्रणी नेता थे, जबकि उस समय तराई में उत्तर प्रदेश में बने रहने के लिए एक अलग आंदोलन चल रहा था। तराई के सभी जनसंघर्षों में शामिल होने के साथ साथ वो पहाड़ की जनता के साथ भी हर संघर्ष में खड़े रहे।

जिंदल कम्पनी के खिलाफ नानीसार (रानीखेत) के अवैध स्कूल के लिए आंदोलन में उन पर मुकदमा चला। उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अनुशासन समिति के अध्यक्ष रहे और 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी जनकवि बल्ली सिंह चीमा के प्रचार के दौरान फर्जी चुनाव आचार संहिता के मामले में भी मुकदमा झेला, जेल भी गए। अपने जन्म स्थान शाही (बरेली) में भी समय समय जनता से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन खड़े करते रहे। जनता से जुड़े हर मुद्दे के साथ वो अपनी सम्पूर्ण ताकत से जुड़ते थे और संघर्षो को आगे बढ़ाते थे।

कैंसर से जूझते हुए भी जब वह शरीर से अत्यंत दुर्बल हो गए थे तब भी सोशल मीडिया के माध्यम से यथासम्भव अपनी आवाज बुलंद करते रहे। देश मे कृषि की समस्या पर एक किताब लिख रहे थे और मिजाजपुर्सी करने के लिए आने वाले लोगों से बड़े उत्साह से किताब के बारे में बात करते थे।

मास्साब से मेरा परिचय लगभग 8 साल पुराना था, उनके बेटे रूपेश से दोस्ती के चलते मास्साब से मिलने का मौका मिला, उसके बाद पूरे परिवार के साथ घनिष्टता बढ़ती चली गई। सामाजिक कार्यों में लगी हुई युवा पीढ़ी को मार्गदर्शन और सहयोग देने की उनकी बहुत इच्छा रहती थी और उन्होंने अपने अंतिम दिनों तक इस काम को बखूबी अंजाम भी दिया।

देहांत से लगभग 20 दिन पहले उनसे अंतिम मुलाक़ात के समय मैंने उनसे किताब के बारे में पूछा तो बोले कि मेरे बोले हुए को कोई लिखने वाला मिल जाए तो जल्दी ही किताब पूरी कर लूंगा। हिलते हुए हाथों से डायरी लिखते रहे।

मासिक पत्रिका 'प्रेरणा अंशु' पत्रिका के बिना मास्साब के बारे में बात अधूरी रह जाएगी। एक छोटे से अंजान कस्बे दिनेशपुर से लगातार 32 साल से राष्ट्रीय पत्रिका 'प्रेरणा अंशु' का प्रकाशन मास्साब की अदम्य जिजीविषा के कारण ही सम्भव हो पाया है। इस समय जब तकनीकी बदलावों और लोगों की बदलती आदतों के कारण बड़ी बड़ी पत्रिकाएं और समाचारपत्र अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में 'प्रेरणा अंशु' पत्रिका को निरन्तरता के साथ लोगों तक पहुंचाना मास्साब के दृढ़ निश्चय की सशक्त मिसाल है।

सामाजिक कार्यों में सशरीर उपस्थित रहने की उनकी इच्छा के कारण बीमारी की शुरुआत में मास्साब थोड़ा लापरवाह भी रहे। मास्साब के पूरे परिवार ने मास्साब का हमेशा साथ दिया, जनसंघर्षों में भी और बीमारी में भी।

मास्साब चले गए, लेकिन कमजोर तबकों को उत्पीड़न से बचाने का, समतामूलक-प्रगतिशील समाज बनाने का उनका सपना पूरा करने के लिए संघर्ष तो हमेशा जारी रहेगा। मुझे विश्वास है कि मास्साब के जीवन से प्रभावित होकर समाजहित मे काम करने वाले जो सैकड़ों लोग हमारे आसपास बिखरे हुए हैं जो मास्साब के काम को आगे बढ़ाएंगे।

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