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जमींदारों, सूदखोरों और बाहुबलियों के खिलाफ खूब लड़े मास्साहब

Janjwar Team
23 March 2018 4:43 PM GMT
जमींदारों, सूदखोरों और बाहुबलियों के खिलाफ खूब लड़े मास्साहब
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कभी बरेली में कचहरी के सामने सूरमा बेचने वाले प्रताप सिंह ने सोचा भी नहीं था कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने पर एक दिन उनका नाम माओवादियों की सूची में डाल दिया जाएगा...

आकाश नागर

उत्तराखण्ड के तराई में 90 का दशक काफी उथल- पुथल मचाने वाला था। यहां के बाहुबली सूदखोर और जमींदार गरीब मजदूरों और कामगार वर्ग के लोगों पर अत्याचार कर रहे थे। कहीं पर जमीनें कब्जाई जा रही थीं तो कहीं पर निर्बल लोगों की झोपड़ियों तक जलाई जा रही थी। उन्हें बंधक बनाकर अपने फार्म हाउसों पर रखा जाता था। जिन गरीब लोगों से ब्याज नहीं दिए जा रहे थे, उनसे जबरन वसूली की जाती थी। ऐसे में कई लोग आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हुए थे।

तराई के इतिहास में 12 दिसंबर, 1992 का दिन ‘काला दिवस’ के रूप में जाना जाता है। इस दिन रामबाग के एक बाहुबली जमींदार ने गरीब लोगों की झोपड़ियां जला दी। आतंक का पर्पाय बन चुके ऐसे दबंग सूदखोरों और जमींदारों के खिलाफ पहली बार एक आवाज उठी और वह आवाज मास्टर प्रताप सिंह (मास्साब) की थी जो अब दुनिया को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह गए हैं।

गरीब जनता पर जुल्म करने वाले जमींदारों और सूदखोर बाहुबलियों के खिलाफ तनकर खड़े हुए मास्साब की छवि गरीबों और मजलूमों के हक में आवाज उठाने वाली शख्सियत की बन गई। इसके बाद तराई के दबंग सूदखोर और जमींदारों के द्वारा मास्साब के खिलाफ साजिशें रची गई। उन्हें फर्जी मामलों में फंसाए जाने के षड्यंत्र किए जाने लगे। ऐसे में उनके साथ पूरा जनमानस खड़ा हो गया।

मास्साब तब तराई के आंदोलनकारी नेता के रूप में सामने आए। अध्यापक से आंदोलनकारी बनने का उनका यह संघर्षमय सफर चार दशक तक जारी रहा। संघर्ष में अनियमित जीवनचर्या के कारण वह कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आ गए। तीन साल तक कैंसर से जूझने के बाद अंततः वह 18 मार्च को जीवन की लड़ाई हार गए।

कभी बरेली में कचहरी के सामने सूरमा बेचने वाले प्रताप सिंह ने सोचा भी नहीं था कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने पर एक दिन उनका नाम माओवादियों की सूची में डाल दिया जाएगा। 11 नवंबर 2005 को उन्हें पुलिस ने माओवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। तब छह दिन तक परिजनों को पता ही नहीं चला था कि वह कहां और कौन सी जेल में हैं।

हालांकि बाद में पुलिस उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं कर सकी। इससे पहले 27 सितंबर 2005 को उनके पुत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह को भी उत्तराखण्ड पुलिस ने माओवादी बताकर गिरफ्तार कर लिया था। तब आंदोलनकारियों के बीच यह चर्चा जोर-शोर से चली थी कि पुलिस रूपेश को इन्काउंटर में मारने की योजना बना चुकी थी। प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के सख्त रुख अख्तियार करने पर पुलिस अपनी योजना में नाकाम रही। बाद में प्रताप सिंह ने अपनी सच्चाई एक बुक के जरिए प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने बताया कि क्यों पुलिस उनको तथा उनके परिवार को माओवादी सिद्ध करना चाहती है।

मास्टर प्रताप सिंह मूलतः बरेली के शाही निवासी हैं। 1977-78 में वह आरएसएस के संपर्क में आए और दो साल तक आचार्य रहे। वर्ष 1980-84 तक वह बरेली में शिशु मंदिर विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे। उसके बाद वह गदरपुर आ गए। 1984 से 89 तक गदरपुर में उन्होंने कई शिशु मंदिर स्कूलों की स्थापना की। इसी दौरान उन्होंने भारत समाजोत्थान समिति बनाई और मासिक पत्रिका ‘प्रेरणा अंशु’ की शुरुआत की।

1990 में उनका शिशु मंदिर आंवला ट्रांसफर हो गया, लेकिन वह वहां नहीं गए। तब उन्होंने दिनेशपुर में आश्रम पद्धति प्रणाली के आधार पर तीन झोपड़ियों में अपने एक स्कूल की स्थापना की। आठ बच्चों को वह अपने घर पर ही रखकर अध्ययन कराते थे। इस तरह महज 25 बच्चों से शुरू हुआ यह समाजोत्थान स्कूल आज सैकड़ों बच्चों को अध्ययन करा रहा है।

1991-92 में वह अपने घर में एक साइक्लो स्टाइल मशीन ले आए थे, जिससे वह डिबिया की रोशनी से ‘प्रहरी का पत्र’ नामक अखबार निकालते थे। दिन के उजाले में उस मशीन को जमीन में दबा दिया जाता था। वर्ष 1993 में उन्होंने आरएसएस छोड़ दी। इसके बाद वह सीपीएमएल पार्टी से जुड़कर राज्य आंदोलन की लड़ाई में जुट गए। इसी दौरान उन्होंने ‘जनमुक्ति पत्रिका’ भी निकाली।

1999 में उन्होंने सीपीएमएल छोड़ दी और जनहित रक्षा मंच में चले गए। भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने दिनेशपुर से शुरुआत की। यह वर्ष 1998 का मामला है जब दिनेशपुर के पार्क की जमीन पर सरकारी कार्यालय बना दिया गया था। मास्टर प्रताप सिंह ने इसके खिलाफ लोगों को एकजुट किया और रातोंरात सरकारी, बिल्डिंग के लिंटर को तोड़ डाला। बाद में सरकार को यह जगह पार्क के लिए आरक्षित करनी पड़ी।

दिनेशपुर में ही वर्ष 2001 में नगर पंचायत घोटाला हुआ, जिसमें उन्होंने धरना-प्रदर्शन किया। ग्यारह लोगों के साथ वह 18 दिन तक जेल में रहे। उनके साथ जेल गए लोगों में उनका बड़ा बेटा वीरेश कुमार भी शामिल रहा। जब तराई में विस्थापितों, खेतीहर किसानों और मजदूरों के साथ जुल्म किए जा रहे थे तो वह सूदखोरों और जमींदारों से लड़ते रहे। मजदूर-किसानों के हित में उन्होंने लोगों को संगठित किया और 2001 में मजदूर-किसान संघर्ष समिति का गठन किया।

2002 में पंतनगर स्थित सिडकुल की होंडा कंपनी के खिलाफ लंबा आंदोलन किया। यह कंपनी स्थानीय युवकों के बजाय बाहर के लोगों को भर्ती कर रही थी। महीनों तक चले इस आंदोलन के बाद कंपनी ने समिति से यह करार किया कि वह स्थानीय बेरोजगार युवकों को प्राथमिकता के आधार पर नौकरी देगी। बाद में मास्साब उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी से जुड़ गए।

पार्टी द्वारा नैनीसार में शुरू किए गए जमीन आंदोलन में वह बीमार होने के बावजूद भी शामिल होते रहे। यह उनकी जीजिविषा का ही आलम था कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारी हो जाने के बाद भी वह 2015 में उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी की यात्रा में शामिल हुए। 2016 में दिनेशपुर से ‘चलो कर ही डाले अभियान’ की शुरुआत की। वर्तमान में मास्साब पर नैनीसार और बल्ली सिंह चीमा के चुनावों के दौरान दर्ज हुए दो मामले चल रहे थे।

उत्तराखण्ड परिवर्तन पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी के अनुसार ‘हमने एक ऐसी जीवटता वाले आंदोनकारी व्यक्ति को खो दिया जो सदा ही आम जनता के लिए संघर्ष करते रहे। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी उनको जनसेवा से नहीं रोक पाई। अंत समय तक भी उनका ‘प्रेरणा अंशु’ में लेखन जारी रहा। उनके विचार आज भी हमारे बीच जिंदा हैं।’

मास्टर साहब के प्रति जनता के अपार स्नेह का अंदाजा इसी से लगया जा सकता है कि बड़ी संख्या में लोगों ने जन गीतों के साथ उनकी अंतिम यात्रा निकाली। मिथक को तोड़ते हुए पहली बार महिलाएं भी किसी अंतिम यात्रा में शामिल हुईं। उनकी बड़ी बहू बबीता रानी राठौड़ ने बेटी का फर्ज निभाते हुए मास्साब की अर्थी को कंधा दिया। (फोटो : मास्साहब प्रताप सिंह के साथ लेखक)

-आकाश नागर साप्ताहिक संडे पोस्ट में रोमिग एडिटर हैं

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