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उत्तर प्रदेश

रिजवान की मौत का न यूपी पुलिस पर दर्ज हुआ केस, न जज बैठे, अधिकारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सुना दिया फैसला

Nirmal kant
20 April 2020 4:12 PM GMT
रिजवान की मौत का न यूपी पुलिस पर दर्ज हुआ केस, न जज बैठे, अधिकारी ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सुना दिया फैसला
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रिजवान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जिन चोटों का जिक्र है और सीएचसी के दस्तावेज में ब्लंट आब्जेक्ट द्वारा चोट लगने की बात कही गई है वो पुलिस के इस कथन के विपरीत है कि पुलिस पर लगाया गया आरोप असत्य और निराधार है...

जनज्वार, लखनऊ। उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर स्थित टांडा के रिज़वान के पिता इसरायल द्वारा उनके बेटे की हत्या के लिए पुलिसकर्मियों पर आरोप लगाने के बाद पुलिस द्वारा किया जा रहा मीडिया ट्रायल न सिर्फ पुलिस पर सवाल उठाता है, बल्कि साफ करता है कि पूरा का पूरा अमला मिलकर इस कांड की सच्चाई को छुपाना चाहता है।

मृतक रिजवान के पिता इसरायल की तहरीर पर एफआईआर दर्ज न करके पुलिस द्वारा खुद पर लगे आरोपों पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अपनी सुविधानुसार किया गया विश्लेषण दोषियों को बरी करने की इंसाफ विरोधी कोशिश है।

इस मामले में रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने कहा कि रिज़वान की मृत्यु के बाद अम्बेडकर नगर के कप्तान का बयान की जांच की जा रही है। इससे उम्मीद बंधी थी किकि वो इस मामले के आरोपी चाहे वो उनके पुलिसिया अमले की ही क्यों न हों, वो सच्चाई के साथ खड़े होंगे। लेकिन दूसरे ही दिन यह कहना कि अब तक एकत्र किए गए सबूतों के अनुसार, यह दिखाने के लिए कुछ भी नहीं कि रिजवान पर पुलिस ने डंडों से हमला किया था, न सिर्फ जल्दबाजी है बल्कि जांच की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश है। निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है पर जिस तरह से पुलिस कह रही कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उनके शरीर पर कहीं भी लाठी (डंडों) से कोई चोट नहीं दिखती है ऐसा पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नहीं है।

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राजीव सवाल उठाते हैं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जिन चोटों का जिक्र है और सीएचसी के दस्तावेज में ब्लंट आब्जेक्ट द्वारा चोट लगने की बात कही गई है, वो पुलिस के इस कथन के विपरीत है कि पुलिस पर लगाया गया आरोप असत्य और निराधार है। वहीं पुलिस द्वारा एक डॉक्टर के बयान जारी करने के बाद यह कहना कि वो उसका फेमिली डॉक्टर है और वे कह रहे हैं कि मोटर साइकिल से गिरने की वजह से उसे चोटें आई, कई सवाल खड़ा करती है। क्या जरूरत पड़ी जो पुलिस ने ये बयान लिया और जारी किया। क्या सिर्फ इसलिए कि आरोपी पुलिस वाले है।'

में सवाल उठता है कि बिना एफआईआर के विवेचना शुरू कर चुकी पुलिस को बताना चाहिए कि जब वो उन डॉक्टर साहब की बात मान सकती है तो आखिर रिज़वान के पिता की क्यों नहीं। दूसरे जिस पृष्ठभूमि से रिज़वान आता है उसके पिता साइकिल का पंचर बनाते हैं, ऐसे लोगों का फेमिली डॉक्टर की बात कहना अपने आप में हास्यास्पद है।

इस मामले में सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता असद हयात कहते हैं, 'पोस्टमार्टम रिपोर्ट मात्र मेडिकल एक्सपर्ट की राय है और यह सम्पूर्ण साक्ष्य नहीं होती। हत्या के मामले में जब विवेचना की जाती है तो घटना के सीधे साक्ष्य और परिस्थिति जन्य साक्ष्यों को भी एकत्र किया जाता है। अनेक चश्मदीद गवाह भी सामने आते हैं। चूँकि पिटाई का आरोप पुलिस के विरुद्ध है इसलिए मुमकिन है कि चश्मदीद गवाह डरे और सहमे हों और जांच के दौरान अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर अपने बयान दर्ज कराएं। अक्सर देखा जाता है कि अदालत में जिरह के दौरान मेडिकल विशेषज्ञ डॉक्टर ऐसे बयान दे जाते हैं जिनसे जुर्म साबित हो जाता है और यह विश्लेषण समस्त एकत्र किए गए साक्ष्यों के आधार पर अदालत करती है न कि पुलिस अफसर। इस मामले में अदालत का काम पुलिस अफसर कर रहे हैं और बिना रिपोर्ट दर्ज किए ही जांच का दरवाजा भी बंद कर रहे हैं।'

गौरतलब है कि रिज़वान की मृत्यु के बाद उनके पिता का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद पुलिस ने कहा रिजवान के पिता के वीडियो का खंडन जारी करते हुए कहा कि भ्रामक सूचना वाला वीडियो शेयर न करें।

हीं मोहम्मद इजरायल के पिता का वीडियो सामने आया है, जिसमें वो यह कह रहे हैं कि उन पर स्थानीय नेता दबाव बना रहे हैं। पैसे का लालच औऱ धमकी दे रहे हैं। उन्होंने पुलिस के दावे को खारिज कर दिया कि रिजवान एक दुर्घटना में घायल हो गया था। उनका कहना है कि न तो हमारे पास गाड़ी और न ही वो चलाना जानता था। वह मज़दूर वर्ग का था और मज़दूरी के ज़रिए अपना जीवन यापन करता था। खुद रिज़वान के पिता साइकिल का पंचर बना परिवार को पालते हैं।

मंच ने सवाल उठाया है कि योगी सरकार द्वारा लॉकडाउन के नाम पर की जा रही पुलिस प्रताड़ना पर कोई ठोस कार्रवाई न होने का नतीजा है रिज़वान की मौत। इसके पहले भी लखीमपुर खीरी में एक दलित युवक ने पुलिस पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली थी। उस मामले में भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं कि। उन्होंने कहा की रिजवान की मौत सिर्फ पुलिस पर ही नहीं बल्कि योगी सरकार के राशन वितरण प्रणाली पर भी सवाल उठाती है। क्योंकि रिजवान का गुनाह यह था की उसको भूख लगी थी और वह खाने का सामान लेने के लिए निकला था।

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पुलिसिया हिंसा का शिकार एक मजदूर दो दिन तक तड़प-तड़प कर मर गया और पुलिस उसके पिता से पूछ रही है कि उसने बताया क्यों नहीं। और जब उन्होंने बताया ही नहीं, बल्कि पुलिसकर्मियों के खिलाफ तहरीर भी दी तो अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। जबकि होना यह चाहिए था कि रिजवान के पिता इजरायल ने जिन दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तहरीर दी है उन्हे उसी वक्त बर्खास्त कर देना चाहिए था। रिजवान के पिता का जो वीडियो सामने आया है वह न सिर्फ दिल दहलाने वाला है, बल्कि गरीब के प्रति पुलिस के रवैए को भी उजागर करता है।

मृतक रिजवान के परिवार का कहना है कि 15 अप्रैल को शाम चार बजे घरेलू सामान लेने गया था। पोस्ट ऑफिस के निकट पुलिस का एक वाहन पहुंचा। इसमें एक महिला दारोगा व अन्य पुलिसकर्मी मौजूद थे। रिजवान को रोककर पुलिसकर्मियों ने पहले उसकी लाठी से पिटाई कीए उसके बाद घायल युवक ने घर पर पहुंच के परिजनों को पूरे मामले की जानकारी दी। पिता के मुताबिक लॉकडाउन व पुलिस की दहशत से घर पर ही रिजवान का देशी उपचार करता रहा। हालत बिगड़ने पर शुक्रवार 17 अप्रैल को इलाज के लिए सीएचसी टांडा ले जाया गया। यहां से उसे जिला चिकित्सालय भेज दिया गया जहां शनिवार 18 अप्रैल की सुबह उसकी मौत हो गई।

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