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मुस्लिम पक्ष ने कहा पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर होती थी पूजा, 49 में रखी गयी गुंबद के नीचे मूर्ति

Prema Negi
5 Sep 2019 12:10 PM GMT
मुस्लिम पक्ष ने कहा पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर होती थी पूजा, 49 में रखी गयी गुंबद के नीचे मूर्ति
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मुस्लिम पक्ष के वकील ने दी दलील, पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर होती थी पूजा, मगर 1949 में मूर्ति को बाहरी आंगन से हटाकर रख दिया गया अंदर के आंगन पर बीच वाले गुंबद के नीचे, बीच वाले गुंबद के नीचे जन्मस्थान है इसका नहीं है कहीं उल्लेख...

जेपी सिंह की रिपोर्ट

च्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के समक्ष अयोध्या मामले में चल रही सुनवाई के 19वें मुस्लिम पक्षकार के वकील राजीव धवन ने दलील दी कि पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर पूजा होती थी, लेकिन 1949 में मूर्ति को बाहरी आंगन से हटाकर अंदर के आंगन पर बीच वाले गुंबद के नीचे रख दिया गया। हालांंकि मुस्लिम पक्षकार ने निर्मोही अखाड़ा के मैनेजमेंट के अधिकार का विरोध नहीं किया, लेकिन कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि आखिर किस हिस्से में ये अधिकार चाहते हैं। निर्मोही अखाड़े ने पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर पूजा का अधिकार मांगा था, लेकिन उनका मालिकाना हक कभी नहीं था।

राजीव धवन ने कहा निर्मोही अखाड़ा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। निर्मोही अखाड़े ने जन्मस्थान और मंदिर के प्रबंधन और कब्जे का दावा कर रखा है, लेकिन मैं जानता हूं कि वह इस केस से बाहर ही हैं। इस पर जस्टिस एसए नजीर ने पूछा क्या आप शेबियत (देवस्थान के देखरेख और मैजनेमेंट के अधिकार) अधिकार को चुनौती दे रहे हैं? राजीव धवन ने कहा नहीं। जस्टिस अशोक भूषण ने पूछा अगर आप देखरेख के अधिकार को स्वीकार करते हैं तो फिर आपको जिस जमीन के देखरेख के अधिकार मांगे जा रहे हैं उसे भी स्वीकार करना होगा।

स पर राजीव धवन ने कहा कि बिल्कुल, और हो सकता है लेकिन कौन सा पार्ट माई लॉर्ड? प्रबंधन का अधिकार मांगना ठीक है। ये उनका स्टेटस है, लेकिन क्या देखरेख करना है? ये प्रबंधन के अधिकारी हो सकते हैं लेकिन सवाल है कि कौन से पार्ट का प्रबंधन? मूर्ति कहां थी? कहां पूजा होती थी? राम चबूतरे पर, न कि अंदर के आंगन पर।

स्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि निर्मोही अखाड़े का दावा अंदर और बाहर दोनों ही आंगन (प्रांगण) पर है। इस पर राजीव धवन ने जवाब दिया कि लेकिन हमारा केस है कि 1885 में उन्होंने (निर्मोही अखाड़े ने) पूजा का अधिकार मांगा था। वह राम चबूतरा था। किसी मालिकाना हक के लिए कोई दावा नहीं था।

स्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि चाहे देवता के मैनेजमेंट के अधिकार मांगे जाएं, लेकिन देवता का भोगाधिकार उससे ज्यादा है। इस पर राजीव धवन ने कहा कि हमने पहले भी कहा है कि देवता का सीमित अधिकार है। 1885 में प्रबंधन के लिए शूट दाखिल किया गया था, लेकिन मालिकाना हक नहीं मांगा गया था। देवता का अधिकार सीमित था, यह बात मैं कह चुका हूं।

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राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़े का कहना है कि अखाड़े के नाम पर मठ था लेकिन यह दलील बिना किसी आधार के है। इस पर जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि आप यह भी कहना चाहते हैं कि कुराणिक कानून मस्जिद पर लागू नहीं होगा? राजीव धवन ने कहा मेरा कहना है कि भारतीय कानून ने जिस कुराणिक लॉ को स्वीकार किया है, उस पर अमल करना होगा। निश्चित तौर पर कुराणिक लॉ को नजरअंदाज नहीं कर सकते।

क्फ बोर्ड की तरफ से राजीव धवन ने कहा, यानी मेरा केस है कि वक्फ यूजर है। संपत्ति हमारी है। कुछ लोग आए और उन्होंने कहा कि वह पूजा करना चाहते हैं। हमने उन्हें नहीं रोका। लेकिन सवाल यहां मालिकाना हक का है और हम उसका जवाब दे रहे हैं। यह मेरा काम नहीं है कि मैं कहूं कि आप जो कह रहे हैं वह आप हैं ही नहीं। यह काम कोर्ट का है। निर्मोही अखाड़ा बाहरी आंगन पर दावा पेश कर रहा है, लेकिन वह बाहरी आंगन पर मालिकाना दावा नहीं कर सकता। मेरा कहना है कि निर्मोही अखाड़े का दावा सिर्फ प्रबंधन को लेकर है।

राजीव धवन ने दलील दी कि पहले बाहरी आंगन के राम चबूतरे पर पूजा होती थी, लेकिन 1949 में मूर्ति को बाहरी आंगन से हटाकर अंदर के आंगन पर बीच वाले गुंबद के नीचे रख दिया गया। बीच वाले गुंबद के नीचे जन्मस्थान है, इसका कहीं उल्लेख नहीं है। ऐसे में निर्मोही अखाड़े को कोई रिलीफ नहीं मिलना चाहिए। अब हम देवता के मालिकाना हक यानी स्वयंभू के मामले में दलील पेश करेंगे। स्वयंभू देवता तब होते हैं जब वह स्वयं प्रकट हैं। लाभार्थी वो लोग होते हैं जो पूजा करते हैं। इसी कारण पूजा करने वाले का हित प्रोटेक्ट किया जाता है।

राजीव धवन ने कहा कि निर्मोही अखाड़े का दावा सिर्फ बाहरी आंगन के राम चबूतरे तक था। निर्मोही अखाड़े की दलील रही है कि वहां मंदिर ही था और मस्जिद नहीं था। यह दलील नहीं ठहर सकती। तमाम दस्तावेज ये कहते हैं कि हिंदुओं ने बाहरी आंगन में स्थित राम चबूतरे पर पूजा की थी और उसे ही राम का जन्मस्थान मानते थे। हमारी दलील है कि अगर ये माना जाए कि वहां 1934 के बाद नमाज नहीं पढ़ी जाता थी, तब भी दूसरे पक्षकार प्रतिकूल पजेशन का इस आधार पर दावा नहीं कर सकते कि वहां नमाज नहीं पढ़ी गई।

जेटियर्स को नहीं पढ़ा जा सकता और उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने बनाया था और वह विवाद के मकसद से एक विशेष तरह से बनाया गया था। पी. कारनेजी ने संकेत दिया था मुस्लिम अंदर के आंगन में नमाज पढ़ते थे, जबकि हिंदू बाहरी आंगन में पूजा करते थे।

अंसारी पर हमले का मामला उठा

बाबरी मस्जिद के पक्षकार इकबाल अंसारी पर मंगलवार 3 सितंबर को हुए हमले के मामले को मुस्लिम पक्षकारों के लिए अदालत में पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने संविधान पीठ के सामने उठाया। पीठ ने यह भरोसा दिलाया कि इस संबंध में कदम उठाए जाएंगे।

बुधवार 4 सितंबर को सुनवाई शुरू होते ही राजीव धवन ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. ए. बोबड़े, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष कहा कि 3 सितंबर को प्रथम याचिकाकर्ता मोहम्मद हासिम के बेटे इकबाल अंसारी, जो अब पक्षकार हैं, पर एक शूटर ने हमला किया है। हालांकि उनके सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें बचा लिया और हमलावर को गिरफ्तार कर लिया है। इस बीच इस मामले के एक दिन बाद जिला प्रशासन ने इकबाल अंसारी की सुरक्षा बढ़ा दी है। सुरक्षा में अब 7 पुलिसकर्मी तैनात होंगे। अभी तक 2 सुरक्षाकर्मी तैनात थे।

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