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दिल्ली दंगे में अब तक 2647 लोग गिरफ्तार, दर्ज हुए 700 से भी ज्यादा मुकदमे

Janjwar Team
12 March 2020 3:30 AM GMT
दिल्ली दंगे में अब तक 2647 लोग गिरफ्तार, दर्ज हुए 700 से भी ज्यादा मुकदमे
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पूर्वी दिल्ली नगर निगम सूचना निदेशक अरुण सिंह ने बताया कि दंगा प्रभावित इलाकों की सड़कों और गलियों से उठाएगा। ईंट, पत्थर और रोड़ों का इस्तेमाल इंटर लॉकिंग टाइल्स बनाने में किया जाएगा...

मोहम्मद जावेद अलिग की रिपोर्ट

जनज्वार। संशोधित नागरिकता कानून CAA के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान उत्तर पूर्वी दिल्ली में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के मामले में दिल्ली ने पुलिस ने लगभग 700 मुकदमे दर्ज किए हैं जिसमे 49 मुकदमे सशस्त्र कानून के तहत दर्ज किए गए हैं। दिल्ली पुलिस अबतक 2647 लोगों को पकड़ चुकी है। प्रदेश सरकार के मुताबिक दिल्ली में पिछले हफ्ते 24 फरवरी को शुरू होकर 26 फरवरी तक चले इन दंगों में 53 लोगों की जान गयी, जबकि 56 पुलिस कर्मियों के अलावा 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे।

लोकसभा में दिल्ली हिंसा पर जानकारी देते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अब तक इस मामले में 700 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की गयी हैं और 2647 लोगों को हिरासत में लिया गया है।

इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली हिंसा सुनियोजित था, जबकि विपक्ष भी ठीक ऐसी ही बात कहता है। विपक्ष जिसमें कांग्रेस, आप और कुछ अन्य दल शामिल हैं वो भी यही आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा की अगुवाई में इस दंगे को सुनियोजित तौर पर अंजाम दिया गया था। अब अमित शाह कह रहे हैं कि विपक्ष द्वारा रची गये गये इस सुनियोजित षड्यंत्र में किसी को बख्शा नहीं जायेगा, फिर चाहे वह किसी भी दल, जाति या पार्टी से जुड़ा हो।

सके अलावा इलाके के सैकड़ों लोगों को विस्थापित होना पड़ा और कई के रोजगार के साधनों को सुनियोजित तरीके से बर्बाद कर दिया गया। इस हिंसा में हेड कांस्टेबल रतन लाल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के अफसर अंकित शर्मा की भी मौत हो गई। उत्तर पूर्वी दिल्ली ने पिछले हफ्ते जो मंज़र देखा वह शायद दिल्ली ने पिछले तीन दशकों में नहीं देखा था। दिल्ली ने ऐसी हिंसा कभी नहीं देखी थी जो पिछले हफ्ते हुई जिसमे क्या बड़े, क्या बुज़ुर्ग, क्या हिंदू, क्या मुसलमान? दंगो ने ना जाति देखी ना धर्म, ना पुलिसवालों को छोड़ा, न आम आदमी को। जो सामने आया वही दंगों की आग में झुलस गया।

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दंगाइयों की दरिंदगी ने ना तो गर्भवती महिलाओं को बख़्शा और ना दूध पीते बच्चों पर तरस खाया, जो भी दिखा वह दंगाइयों की नफ़रत का शिकार हो गया। उत्तर पूर्वी दिल्ली में हिंसा के दौरान जब लोगों को मदद कीसबसे ज्यादा ज़रुरत थी तब पुलिस ने उनका साथ नहीं दिया। मदद के लिए लोग इमरजेंसी नंबर डायल करते रहे लेकिन पुलिस की तरफ से मदद नहीं मिल सकी, पुलिस का यह रवैय्या 48 से 72 घंटे तक जारी रहा।

स्थानीय लोगों के अनुसार दिल्ली पुलिस हिंसा ग्रस्त इलाकों में लोगों के साथ बैठकें आयोजित कर माहौल को ठीक करने की कोशिश कर रही है लेकिन स्थानीय लोगों का सवाल ये है कि ये कोशिश पहले क्यों नही की गई। पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि उत्तर पूर्वी दिल्ली के हिंसाग्रस्त इलाकों में उन्होंने अमन समिति के साथ 283 बैठकें आयोजित की हैं। दंगा रोकने के सन्दर्भ में पुलिस और सरकार के सुस्त रवैय्ये को देखते हुए उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा कर चुके नागरिक अधिकार और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने 'द रोल ऑफ हेल्थ सिस्टम्स इन रिस्पोंडिंग टू कम्युनल वॉयलेंस इन डेल्ही’ नाम की एक रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट हिंसा के दौरान और बाद में हुई जान एवं माल की हानि को रोकने में असफल रहने पर केंद्र और दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराती। जनस्वास्थ्य अभियान (जेएसए) नाम की एक संस्था ने रिपोर्ट जारी कर कहा कि दिल्ली सरकार पीड़ितों को उचित इलाज मुहैया कराने में असफल रही है और हिंसा के दौरान और बाद में जिस समय घायलों को मेडिकल उपचार की सबसे ज्यादा जरूरत थी, उस समय सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की रफ्तार धीमी थी या ठप पड़ी हुई थीं।

रिपोर्ट ने 24 फरवरी 2020 को हिंसा भड़कने से लेकर अब तक उत्तर पूर्वी दिल्ली के कई दंगाग्रस्त इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की पड़ताल की और प्रशासन की नाकामी बताया। जेएसएके वॉलिंटियर्स 25 फरवरी से दंगा ग्रस्त इलाकों में बने रहे और उन्होंने पीड़ितों एवं उनके परिवारवालों से बातचीतकर उनके अनुभवों को इकट्ठा किया। रिपोर्ट के अनुसार हिंसा के दौरान और बाद में पीड़ितों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बनाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा और ‘हिंसा के दौरान और बाद में मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेल चुके पीड़ितों के लिए खस्ताहालत सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं एक और ट्रॉमा बन गई।’

रिपोर्ट बताती है कि उत्तरपूर्वी दिल्ली के जीटीबी अस्पताल और सेंट्रल दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती घायलों को उचित इलाज मुहैया नहीं कराया गया। दंगों का दर्द बयान करते हुए शिव बिहार इलाके के कुछ लोगों का कहना है कि यहां अब दो हफ्ते बाद भी हालात सामान्य नहीं हैं उन्हें दिन ढलते ही दंगे होने का डर सताने लगता है कि कहीं हिंसा का वह खौफनाक मंज़र फिर से न दोहरा दिया जाए। शिव विहार इलाके के अलअमीन कहते हैं कि हमे रातभर जागना पढता है ताकि हमारा परिवार चैन से सो सके।

मीरुल हसन नाम का शख्स अपने परिवार के साथ अब से दो हफ्ते पहले शिव विहार के फेज-7 में अपने दो मंजिला घर में रहता था जो हिंसा में दंगों की भेंट चढ़ गया। उसने बताया कि इलाके की कई संपत्तियों को आग के हवाले किए जाने से पहले लूटा गया और तोड़ दिया गया। उसका कहना है कि हिंसा से प्रभावित लोगों ने या तो सरकार के राहत शिविरों में शरण ली है या अपने रिश्तेदारों के घर चले गए। ये लोग हर सुबह नुकसान के आकलन के लिए यहां आते हैं और शाम होते ही अपने अस्थायी घरों को लौट जाते हैं।

मोहम्मद नबी की दो मंजिला इमारत को भी जलाकर खाक कर दिया गया, उसकी तीन बाइकों को आग के हवाले दिया गया, ऊपर की मंजिल पर सिलेंडरों में विस्फोट किया गया जिससे तीन में से दो कमरों की छत ढह गई। उनकी तीन बकरियों को चुरा लिया गया। गयूर ने कहा कि हम सदमे में थे। इसलिए जब पुलिस 26 फरवरी की सुबह हमें निकालने आई, हम तुरंत चल दिए। मैंने अपनी चप्पलें भी नहीं पहनी। मैं इतना डरा हुआ था। जब हम अगली दोपहर लौटे तो सबकुछ बर्बाद हो गया था। उन्होंने कहा कि हमें नहीं पता हम कबतक लौटेंगे। हमें अपनी सामान्य जिंदगी जीने में कम से कम तीन से चार साल लग जाएंगे।

दंगा ग्रस्त इलाकों में काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था 'लॉयर इन एक्शन' ने आज अपने अन्य कार्यकर्ताओं के साथ हिंसाग्रस्त क्षेत्र का दौरा कर पाया कि सरकार की तरफ से अभी उन तक कोई नहीं पहुंचा है। उन्हें दिल्ली सरकार द्वारा घोषित किए गए मुआवजे के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

के सामने एक भयानक पहलू यह निकलकर आया कि जब हमने पीड़ितों से पूछा कि क्या उन्होंने मुआवजे के फॉर्मभर दिए हैं तो उन्होंने कहा कि उन्होंने फॉर्म नहीं भरे हैं कि क्योंकि उन्हें डर है कि फॉर्म भरने के लिए उनकी निजी जानकारियों को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

शिव विहार के स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के मुताबिक़ शिव विहार में अपने घर जल जाने की वजह से लगभग 1,000 लोग चमन पार्क में विस्थापित हुए हैं। लोगों का कहना है कि दिल्ली सरकार को अपने अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों को प्रभावित इलाकों में हमारे बीच भेजकर विश्वास की बहाली करे और मुआवजे की प्रक्रिया को सरल बनाये।

स सन्दर्भ में पचास वर्षीय मोबीन बेगम का कहना है हम मुआवजे के लिए कोई फॉर्म नहीं भरेंगे, क्योंकि फॉर्म भरने से उनकी निजी जानकारी सरकार एनपीआर की प्रक्रिया में इस्तेमाल कर लेगी। दंगा ग्रस्त इलाकों में राहत सामग्री पहुंचा रहे लोगों का कहना है कि हम भजनपुरा गए, जहां हमने देखा कि मुस्लिमों के घर जला दिए गए हैं और शिव विहार के इलाके में हमने पाया कि जिन भी दुकानों पर जय श्रीराम लिखा था, उन्हें बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचाया गया।

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हरहाल, उत्तरपूर्वी दिल्ली नगर निगम ने दंगा प्रभावित क्षेत्रों में अभियान शुरू कर करीब सात लाख किलो (लगभग 700 टन) ईंट, पत्थर और रोड़े एकत्रित किए। ये अभियान सोमवार को दंगा प्रभावित इलाकों में शरू किया गया जो गुरुवार को पूरा हो गया।

पूर्वी दिल्ली नगर निगम सूचना निदेशक अरुण सिंह ने बताया कि दंगा प्रभावित इलाकों की सड़कों और गलियों से उठाएगा। ईंट, पत्थर और रोड़ों का इस्तेमाल इंटर लॉकिंग टाइल्स बनाने में किया जाएगा। दंगे में इस्तेमाल किए गए ईंट-पत्थरों को शास्त्री पार्क स्थित प्लांट में तोड़ा जाएगा। आपको बता दें कि इंटर लॉकिंग टाइल्स बनाने में रेत, पत्थर और सीमेंट आदि का प्रयोग किया जाता है।

चार दिन तक चले इस अभियान में लगभग 200 ऑटो, 80 मिनी ट्रक और 500 कर्मचारियों को लगाया गया था। इसके अलावा पूर्वी दिल्ली नगर निगम के शाहदरा उत्तरी जोन के कर्मचारियों ने दंगा प्रभावित क्षेत्रों से जली हुईं 424 कार और 32 छोटे वाहन जब्त किए हैं। जले वाहनों को संबंधित क्षेत्र के थानों में जमा कराया गया है।

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