संस्कृति

नहीं रहे वरिष्ठ लेखक राधेश्याम तिवारी

Janjwar Team
1 Oct 2017 10:17 AM GMT
नहीं रहे वरिष्ठ लेखक राधेश्याम तिवारी
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जनज्वार। वरिष्ठ कहानीकार, पत्रकार और रंगकर्मी रहे राधेश्‍याम तिवारी आज एक अक्तूबर, 2017 की सुबह जयपुर के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से बीमार थे। 72 वर्षीय तिवारी जी का जन्म बिहार में हुआ था। उनके लेख, कहानियां और अन्य तरह की रचनाएं देश के जाने—माने पत्र—पत्रिकाओं में छपी हैं।

कई अखबारों, मैगजीनों में संपादकीय सलाहकार रहे तिवारी जी राजस्थान क्रिकेट बोर्ड में मीडिया मैनेजर भी रहे। उनके लिखे नाटकों को न सिर्फ सराहा गया, बल्कि कई बड़े मंचों पर उनका मंचन भी हुआ। राजनीति, कला और फिल्मों पर उन्होंने काफी कलम चलाई है।

इस बहुआयामी व्यक्तित्व के निधन पर लेखिका इरा टाक लिखती हैं, राधेश्याम तिवारी जी के चले जाने की खबर व्यथित करती है। वे एक नामी पत्रकार, साहित्यकार और कला समीक्षक थे. पिछले दिनों जब जयपुर जाना हुआ तब वे अस्पताल के ICU में एडमिट थे. उम्मीद थी कि वापस आयेंगे और उनके साथ कॉफ़ी पीना होगा. बहुत अनुभवी और ज्ञानी थे, उनकी राय हमेशा कीमती थी। जब भी मिलते यही कहते- "मैंने जीवन में केवल दो डायरेक्टर्स के साथ काम किया एक तो "मृणाल सेन" और दूसरी इरा टाक." मृणाल सेन वाली फिल्म अधूरी रह गयी थी.उनका स्नेह शब्दों में नहीं लिखा जा सकता... सर आपको कभी नहीं भूल पाएंगे, एक आखिरी बार आपके साथ कॉफ़ी रह गयी!'

राधेश्याम तिवारी जी जनज्वार के शुभचिंतक रहे हैं। अक्सर जनज्वार पर प्रकाशित होने वाली खबरों को लेकर सुझाव देते रहते थे। तिवारी जी सोशल मीडिया पर भी खासे सक्रिय रहते थे।

तिवारी जी को श्रद्धांजलि देते हुए ईश मधु तलवार लिखते हैं, 'राधेश्याम तिवारी नाम का यह शख्स आज दुनिया छोड़ कर चला गया। जवाहर कला केंद्र आज बहुत उदास होगा। तीन-चार दिन पहले मैं और मित्र फ़ारूक़ आफ़रीदी उनसे मिलने अस्पताल गए थे, लेकिन बाहर बैठे गार्ड ने मिन्नतें करने के बाद भी "यह मिलने का समय नहीं है" कहते हुए नहीं मिलने दिया। उनसे "मिलने का समय" अब कभी नहीं आएगा, लेकिन यादों में वे मिलते रहेंगे।'

लेखक हृषिकेश शुलभ उन्हें याद करते हुए कहते हैं, राधेश्याम तिवारी उन लोगों में शामिल थे, जिन्होंने अपने रंगकर्म से पटना और बिहार को रंगमंच की आधुनिकता से परिचित करवाया था। उन्होंने सन् 1970 में "अरंग" नामक संस्था बनाई और 'तीन अपाहिज', 'कूड़े का पीपा' तथा 'वह एक कुरूप ईश्वर' जैसे असंगत नाटकों का मंचन किया।'

उनके निधन पर दुख जताते हुए लेखक कुमार मुकुल लिखते हैं, वे हम सब लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों के हरदिल अजीज कथाकार, पत्रकार रहे हैं।

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