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बिहार में नीतीशे कुमार : 'खूंटा गाड़ राजनीति' करने से लेकर 'नहीं बनना चाहता हूं सीएम तक' का सफर

Janjwar Desk
16 Nov 2020 8:43 AM GMT
बिहार में नीतीशे कुमार : खूंटा गाड़ राजनीति करने से लेकर नहीं बनना चाहता हूं सीएम तक का सफर
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राजनीति में जिस तरह न कोई स्थायी दोस्त व दुश्मन होता है, उसी तरह राजनेताओं द्वारा दिए गए बड़े राजनीतिक बयान भी भीष्म प्रतिज्ञा नहीं होते। नीतीश कुमार अपने लंबे राजनीतिक पारी में कई बार अपने पुराने बयानों से पलटते और नए तर्क गढते दिखे हैं...

जनज्वार। नीतीश कुमार (Nitish Kumar) बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सातवीं बार सोमवार की शाम शपथ लेंगे। ऐसा कर वे देश के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो जाएंगे जिन्होंनेे इतनी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और जिनका इतना लंबा कार्यकाल रहा हो। नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अगर अपना यह टर्म पूरा करते हैं तो 20 साल तक उनका नेतृत्व बिहार को मिल जाएगा, इसमें जीतन राम मांझी के नौ महीने का शासन एक अपवाद है जिन्हें नीतीश ने 2014 में अपनी प्रतिछाया मान कर मुख्यमंत्री पद के लिए चुना था। हालांकि जैसा होता रहा है, पद पर बैठने के साथ ही मांझी की महात्वकांक्षाएं परवान चढ गईं और उन्होंने नीतीश विरोधी तेवर अपना लिया। परिणामतः नीतीश उन्हें बेदखल कर फिर सीएम बन गए।

नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने पहली बार तीन मार्च 2000 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 10 नवंबर 2000 को मात्र एक सप्ताह में राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। उस वक्त केंद्र में वाजपेयी सरकार थी और बिहार विधानसभा चुनाव में लालू-राबड़ी की अगुवाई वाले राजद व नीतीश कुमार की अगुवाई वाले एनडीए को स्पष्ट बहुमत नहीं आया था। गवर्नर ने ऐसे में नीतीश कुमार को सरकार बनाने का न्यौता दिया और नीतीश ने शपथ ग्रहण भी किया लेकिन बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं जुटा पाने के कारण उन्होंने विधानसभा में शक्ति परीक्षण से पहले ही राजभवन जाकर अपना इस्तीफा दे दिया।


उस वक्त अविभाजित बिहार था, यानी झारखंड का गठन नहीं हुआ था। हालांकि उसी साल के आखिरी महीनों में झारखंड अस्तित्व में आ गया। नीतीश कुमार केंद्र के रेल मंत्री पद को छोड़ बिहार की राजनीति में सक्रिय हुए थे। मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार ने अपने पहले इस्तीफे के बाद तब बयान दिया था कि वे अब बिहार में खूंटा गाड़ कर राजनीति करेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और महज दो महीने बाद ही वे केंद्र की सरकार में एक बार फिर शामिल हो गए और वाजपेयी ने उन्हें इस बार कृषि मंत्री बनाया, हालांकि कुछ महीनों बाद फिर वे रेल मंत्रालय में भेज दिए गए। तब भी विपक्ष ने पूछा था कि खूंटा गाड़ राजनीति के वादे का क्या हुआ?

2000 के चुनाव में भी भाजपा बड़ी पार्टी थी और समता पार्टी को उससे कम सीटें आयी थीं। अविभाजित बिहार होने के कारण उस समय 324 विधानसभा सीटें थीं, जिसमें राजद ने 124 सीटें जीती थी, जबकि भाजपा ने 67 व जार्ज, नीतीश व दिग्विजय सिंह की समता पार्टी ने 34 सीटें। वहीं, कांग्रेस को 23 सीटें मिली थीं।

नीतीश कुमार फिर नवंबर 2005 में एनडीए को स्पष्ट को बहुमत मिलने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री बने और तब से एक तरह से उनके हाथ बिहार की कमान है। नीतीश कुमार ने अपने लंबे समय के शासन में बिहार की राजनीति में और शासन में कई प्रयोग किए, जिसके लिए उनकी तारीफ भी होती रही है और उनके विरोधी कई मुद्दों पर उनकी आलोचना भी करती रही हैं।

नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन में एक अहम मोड़ 2013 में तब आया जब भाजपा ने अपने गोवा अधिवेशन में पहले नरेंद्र मोदी को लोकसभा चुनाव कैंपन का प्रमुख और बाद में फिर प्रधानमंत्री उम्मीदवार चुन लिया। नीतीश कुमार ही वो नेता था जिन्होंने बिहार में चुनाव प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी के आने पर रोक लगवा रखी थी और भाजपा हाइकमान को यह स्पष्ट संदेश था कि गुजरात के मुख्यमंत्री की बिहार में कोई जरूरत नहीं है।

अब जब भाजपा का नेतृत्व ही मोदी के हाथों में जाने लगा और वे उसके प्रमुख चेहरा बन गए तो नीतीश कुमार ने शरद यादव के साथ ऐतिहासिक प्रेस कान्फ्रेंस कर यह ऐलान कर दिया कि अब इस भाजपा से उनका साथ नहीं निभ सकता है, उनका साथ तो वाजपेयी-आडवाणी की भाजपा के साथ था। इसके बाद उन्होंने राजद के साथ सरकार चलायी और 2015 का चुनाव लड़ा। आज भी नीतीश कुमार के विरोधी उन पर यह तंज कसते हैं कि जिन नरेंद्र मोदी को लेकर उन्होंने कहा था कि मिट्टी में मिल जाऊंगा लेकिन एनडीए में नहीं जाऊंगा उनके साथ ही कैसे और क्यों हो गए।


2017 के जुलाई के आखिरी दिनों में तेजस्वी यादव पर भ्रष्टाचार के लग रहे आरोपों के बीच उन्होंने राजद का साथ छोड़ कर नरेंद्र मोदी-अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा के साथ सरकार बना ली। नीतीश ने जब जदयू-राजद-कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में अपना इस्तीफा दिया था तो उनका एक और बयान बहुत चर्चित हुए था कि कफन में जेब नहीं होती। उनका इशारा तेजस्वी यादव व लालू परिवार की ओर था कि भ्रष्टाचार का पैसा लेकर कहां जाएंगे। नीतीश के इस्तीफे पर तब प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी तारीफ में ट्वीट किया और नीतीश ने विनम्रता से आभार जताया।

इस बार भी जब जदयू 43 सीटों पर सीमित हो गया और भाजपा ताकतवर स्थिति में आ गई तो नीतीश दो दिनों तक चुप रहे और जब भाजपा मुख्यालय में पीएम मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं व देश के सामने यह स्पष्ट कर दिया तो कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही बिहार में संकल्प सिद्ध करेंगे तो दूसरी बार नीतीश ने पीएम मोदी से मिल रहे सहयोग पर विनम्रता पूर्वक आभार जताया।


फिर जब एक अणे मार्ग पर केंद्रीय पर्यवेक्षक राजनाथ सिंह की मौजूदगी में रविवार को एनडीए विधायकों की बैठक हुई तो मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नीतीश कुमार ने विधायकों को संबोधित करते हुए एक बार फिर कहा कि मुख्यमंत्री तो बनना नहीं चाहता था, लेकिन आपलोगों के आग्रह पर बन रहा हूं। इससे पहले पांच नवंबर को बिहार चुनाव प्रचार के आखिरी दिन पूर्णिया में नीतीश बाबू ने कहा था कि यह उनका आखिरी चुनाव है। संभव है अगला विधानसभा चुनाव आते-आते इसमें भी एक करेक्शन हो जाए, जिसका उनकी पार्टी के नेताओं ने पहले ही यह कह कर संकेत दिया है कि उन्होंने चुनाव का आखिरी चरण व प्रचार का आखिरी दिन होने की बात की थी न कि राजनीतिक संन्यास की।

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