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चुनावी पड़ताल 2019

नारकीय स्थितियों में जी रहा आदिवासी पहाड़िया समुदाय क्यों नहीं बन पाया झारखंड में चुनावी मुद्दा

Nirmal kant
21 Dec 2019 12:33 PM GMT
नारकीय स्थितियों में जी रहा आदिवासी पहाड़िया समुदाय क्यों नहीं बन पाया झारखंड में चुनावी मुद्दा

पूरे राज्य में रोजी-रोजगार से जुड़े मसले लोगों की समस्याओं के केंद्र में रहे हैं। इसके अलावा पलायन भी राज्य की एक बड़ी समस्या है। झारखंड की बड़ी आबादी खेती करती है और बारिश पर निर्भर है..

अनिमेष बागची की रिपोर्ट

जनज्वार। झारखंड में आदिवासियों की तादाद 26 फीसदी के आसपास है। राज्य की पहचान एक गरीब सूबे के तौर पर रही है। इस गरीब सूबे में संपन्न हुए हालिया पांच चरणों के विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों द्वारा नामांकन के वक्त दायर शपथ पत्रों पर नजर दौड़ायी जाए तो कई हैरतअंगेज जानकारियां प्राप्त होती हैं। पूरे राज्य में इन चुनावों में 1216 प्रत्याशी खड़े हुए हैं। इनमें से 293 प्रत्याशी करोड़पति हैं। यह आंकड़ा चुनावी मैदान में खड़े उम्मीदवारों का तकरीबन 24 फीसदी ठहरता है।

बसे ज्यादा करोड़पति तो सत्ताधारी भाजपा के ही टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि राज्य की ज्यादातर सीटों पर जनमानस के लिए अहम कई मसलों पर उम्मीदवारों ने या तो मुंह ही नहीं खोला अथवा उन्हें अहमियत देने के मूड में नहीं दिखे। चुनावी मसालों और जुमलों का इस्तेमाल भी कई विधानसभा क्षेत्रों में जोरों से हुआ। आम लोगों से जुड़े मसले हाशिए पर रहे।

राज्य के संथालपरगना क्षेत्र को काफी पिछड़ा और गरीब माना जाता है। सूबे में अंतिम चरण के चुनाव यहीं संपन्न हुए। राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों का क्षेत्र यहीं है, इसीलिए राजनीतिक दलों के लिए यहां की अहमियत कोई छिपी-छिपायी बात नहीं है। ऐसे में तमाम राजनीतिक दलों ने यहां ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो हर प्रकार से उनके दलों के हितों को साधने में मददगार हो सके। आश्चर्य नहीं कि यहां 50 से भी ज्यादा करोड़पति उम्मीदवार चुनावी मैदान में नजर आये। यहां तक कि राज्य के तीन सबसे धनी प्रत्याशियों में दो प्रत्याशी तो संथाल के ही हैं।

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समें जरमुंडी से लोजपा उम्मीदवार बीरेंद्र प्रधान (घोषित संपत्ति 37 करोड़) और पाकुड़ से आजसू के अकील अख्तर (घोषित संपत्ति 36 करोड़) शामिल हैं। इसके अलावा यहां से 58 दागी उम्मीदवारों को भी विभिन्न दलों ने चुनाव में उतारा। उम्मीदवारों के बीच षह और मात के खेल में चुनाव में शुचिता और पारदर्शिता जैसे मुद्दे मीलों पीछे छूटते दिखायी दिये। और तो और, आपस में दलों के दरम्यान हुए जुबानी जंग ने भी रोजमर्रा से जुड़े कई अहम मसलों को दरकिनार करने में अहम भूमिका निभायी।

राज्य में रोजी-रोजगार से जुड़े मसले लोगों की समस्याओं के केंद्र में रहे हैं। इसके अलावा पलायन भी राज्य की एक बड़ी समस्या है। झारखंड की बड़ी आबादी खेती करती है और बारिष पर निर्भर है। ऐसे में अतिवृष्टि और अनावृष्टि की समस्या से राज्य में खेती-किसानी करने वाले लोग तकरीबन हरेक वर्ष प्रभावित होते रहे हैं। राज्य के आधिकारिक और गैर-सरकारी आंकड़े यह बात बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पलायन की समस्या सिर्फ सूबे के पुरुषों में ही नहीं, बल्कि गरीब परिवार की बहन-बेटियों की भी है। राज्य की बहू-बेटियां जब बाहर जाती है, तो उनका कई तरह से शोषण किया जाता है। अक्सर इस बात का शोर मचाने वाले राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा चुनाव में कोहराम नहीं मचा सका। शायद झारखंड अब ऐसी चीजों का आदी हो चुका है।

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स बार राज्य में घर-घर रघुवर का नारा बुलंद करने वाले मुख्यमंत्री रघुवर दास को भी चुनावी माजरा भांपते हुए अंततोगत्वा अपनी सभाओं में बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भुनाना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, स्मृति ईरानी और जेपी नड्डा जैसे नेताओं ने भी धुंआधार प्रचार करने में कोई कोताही नहीं बरती। विपक्षी दल तो यह प्रचार करने से भी नहीं चूका कि केंद्र सरकार ने समूचा कैबिनेट ही राज्य के चुनाव प्रचार में उतार दिया है। कहीं गगनचुंबी राम मंदिर के निर्माण के वायदे करते नेता दिखायी दिये, तो कहीं धारा 370 और ट्रिपल तलाक जैसे मसलों पर दहाड़ते नेताओं ने पब्लिक को उद्वेलित करने में अपना ज्यादातर वक्त लगाया। आजसू और झाविमो जैसे क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने जरूर अपनी ज्यादातर सभाओं में स्थानीय मुद्दों का सहारा लेना जरुरी समझा।

के राजनीतिक गलियारे में इस बात की चर्चा है कि राज्य की महत्वपूर्ण सीटों में एक रांची विधानसभा सीट पर इस बार वरिष्ठ भाजपाई नेता सीपी सिंह को कई स्तरों पर जबर्दस्त चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। इस बार महागठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर झामुमो नेत्री महुआ माजी ने उनको कड़ी टक्कर दी है। भाजपा का गढ़ माने जाने वाले इस क्षेत्र में महुआ को झामुमो और कांग्रेस के एकजुट वोटों पर भरोसा है। महुआ ने इस बार स्थानीय मुद्दों को खूब उछाला। सीपी सिंह के खिलाफ चेंबर आफ काॅमर्स के पवन शर्मा भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे और स्थानीय मुद्दों को खूब भंजाया। रांची में फ्लाईओवर के मसले पर सीपी सिंह को अतीत में कई दफे अपने कोर वोटरों के गुस्से का भी सामना करना पड़ा है। हालांकि यहां भी भाजपा ने नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा लिया और राष्ट्रीय मुद्दे खूब उछाले गये।

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संथाल में NRC और CAB, CAA जैसे मसलों पर खूब राजनीति हुई। यह मामला इसलिए भी सुर्खियों में रहा, चूंकि संथाल के कई इलाकों में मुस्लिम आबादी ज्यादा है। पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे जिले भी हैं। राज्य में भाजपा काफी पहले से ही यहां विदेषी घुसपैठियों के विषय को उठाती आयी है। दूसरी ओर कई दल इसके विरोध में खड़े रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए वोटों की अच्छी जमीन यहां बन पायी। ओवैसी जैसे नेताओं की पहली बार राज्य में एंट्री भी हुई और पार्टी को खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में मुस्लिमों से संबंधित और राष्ट्रीय मुद्दे उठाकर अच्छी-खासी भीड़ को इकट्ठा करने में कामयाबी जरुर मिली।

लाके में पहाड़िया समुदाय की नारकीय स्थिति किसी से छिपी नहीं है। इस समुदाय के लोग काफी गरीबी की जिंदगी बसर करते है और इनकी रोजी-रोटी पर संकट आज भी बरकरार है। कभी संथाल पर राज करने वाले पहाड़िया समुदाय की आवाज इस बार भी चुनाव में रौनक न ला सकी। इस समुदाय से आजादी के बाद आज तक अविभाजित बिहार या बाद में बने झारखंड में किसी भी उम्मीदवार को विधानसभा तक पहुंचने का अवसर नहीं मिला है। इस बार भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ बरहेट से सिमोन मालतो को उतारा है। सिमोन पहाड़िया जनजाति से आते हैं। अगर सिमोन जीत जाते हैं, तो वे इस समुदाय से विधानसभा के गलियारे तक पहुंचने वाले पहले नेता बनेंगे।

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