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उसका नाम नजीब न होता तो इस बेरुखी से पेश न आतीं हमारी सुरक्षा एजेंसियां'

Prema Negi
15 Oct 2019 12:29 PM GMT
उसका नाम नजीब न होता तो इस बेरुखी से पेश न आतीं हमारी सुरक्षा एजेंसियां
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जो सरकार यह दावा करती है कि हम दहशतगर्द को उसके घर से उसके घर ने निकाल लाएंगे, वो कहीं भी छुपा हो उसे ढूंढ़कर निकाल लाएंगे, वो 3 साल से लापता एक नौजवान को नहीं ढूंढ़ पा रही, ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि वो मुस्लिम है...

जनज्वार, दिल्ली। नजीब के गायब होने के 3 साल होने पर आज 15 अक्टूबर को जंतर मंतर पर कुछ युवा और सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठा हुए। इनमें जेएनयू के गायब हुए छात्र नजीब की मां के अलावा उमर खालिद, अपूर्वानंद समेत कई जाने—माने लोग शामिल थे, जिन्होंने इस मामले में सरकार की बेरुखी पर सवाल उठाये।

गौरतलब है कि आज ही के दिन 3 साल पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के हॉस्टल से बदायूं का रहने वाला नजीब अहमद गायब हो गया था, जिसका आज तक कोई पता नहीं चल पाया है। पहले दिल्ली पुलिस फिर CBI, NIA भी नजीब को तलाश चुकी हैं, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं लगा।

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जीब को गायब हुए 3 साल बीत जाने पर आज मंगलवार 15 अक्टूबर को जंतर मंतर पर युवा एकत्रित हुए, हालांकि युवाओं की संख्या बहुत अधिक नहीं थी। इस मौके पर JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद ने कहा कि देश के गृहमंत्री अमित शाह को नजीब की चिंता नहीं है, उन्हें अपने बेटे की चिंता है तभी उनका बेटा भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) का सचिव बन गया है।

हरियाणा चुनाव में जनज्वार की ग्राउंड रिपोर्ट यहां देखें :

यूनिवर्सिटी के प्रोफ्रेसर अपूर्वानंद ने कहा की नजीब को ढूंढ़ने की जिम्मेदारी हमारी और आपकी नहीं है, बल्कि देश की सुरक्षा एजेंसी का काम है कि वे नजीब को ढूंढे, क्योंकि उनके पास इसका हुनर है, साधन है लेकिन अफ़सोस है कि इन एजेंसियों की नजीब को ढूंढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि यदि उसका नाम नजीब न होता तो उसके साथ ये बेरुखी, असंवेदनशीलता नहीं होती। इसका सिर्फ एक संदेश है यदि आपका नाम नजीब या नजीब जैसा कुछ है, तो आपके लिए हिंदुस्तान में बहुत कम जगह है।

दि CBI बंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट दे रही है, उस लिफाफे में क्या है इस बारे में न नजीब की माँ को पता है, न नजीब के JNU के साथियों को पता है और न ही नजीब के वकीलों को इसकी जानकारी है। अपूर्वानंद ने कहा कि ये एक रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सरकार की एजेंसियां बंद लिफाफे में रिपोर्ट देने लगी हैं और हिंदुस्तान की जनता को ये जानने का अधिकार नहीं होगा कि उस बंद लिफाफे में क्या है।

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हिंदुस्तान एक ढलान पर है एक फिसलन पर है। ये एक अनैतिक समाज की खाई है। अगर इस हिंदुस्तान की सरकार में कुछ लोग आये हैं जनतंत्र के सहारे बहुमत हासिल करके, तो इस बहुमत ने उन्हें ये अधिकार नहीं दिया है कि वे संविधान को पूरी तरह से कुचल डालें। हमारी एजेंसीज की भी अपनी एक स्वतंत्रता है। उस स्वतंत्रता की इज़्ज़त उन्हें भी करनी चाहिए। पुलिस, CBI, NIA को स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए। उन्हें संविधान के प्रति वफादार होना चाहिए, यानि हिंदुस्तान के हर शख्स के प्रति चाहे उसका धर्म कोई भी हो, लेकिन अब हिंदुस्तान में एजेंसियां पक्षपातपूर्ण ढंग से काम कर रही हैं।

हरियाणा चुनाव पर जनज्वार की ग्राउंड रिपोर्ट में देखें जनता क्या सोचती है पार्टियों के बारे में :

ने आगे कहा है जो सरकार यह कहती है कि हम दहशतगर्द को उसके घर से उसके घर ने निकाल लाएंगे, वो कहीं भी छुपा हो उसे ढूंढ़कर निकाल लाएंगे, वो एक नौजवान को नहीं ढूंढ़ पा रही है। यह सिर्फ नजीब के परिवार का मामला नहीं है, तरबेज के परिवार का मामला नहीं है, सुबोध कुमार के परिवार का मामला नहीं है हमारा और आप सभी का मामला है।

न्होंने कहा इस मुल्क में खास तौर पर हिन्दुओं को सोचने का वक़्त है कि वो ये सोचें कि उनके नाम पर ये सरकार क्या कर रही है, हिन्दुओं को ढाल बनाकर काम कर रही है, क्या वे अनैतिक काम अपने नाम पर होने देना चाहते हैं। इसलिए आज हम यहाँ नजीब, तरबेज, पहलू खान, सुबोध कुमार के लिए खड़े हैं। लेकिन ध्यान रहे हमारे भी धीरज का इम्तिहान हो रहा है। हम सब के जीवट का भी इम्तिहान हो रहा है। हम अपनी एकजुटता को कम न होने दें और इन्साफ की आवाज़ को नीचा न होने दें, ये हमारा भी इम्तिहान हो रहा है। इस इम्तिहान पर हम खरे उतरते हैं या नहीं इस पर हिंदुस्तान के जम्बूरीयत का मुस्तकबिल तय होगा, मैं ये मानता हूँ बेइंसाफी जितना बढ़ेगी इन्साफ चाहने वालों को तादाद भी उतना ही बढ़ेगी।

ये भी मैं मानता हूँ इन्साफ चाहने वालों में सिर्फ वो नहीं होंगे जिन्हे निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि इन्साफ पसंद वे भी होंगे जिनके नाम पर दूसरों को निशाना बनाया जा रहा है। इसी से उनकी आत्मा बचेगी, मैं सिर्फ उन्हें अपनी आत्मा बचाने की अपील करता हूँ।

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