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देश में हर रोज कुपोषण से मर रहे एक हजार से पंद्रह सौ बच्चे, आंगनबाड़ी केंद्रों के बंद होने का असर

Nirmal kant
5 Jun 2020 9:51 AM GMT
देश में हर रोज कुपोषण से मर रहे एक हजार से पंद्रह सौ बच्चे, आंगनबाड़ी केंद्रों के बंद होने का असर

यूनिसेफ की प्रतिनिधि एवं बाल्यावस्था के दौरान शिक्षा एवं देखभाल की विशेषज्ञ सुनीषा आहूजा ने कहा कि अभी आँगनवाड़ी सेवाएँ लगभग पूरी तरह बन्द हैं। ग्रोथ मोनिटरिंग नही होने के कारण कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। रोजाना 1000-1500 बच्चों की मृत्यु हो रही हैं...

जनज्वार। मार्च में लॉकडाउन की घोषणा से लेकर अब तक सरकार की ओर से ढेर सारी घोषणाएं तो की गईं, लेकिन इन घोषणाओं के केंद्र में 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कभी नहीं रखा गया। अभी आँगनवाड़ी सेवाएं लगभग पूरी तरह बंद हैं। नतीजतन ग्रोथ मोनिटरिंग के अभाव में कुपोषित एवं अति कुपोषित बच्चे प्रभावित हो रहे हैं और प्रत्येक दिन 1000-1500 बच्चों की मृत्यु हो रही हैं जो बेहद ही चिंताजनक है।

ही नहीं ऑनलाइन शिक्षा के इस दौर में नेटवर्क, मोबाइल चार्ज, डाटा पैक से लेकर मोबाइल सेट की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी समस्याओं ने व्यापक आबादी को शिक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है।

नलाइन प्लेट्फॉर्म्स तकनीकी तौर पर चाहे जितने भी उन्नत हों, वे नियमित स्कूली शिक्षा के विकल्प कतई नहीं हो सकते। बच्चों को अनदेखी करके हम और हमारा समाज आगे नहीं बढ़ सकता है। ये बातें राइट टू एजुकेशन फोरम द्वारा जारी शिक्षा-विमर्श के तहत वेब-संवाद की पांचवी कड़ी में 'कोविड-19 संकट: 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के अधिकार व चुनौतियाँ' विषय पर वक्ताओं ने कहीं।

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स वेब संवाद को प्रो. विनीता कौल, प्रो. रेखा शर्मा सेन, और सुनीषा आहूजा ने संबोधित किया। एलायंस फॉर राइट टू ईसीडी की संयोजक एवं 6 साल से कम उम्र के बच्चों की शिक्षा–स्वास्थ्य–पोषण पर एक समग्र दृष्टि के साथ बतौर विशेषज्ञ लंबे समय से कार्यरत, सुमित्रा मिश्रा ने पूरे विमर्श में सूत्रधार की भूमिका निभाते हुए अंत में एक बेहतरीन सार-टिप्पणी प्रस्तुत की।

पने संबोधन में यूनिसेफ की प्रतिनिधि एवं बाल्यावस्था के दौरान शिक्षा एवं देखभाल की विशेषज्ञ सुनीषा आहूजा ने कोविड से उपजे वैश्विक संकट का जिक्र करते हुए कहा कि आज की मुश्किल घड़ी में हम 6 वर्ष से कम उम्र के उन नौनिहालों के अधिकारों पर बात कर रहे हैं जो हमारे देश का भविष्य हैं। कोविड - 19 के बारे में जानकारी देने तथा सतर्कता बरतने के लिए यूनिसेफ और सरकार के बातचीत के बाद एक कार्ययोजना बनाई गई। ये सहमति बनी कि आगनवाड़ी तथा आशा कार्यकर्ता घरों तक पहुँच में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

हूजा ने चिंता जताते हुए कहा, 'अभी आँगनवाड़ी सेवाएँ लगभग पूरी तरह बन्द हैं। ग्रोथ मोनिटरिंग नही होने के कारण कुपोषित और अतिकुपोषित बच्चे प्रभावित हो रहे हैं। रोजाना 1000-1500 बच्चों की मृत्यु हो रही हैं, जोकि बेहद चिंता का विषय है। आंगनबाड़ी केन्द्रों का संचालन कब से शुरू होगा कहा नहीं जा सकता। लेकिन पहले टीकाकरण, ग्रोथ मोनिटरिंग का काम शुरू किया जाये, उसके बाद ही सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को शुरू करना उचित होगा।'

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प्रो. विनीता कौल ने कहा, 'आज ऑनलाइन शिक्षा की बात ज़ोर-शोर से हो रही है हैरत ये है कि अत्यंत छोटे बच्चों को भी ऑनलाइन शिक्षा की वकालत की जा रही है जबकि इस ऑनलाइन शिक्षा ने अभिभावकों को काफी दबाव में ला दिया है। नेटवर्क, मोबाइल चार्ज, डाटा पैक से लेकर मोबाइल सेट की अनुपलब्धता जैसी बुनियादी समस्याओं ने व्यापक आबादी को शिक्षा के इस प्लैटफ़ार्म से बाहर कर दिया है।'

चिंता जताते हुए कहा कि ऑनलाइन शिक्षा की बात मान भी ली जाये, तो क्या सिर्फ शिक्षा से बच्चों का सामाजिक, शारीरिक, मानसिक विकास सम्भव होगा? घरों में बढ़ते घरेलू हिंसा के मामले भी बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, इसलिए घर में भी सामाजिक-संवेदनशील वातावरण बनाए रखने की जरूरत है।

ग्नू विश्वविद्यालय की प्रो रेखा शर्मा सेन ने कहा, “ऑनलाइन शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा के फर्क को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन प्लेट्फॉर्म्स तकनीकी तौर पर चाहे जितने भी उन्नत हों, वे नियमित स्कूली शिक्षा के विकल्प कतई नहीं हो सकते। एकतरफा संवाद ज्ञान साझा करने के मूल उद्देश्यों, सृजन और सीखने –सिखाने की प्रक्रिया को ही बाधित कर देता है। और 6 साल से छोटे बच्चों के लिए तो ये पूरी प्रक्रिया बेहद तकलीफदेह और उबाऊ हो जाएगी जो उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डालेगा।“

सुमित्रा मिश्रा, संयोजक, अलाइन्स फॉर राइट टू ईसीडी ने कहा कि मार्च में घोषित लॉकडाउन से लेकर अब तक सरकार के द्वारा बहुत सारी घोषणाएँ तो की गई, लेकिन इस उम्र के बच्चों को केंद्र में रखकर कुछ भी नहीं किया गया। ऐसे बच्चों को अनदेखी करके हम और हमारा समाज आगे नहीं बढ़ सकता है। उन्होंने निराशा जाहिर करते हुए कहा कि मीलों माँ–बाप के साथ पैदल चलते बच्चे, सूटकेस पर सोते हुए बच्चे, रास्ते में बच्चे का जन्म लेना, मृत मां के आंचल खीचते बच्चे जैसे दारुण दृश्य वाली घटनाएं भला कैसे किसी भी सभ्य समाज की पहचान हो सकती है। हमें सरकार की जवाबदेही और सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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वेबिनार की शुरुआत में सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए राइट टू एजुकेशन फोरम के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीष राय ने कहा कि आज हम 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के शिक्षा और अधिकार पर बाते करेंगें। इस उम्र तक बच्चों के मस्तिष्क का 75 प्रतिशत विकास हो जाता है। इसलिए बच्चों की दृष्टि से प्रारम्भिक बाल्यावस्था देख-रेख एवम शिक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है। नई शिक्षा नीति के मसौदे में भी इसे महत्वपूर्ण रूप से जगह दी गई है। लेकिन वह अंतिम रूप में किस तरह सामने आएगा ये देखना बाकी है। आज कोविड-19 के दौर में इस उम्र के बच्चों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

देश के विभिन्न भागों से प्रांतीय राइट टू एजुकेशन फोरम के प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत शिक्षाविदों, शिक्षकों एवं तकरीबन 400 लोगों ने वेब–संवाद में हिस्सा लिया।

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