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विमर्श

मोदी जी कभी किसी गैरभाजपाई-गैरसंघी को 'अ' राजनीतिक इंटरव्यू देने की हिम्मत दिखाइये

Prema Negi
28 April 2019 4:13 AM GMT
मोदी जी कभी किसी गैरभाजपाई-गैरसंघी को अ राजनीतिक इंटरव्यू देने की हिम्मत दिखाइये
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मोदी जी के साक्षात्कार में सबसे हास्यास्पद वाक्य था झूठ बोलकर लम्बे समय तक इम्प्रेस नहीं कर सकते। इसका मतलब उनसे अधिक कौन समझ सकता है और यह भी बताता है कि वे झूठ बोलते हैं और खूब बोलते हैं। दरअसल भाषण में यह खोजना कठिन होता है कि सच क्या था, था भी या नहीं...

महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

चुनावों, रोड-शो, भाषणों के बीच से समय निकालकर स्वघोषित महान मोदी जी ने फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को तथाकथित गैर-राजनीतिक इंटरव्यू दिया, वैसे इसमें गैर तो लगभग नदारद था। जैसे, 'मैं लम्बे समय तक सीएम रहा, मैं गुजरात का सबसे लम्बे समय तक सीएम रहा, अब इतने लम्बे समय से पीएम हूँ, अटल जी, आडवाणी जी, गुलाम नबी आज़ाद, ममता दीदी' – ये सभी राजनीति के हिस्से ही तो हैं। पूरा इंटरव्यू ऐसे ही वाक्यांशों से भरा पड़ा था।

कुछ वर्ष पहले नरेन्द्र मोदी बच्चों से बात करते हुए कह रहे थे कि राजनीति में कैसे-कैसे खेल होते हैं, आप नहीं समझोगे। यह इंटरव्यू भी राजनीति चमकाने का एक तथाकथित गैर-राजनीतिक खेल ही था। वैसे भी मोदी जी में शायद आज तक यह हिम्मत नहीं आयी कि किसी गैर-भाजपा या गैरसंघी मानसिकता वाले को इंटरव्यू से सकें। स्वघोषित महान उन्होंने खुद को कुछ इस तरह बताया जैसे उन्हें राजनीति में धक्का मार कर पहुंचा दिया गया हो।

'मैं सैनिक बनना चाहता था पर संन्यासी बन गया।' यहाँ तक तो ठीक है, पर इसके बाद का विरोधाभास देखिये, 'संन्यासी बनकर हिमालय चला गया, जाहिर है शांति की तलाश में ही गए होंगे। वैसे भी दुनियादारी सीखने तो कोई हिमालय नहीं जाता है, पर हिमालय में शाति की तलाश करते करते राजनीति में पहुँच गए। शायद ही किसी को यह रास्ता पता होगा। प्रश्नों का स्तर भी तो देखिये, राजनीति छोड़कर दिनभर और क्या करते हैं? अब भला यह कैसा प्रश्न है, दुनियाभर में डंका बजता है कि बंदा दिनभर में 20 घंटे काम करता है, पर टीवी खोलते ही तालियाँ बजाते और गरजते किसी मंच पर दिखते हैं। पता नहीं काम कब करते हैं और साल के कितने दिन करते हैं?

महान होना अलग है, और स्वघोषित महान होना बिलकुल अलग। मजबूरी यह है कि स्वघोषित महान की हरेक बात माननी पड़ती है। 'एमएलए बनने तक मेरा कोई बैंक खाता नहीं था – जब मैं छोटा था, स्कूल जाता था तब देना बैंक वालों ने बैंक अकाउंट खोला था।' ऐसे वाक्य केवल स्वघोषित महान ही बोल सकते हैं, जिसका बैंक अकाउंट था और नहीं भी था। उनके गाँव में बचपन में मोहल्ला भी था, बैंक भी था और लाइब्रेरी भी। इतना विकसित गाँव तो आज भी मिलना कठिन है।

'मुझे गुस्सा नहीं आता, गुस्सा अन्दर से आता है पर बाहर नहीं आता', इससे आप क्या समझ पा रहे हैं। प्रवचन जब कोई देता है तो जितनी भी शिक्षा देता है, उसमें से किसी का भी पालन प्रवचन देने वाला नहीं करता। यही हाल स्वघोषित महान का भी है, गुस्सा नहीं आता, लेकिन जिसने भी विरुद्ध में कुछ भी कहा उसके साथ कैसा व्यवहार आजकल किया जाता है, वैसा कम से कम प्यार में तो नहीं किया जाता है।

आगे देखिये, 'नीचा दिखाकर और अपमानित करने में मैं विश्वास नहीं करता।' भाषणों में तालियाँ बजाकर जो विपक्षी नेताओं के बारे में बोलते हैं वह तो उनकी तारीफ़ होती है, ऐसा शायद स्वघोषित महान समझते हैं।

उन्होंने कहा, लगाव, मोह, माया और घर सब छोटी आयु में ही छोड़ दिया। इतना बोलने के बाद यह तो समझ लेना चाहिए कि देशप्रेम जैसी कोई चीज उनके लिए नहीं है क्योंकि जब तक लगाव नहीं होगा, प्रेम कैसे होगा। जनता से तो कोई लगाव है ही नहीं। स्वघोषित महान का सबसे हास्यास्पद वाक्य था, झूठ बोल कर लम्बे समय तक इम्प्रेस नहीं कर सकते। इसका मतलब उनसे अधिक कौन समझ सकता है और यह भी बताता है कि वे झूठ बोलते हैं और खूब बोलते हैं। दरअसल भाषण में यह खोजना कठिन होता है कि सच क्या था, था भी या नहीं।

अलादीन के चिराग के बारे में कहा कि यह कहानी बंद होनी चाहिए और इसके बदले समाजशास्त्रियों को और शिक्षाविदों को ऐसी कहानी गढ़ानी चाहिए, जो मेहनत करना सिखाती हो। हमारी संस्कृति का मूल चिन्तन परिश्रम है। चलिए स्वघोषित महान का कहना मानकर इस कहानी को भूल जाते हैं, पर हिन्दू पौराणिक कहानियों का क्या करेंगे, जो हरेक मौके पर भगवान् के वरदान के सहारे बढ़तीं हैं? वरदान क्या है, बिना परिश्रम के अधिक चाहने की इच्छा नहीं है?

कुल मिलाकर यह इंटरव्यू एक बकवास फिल्म स्क्रिप्ट से अधिक कुछ नहीं था। वही सारा पुराना मसाला, मैं बहुत गरीब था, गाँव में रहता था, बहुत परिश्रम किया, अपने बलबूते पर यहाँ पहुंचा, मोह माया से परे हूँ और सब मिलाकर मैं बहुत महान हूँ।

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