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प्रदूषण रोकने का सिर्फ एक उपाय, एक घर एक गाड़ी का नियम हो लागू

Janjwar Team
16 Nov 2017 10:54 AM GMT
प्रदूषण रोकने का सिर्फ एक उपाय, एक घर एक गाड़ी का नियम हो लागू
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दिल्ली में अबतक सबसे ज्यादा पेड़ ट्रांसपोर्ट सुविधाओं के लिए काटे गए, हर साल हजारों पेड़ कारों का जाम कम करने के लिए काटे जाते हैं

प्रदूषण पर टोटका कर रही सरकारें पब्लिक ट्रांसपोर्ट के मसले पर जुबानी जंग से कभी आगे नहीं जा पातीं और न ही प्राइवेट कारों पर कोई सख्ती कर पातीं हैं

आखिर एक घर एक गाड़ी का नियम लागू करने से क्यों डर रही है सरकारें? एक रजिस्टर्ड घर या फ्लैट पर एक गाड़ी होने का नियम लागू करने की हिम्मत कभी दिखा पाएंगी सरकारें

केजरीवाल खट्टर से प्रदूषण के मसले पर मिल लिए, 'राइट टू ब्रीथ' को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन भी हो गया, सरकार कृत्रिम बारिश करवा ही रही है, लेकिन गाड़ियों पर सरकार जुबान खोलने की हिम्मत नहीं कर पा रही है, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को लेकर सिर्फ बातें बनाई जा रही हैं

जनज्वार, दिल्ली। दिल्ली सरकार से लेकर जन—जन तक जानता है कि जब तक दिल्ली में गाड़ियां नहीं कम होंगी, या उनके इस्तेमाल पर कोई तार्किक प्रतिबंध नहीं लगेगा तब तक चाहे सरकार जितने जतन कर ले और समाज चाहे जितने प्रदर्शन कर ले दिल्ली के प्रदूषण पर कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है।

दिल्ली के 'बात बहादुर' मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 829 करोड़ के ग्रीन फंड पर कुंडली मारे बैठे हैं। यह हाल आम आदमी सरकार का तब है, जबकि 829 करोड़ का बजट एनवायरमेंट कंपनशेसन चार्ज के रूप में दिल्ली के पास जमा है। यह जानकारी संजीव जैन द्वारा दाखिल की गई आरटीआई से प्राप्त हुई है। इतना पैसा दिल्ली सरकार के पास सिर्फ पर्यावरण संरक्षण के फंड में होने के बावजूद पब्लिक ट्रांसपोट के लिए वह कोई ठोस सकारात्मक पहल नहीं ले पा रही है।

दिल्ली में 2016 में मात्र एक साल के अंदर 9 लाख नई गाड़ियां रजिस्टर हुईं थीं, जबकि पहले से ही यहां 88 लाख रजिस्टर्ड वाहन थे। अब दिल्ली में लगभग हर आदमी पर एक गाड़ी है। आने वाले समय में अगर सरकार ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया तो हालात और बिगड़ेंगे। इन हालातों में बीएस—6 ईंधन भी बढ़ते प्रदूषण को घटाने में कारगर सिद्ध होगा, इसकी उम्मीद न के बराबर है।

कितना घातक है कि मात्र एक कार सालभर में तकरीबन 4.7 टन कार्बन डाई ऑक्साइड बनाती है, जबकि एक पेड़ एक वर्ष में 0.024 टन कार्बन डाई ऑक्साइड अपने में सोख पाता है। वूड्स होल रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक दस सालों में निकलने वाली प्रदूषित हवा यानी 100 अरब टन प्रदूषित कार्बन को पेड़ों से रोका जा सकता था।

यानी दिल्ली का प्रदूषण कम करने के लिए इसे हरा—भरा बनाया जाना तो जरूरी है ही, साथ ही सड़कों से भारी तादाद में कारों को भी कम किया जाना चाहिए।

पर यह उपाय किसी को नहीं भाता क्योंकि इसमें सरकार और समाज दोनों को ठोस पहल लेनी होगी। सरकार पहल क्या ले रही है उसे भी देखिए। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने दिल्ली में ऑटो ईंधन से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए बीएस-6 ईंधन की बिक्री शुरू करने की घोषणा जरूर की है, जो दिल्ली वालों को अप्रैल 2018 से पेट्रोल पंपों पर मिलना शुरू हो जाएगा, जबकि एनसीआर में अप्रैल 2019 से बीएस—6 ईंधन मिलने की घोषणा की गई है।

मतलब है साफ है कि सरकार प्रदूषण दूर करने की पहल नहीं ले रही हैं, बल्कि प्रदूषण कम करने वाले यंत्रों—संयंत्रों का नया बाजार बना रही है। वह प्रदूषण दूर करने के सामान्य और आसान उपायों पर कत्तई काम नहीं करना चाहती बल्कि उसका मतलब उन उपायों से है जिसमें जनता के धन का दोहन हो और लोग प्रदूषण कम करने के नए बाजार में खड़े हो जाएं, जो लोग पहले प्रदूषण बढ़ाने के ग्राहक बने थे वे लोग अब कम करने के नए ग्राहक बन जाएं।

कमोबेश सरकार इसी को विकास कहती है, एक जहर की जगह दूसरे जहर का जनता को इंजेक्शन लगाना ही सरकार के विकास की रवायत बन गयी है।

दिल्ली—एनसीआर से लगातार पेड़—पौधों की संख्या कम हो रही है। 10 अप्रैल, 2014 को राज्यसभा में एक लिखित जवाब में तत्कालीन पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे ने जानकारी दी थी कि 2014 से विकास के लिए दिल्ली में 15 हजार पेड़ काटे गए हैं। इसमें उन 1700 पेड़ों को शामिल नहीं किया गया है, जिन्हें प्रगति मैदान में नया हॉल बनाने के लिए खत्म किया गया था। इससे पहले एक लाख पेड़ मेट्रो की भेंट चढ़ चुके थे। साथ ही यह भी कहा था कि साल के आखिर तक विकास के लिए एक लाख 86 हजार पेड़ और काटे जा चुके होंगे।'

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