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राजनीति

केंद्र में उत्तराखंडी नेताओं की नहीं कोई पूछ, पर अधिकारियों की धाक कायम

Janjwar Team
3 Sep 2017 6:01 PM GMT
केंद्र में उत्तराखंडी नेताओं की नहीं कोई पूछ, पर अधिकारियों की धाक कायम
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मोदी कैबिनेट में हुए फेरबदल के बाद भी उत्तराखंड से कोई सक्षम मंत्री न बनाया जाना हतप्रभ करता है...

देहरादून से मनु मनस्वी की रिपोर्ट

देहरादून। 3 सितंबर को मोदी कैबिनेट में लगभग दर्जनभर मंत्रियों ने शपथ ली, लेकिन डबल इंजन की सरकार होने का दंभ भरकर उत्तराखंड की जनता को भरमाती भाजपाई त्रिवेन्द्र सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि क्यों उसके राज्य में से एक भी ऐसा चेहरा नहीं, जो मोदी की आंखों में चढ़ पाए।

लोकसभा में फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी, पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी, पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, माला राज्य लक्ष्मी शाह और अजय टम्टा उत्तराखण्ड का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें तीन पूर्व मुख्यमंत्री हैं, मगर उन्हें भी मोदी ने केंद्र में कोई तवज्जो नहीं दी।

जो अंधभक्त ये मानकर एक दिन पहले से ही मिठाइयां बांटकर यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि अबकी बार तो केन्द्रीय मंत्रिमंडल में उत्तराखंड को तरजीह मिलेगी, उनके लडडू उनके ही हलक में समा गए हैं, क्योंकि कोई इन्हें पचाने को राजी ही नहीं।

भाजपा को पांच में से पांच सांसद देने वाले उत्तराखंड में मोदी सरकार को एक भी ऐसा ‘लायक’ ढूंढे नहीं मिल रहा, जो उसकी कैबिनेट की शोभा बन सके। वैसे अजय टम्टा को उत्तराखंडियों के संतोष के लिए पहले से केंद्र में ऐसा मंत्रालय प्राप्त है, जिसको पूछने पर राज्य के भाजपाई भी नहीं बता पाते कि टम्टा दाज्यू कौन से मंत्री हैं।

वहीं दूसरी ओर यहां के कई ऐसे अफसर रहे हैं, जो अपनी ईमानदारी के दम पर पूरे रुआब के साथ केन्द्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। एनआईए चीफ अजीत डोभाल, सेनाध्यक्ष विपिन रावत से लेकर राॅ चीफ अनिल धस्माना जैसे उत्तराखंड के लाल अपनी धाक जमा रहे हैं और अपनी बेहतर कार्यप्रणाली के चलते केन्द्र सरकार की आंखों का तारा बने हुए हैं।

इसके अलावा हाल ही में केन्द्र सरकार ने पूरी पड़ताल के बाद जवाहर पर्वतारोहण संस्थान के कर्नल अजय कोठियाल और अपनी स्वच्छ कार्यशौली के चलते स्थानीय जनता की वाहवाही पा रहे रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल को केदारनाथ में पुनर्निमाण कार्यों की बागडोर सौंपी है।

गौरतलब है कि केदारनाथ आपदा के वक्त जब तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा एण्ड कैबिनेट समेत पूरा प्रशासन पूरी तरह फेल साबित हुआ था, तब कर्नल अजय कोठियाल ही थे, जिन्होंने अपने जीवट से वहां कार्य कर सरकार को आईना दिखाया। खबर है कि केदारनाथ में पुनर्निर्माण कार्य कर्नल अजय कोठियाल देखेंगे और समस्त प्रशासनिक कार्य युवा मंगेश घिल्डियाल के कंधों पर होंगे।

सवाल यह है कि केंद्र सरकार की रिपोर्ट कार्ड में अव्वल आने के लिए क्या चापलूसी की दरकार है या कर्मठ कार्यशैली की? केन्द्र सरकार ने साफ कर दिया है कि यदि परफारमेंस सही नहीं होगी तो ईनाम की उम्मीद न पाली जाए।

लाख टके का सवाल यह है कि जब अधिकारी वर्ग नेताओं के दबाव को झेलते हुए भी पूरी कर्तव्यनिष्ठा से काम कर केन्द्र में अपनी साख बना सकता है तो जनता द्वारा चुने हुए ये माननीय कब अपने रिपोर्ट कार्ड पर पासिंग मार्क्स ला पाएंगे।

इसका जवाब लंबे आंदोलन के बाद अस्तित्व में आए देवभूमि उत्तराखंड की जनता भी सुनना चाहती है कि क्यों यहां एक भी नेता जननेता के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पाया।

सवाल चुभता हुआ है, लेकिन वाजिब है।

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