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मां ने चूड़ियां बेच संघर्षों से जिस बेटे को बनाया आईएएस, वह बना गरीब-बेसहारा बच्चों का सहारा

Janjwar Desk
28 Jun 2020 4:22 PM GMT
मां ने चूड़ियां बेच संघर्षों से जिस बेटे को बनाया आईएएस, वह बना गरीब-बेसहारा बच्चों का सहारा
अनाथ-बेसहारा बच्चों के साथ रमेश घोपाल

आईएएस अधिकारी रमेश घोपल कहते हैं, आज मुझे अधिकारी बने हुए 10 साल हो गए हैं, बावजूद इसके अभी भी मेरी मां गांव में चूड़ी बेचने का काम करती है। वो कहती हैं, जिस व्यवसाय ने हमें इतना कुछ दिया, उसे कैसे छोड़ दूं...

जनज्वार। कुछ ही सरकारी अधिकारी ऐसे होते हैं, जो सरकारी नौकरी में दक्ष होते हुए भी समाजसेवा में बिना किसी स्वार्थभाव के लगे रहते हैं। ऐसे ही हैं झारखंड के कोडरमा जिले के उपायुक्त, रमेश घोलप। आईएएस अधिकारी घोलप अपनी कर्तव्य परायणता और सेवाभाव के लिए चर्चित हैं।

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के वारसी तहसील के महगांव में जन्मे रमेश घोलप का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही पिता का साया उठने के बाद घोलप का भरण पोषण मां ने किया। मां चूड़ियां बेचकर घर चलाती थीं। घोलप खुद 10 साल की उम्र तक मां के साथ उनका हाथ बंटाते थे। 2005 में इंटर की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने 2008 में टीचिंग में डिप्लोमा हासिल किया। शिक्षक की नौकरी की। उसी समय, शिक्षकों के आंदोलन का नेतृत्व करने के दौरान तहसीदार के पास जाना हुआ करता था। वहीं से मन में कौतूहल जागा और 2010 में यूपीएससी में 287 रैंक हासिल कर ही गांव लौटे।

रमेश घोलप कहते हैं, "बचपन गरीबी में गुजरा, गरीबी को समझता हूं। इसलिए लोगों का दुख और दर्द देखा नहीं जाता। जहां जितनी भी बन पड़ती है, लोगों की मदद करता हूुं। जब मैं खूंटी और बेरमो का एसडीओ था, तभी से बाल मजदूरी के खिलाफ मुहिम चला रहा हूं। कई बच्चों को इससे मुक्त कराया है, उनकी शिक्षा और उनके परिवार के जीविकोपार्जन की व्यवस्था की है।"

उन्होंने कहा कि ऐसे गरीब और बेसहारा बच्चों के उत्थान के लिए कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं। सिर्फ निगरानी करनी होती है। जरूरत पड़ने पर वह खुद भी उनका भार उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि वह अक्सर अपने सरकारी निवास पर जनता दरबार लगाते हैं। गरीब, बेसहारा और अनाथ बच्चों के लिए एक ही जगह से सारी समस्याओं के निदान का प्रयास करते हैं। यही नहीं, लोगों के लिए वृद्धावस्था और विधवा पेंशन, आधार कार्ड बनवाना व अन्य जरूरी सेवाएं भी तुरंत मुहैया कराई जाती हैं।

अपनी मां का जिक्र करते हुए घोलप कहते हैं, "आज मुझे अधिकारी बने हुए 10 साल हो गए हैं, बावजूद इसके अभी भी मेरी मां गांव में चूड़ी बेचने का काम करती है। वो कहती हैं, जिस व्यवसाय ने हमें इतना कुछ दिया, उसे कैसे छोड़ दूं।"

राज्य में घोलप अनाथ बच्चों का अभिभावक बन रहे हैं। उनकी पढ़ाई की व्यवस्था और पूरे जीवन की चिंता करते हुए उनके उज्‍जवल भविष्य के लिए भी व्यवस्था करते हैं।

कुछ ही दिनों पहले कोडरमा प्रखंड के छोटकी बागी, वार्ड नंबर-1 अंतर्गत एक निर्धन परिवार के घर मातम छा गया था। मां की मौत के बाद 5 बच्चे अनाथ हो गए। इस घटना की जानकारी जैसे ही उपायुक्त रमेश घोलप को मिली, उन्होंने तुंरत इसके लिए पहल की और इन अनाथ बच्चों के अभिवाहक बने।

उन्होंने इन बच्चों को कस्तूरबा एवं समर्थ विद्यालय में स्वयं जाकर एडमिशन कराया और इनके लिए सरकारी योजनाओं का लाभ सुनिश्चित कराया, ताकि भविष्य में इन्हें कोई दिक्कत न हो।

कोडरमा में उपायुक्त रहते हुए पिछले 12 महीनों में उन्होंने अपने कार्यों से गरीब और असहाय लोगों की मदद करने में मिसाल पेश की है। कई बार उनको आदिम जनजाति के बच्चों के साथ त्योहार मनाते देखा गया है। बिरहोर परिवारों के बच्चों के बीच स्कूल का सामान, मिठाइयां बांटते उनको आम तौर पर देखा जा सकता है।

हर मंगलवार और गुरुवार को कोडरमा उपायुक्त ऑफिस में फरियादियों की भीड़ लगती है। सैकड़ों लोग न्याय की आशा लिए आते हैं और उपायुक्त उनको ऑन द स्पॉट न्याय दिलवाते हैं।

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