Top
समाज

केरल में बाल यौन शोषण के मामलों से बरी होने की संख्या इतनी अधिक क्यों है?

Janjwar Desk
17 Nov 2020 5:24 PM GMT
केरल में बाल यौन शोषण के मामलों से बरी होने की संख्या इतनी अधिक क्यों है?
x
केरल में बाल यौन शोषण के ऐसे कई मामलों में बरी होने के पीछे पीड़ित बच्चे से दुश्मनी निभाना एक बड़ी वजह है, लेकिन वास्तव में यह एक सिस्टम है जो उन्हें विफल कर देती है...

हरीथा जॉन

केरल के कासरगोड जिले की रहने वाली आशिता जब 10 साल की थी तो उसने अपने एक शिक्षक को बताया कि वह इस बात से दुखी है कि जब उसके पिता नशे में होते हैं तो उससे किस तरह का व्यवहार करते हैं। जब इस मामले में चाइल्डलाइन और पुलिस भी शामिल हुई तो यह बात सामने आयी कि उसके पिता जब नशे में होते हैं तो उसका यौन उत्पीड़न करते हैं।

लेकिन, जब यह मामला कोर्ट पहुंचा तो उसने कहा कि उसके पिता उसे लाड़ प्यार करते हैं और उसके साथ सामान्य रूप से व्यवहार करते हैं। आशिता की स्कूल टीचर ने बताया कि जब मैंने उससे बाद में इस बारे में पूछा तो उसने कहा कि उसकी मां ने उसे अदालत में दुव्र्यवहार को लेकर गवाही देने को लेकर धमकी दी और कहा था कि उसके ऐसा करने पर उसके पिता उसे छोड़ देंगे, इससे परिवार में वह और उसकी दो छोटी बहनें अनाथ हो जाएंगी। उसकी मां ने उसे भरोसा दिलाया कि उसके पिता सिर्फ उस वक्त बुरे हैं जब वे नशे में होते हैं अन्यथा वे सबसे अच्छे हैं।

आशिता की टीचर चिंता जताती हैं कि वह और उसकी बहनें अभी भी अपने पिता के साथ रहती हैं, जो हर दिन शराब पीता है। आशिता से दूर पड़ोस के कन्नूर जिले में नौ वर्षीया दीया का एक 70 वर्षीय व्यक्ति ने यौन उत्पीड़न किया। वह बुजुर्ग व्यक्ति उस बागान के मालिका का पिता है, जिसमें उसके पिता काम करते थे। कुछ साल पहले एक केस दर्ज हुआ, लेकिन उसे अदालत में उसे ठीक से अपना बयान देने का मौका कभी नहीं मिला।

उस गांव के एक स्थायी निवासी जिन्होंने इस मामले की कानूनी लड़ाई को आगे बढाया कहते हैं, बागान मालिक ने दीया के पिता को पैसे और शराब की रिश्वत दी, साथ ही उसे यह धमकी दी कि वह उसे आग लगा देगा। बागान मालिक ने उसके परिवार को जमीन का एक टुकड़ा दिया, जहां उन्होंने घर बनाया था।

केरल में आशिता और दीया जैसे सैकड़ों बच्चे हैं जो यौन उत्पीड़न के शिकार हुए हैं और न्याय उनके लिए हाथ में न आने वाला साबित हुआ है। जनवरी 2020 से अगस्त तक केरल पुलिस के आंकड़ों के अनुसार 1900 से अधिक मामले पास्को एक्ट के तहत दर्ज किए गए हैं। मलप्पुरम में सबसे अधिक 248 मामले हैं और तिरुवनंतपुर में आठ महीने में 233 मामले दर्ज हुए हैं। 2019 में भी इतने ही मामले थे।

हालांकि चाइल्डलाइन द्वारा 2019 में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार 2013 से 2018 तक राज्य में पास्को अधिनियम के तहत सजा की दर सिर्फ 18 प्रतिशत थी। 1,255 मामलों में से केवल 230 मामलों में अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया। इसके अलावा जबकि पांच साल में 1255 मामले बंद हुए और हजारों मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं।

लंबे समय की जांच ने मामलों को कमजोर किया

वकील जे संध्या कहती हैं कि पास्को मामलों में आरोपी के बरी होने की सबसे बड़ी वजह पीड़ित का अपने बयानों पर कायम नहीं रहना है, क्योंकि सिस्टम पीड़ित को फिर से शिकार बनाता है और उस पर आघात करता है। संध्या बाल अधिकार आयोग की पूर्व सदस्य भी हैं। ऐसा नहीं है कि पीड़ित विरुद्ध हो जाते हैं, बल्कि सिस्टम ही बच्चों के प्रति शत्रुतापूर्ण हो जाता है।

संध्या कहती हैं कि विशेषज्ञ कहते हैं मामले में विलंब होना बच्चे को थका देता है। वे कहती हैं, कानून कहता है कि मामलों को एक साल के अंदर पूरा कर लिया जाना चाहिए। लेकिन, मुकदमे को पूरा करने में कई साल लग जाते हैं, जिससे पीड़ितों की मामले में दिलचस्पी कम हो जाती है।

असुरक्षित व कमजोर स्थितियों में रखे जाने के कारण पीड़ितों को भी अपने बयान बदलने पड़ सकते हैं। मल्लापुरम चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के पूर्व चेयरमैन मणिकंदन कहते हैं, एक बच्चा सिर्फ अपने परिवार के दबाव में अपना बयान बदलता है और उनके पास एक सपोर्ट सिस्टम नहीं होता है। बच्चों को ऐसे मामलों में आश्रय तभी दिया जाता है जब उनका शोषण उनके परिवार का कोई सदस्य करता है या वे अनाथ होते हैं। इसलिए जब वे उसी स्थिति में वापस जाते हैं तो फिर गड़बड़ियां होती हैं और ज्यादातर मामलों में परिवार बच्चों को घर ले जाने की पूरी कोशिश करता है।

वहीं, मल्लापुरम चाइल्डलाइन के समन्वयक अनवर करक्कादान कहते हैं कि लंबे समय तक मुकदमा भी अभियुक्त को पीड़ित को डराने या प्रभावित करने का मौका देता है। वे कहते हैं, आरोपी 90 दिनों तक जमानत पर बाहर रहते हैं, तो उससे पीड़ित को परिवार दबाव बनाने की मौका मिलता है। कई मामलों में अगर अभियुक्त पीड़ित परिवार का परिचित है तो उसे इससे उन्हें प्रभावित करने का मौका मिल जाता है। मामले का जल्द सुनवाई हो तो ऐसे मामले कम होने में मदद मिलेगी।

विशेषज्ञों की कमी, समझौतापरस्त संस्थान

पास्को केस के कई मामलों में जांच में विशेषज्ञता की कमी की आलोचना की गई है। संध्या चिह्नित करती हैं कि बाल यौन शोषण के मामलों से निबटने में हमारी जांच एजेंसियां कितनी प्रभावी हैं, इसको लेकर समस्याएं हैं। बिना खामियों के ऐसे मामलों में एक आरोप पत्र दाखिल करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए वालयार बहनों के मामलोें में दिखा, जिसमें जांच में विफलता थी।

दरअसल, वालयार मामले में दो महीनों में दो नाबालिग बहनें मृत पायी गईं थीं। संदेह था कि उनका यौन शोषण किया गया था, इस मामले में 2019 में अभियुक्तों को बरी कर दिया गया। उन्हें हाइकोर्ट के आदेश के बाद बेल पर बाहर आने से पहले मार्च 2020 में फिर से गिरफ्तार किया गया था।

संध्या कहती हैं कि हमारे पास पाॅस्को मामले में पूछताछ के लिए पुलिस की एक विशेषज्ञ शाखा नहीं है, जिसकी आवश्यकता है। तभी एक बेहतर जांच की जा सकती है और मजबूत चार्जशीट दायर की जा सकती है।

तिरुवनंतपुरम बाल कल्याण समिति के पूर्व अध्यक्ष फादर जोयस जेम्स कहते हैं कि विशेषज्ञता की कमी की ऐसे मामलों में भारी कीमत चुकानी होती है। ऐसे मामलों में हितधारकों के पास पाॅस्को एक्ट की कोई विशेषज्ञता नहीं है। मेडिकल परीक्षणों के बाद डाॅक्टरों की रिपोर्ट त्रुटिपूर्ण होती है और पुलिस के साथ ही ऐसा ही होता है। फिर सरकार बदलती है तो ऐसा ही सरकारी वकीलों के साथ होता है। पर, ऐसे मामलों से निबटने के लिए उनके पास पाॅस्को एक्ट की विशेषज्ञता नहीं होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे एक वजह अदालतों में की गई नियुक्तियों के पीछे राजनीतिक मंशा हो सकती है। वहीं, संध्या कहती हैं, पाॅस्को अदालतों में किसे नियुक्त किया जा रहा है, इससे फर्क पड़ता है। जब निर्णय बच्चों और उनके अधिकारो के बारे में किए जाते हैं तो यह महत्वपूर्ण होता है कि न्यायाधीश व अभियोजक के पास एक उचित दृष्टिकोण हो। हालांकि दुर्भाग्य से अधिकतर नियुक्तियां राजनीतिक हैं। अधिकतर अभियोजक की राजनीतिक संबद्धता है, जो ऐसे मामलों में एक समस्या बन जाती है।

मणिकंदन कहते हैं कि राजनीतिक रूप से की गई नियुक्तियों ने सीडब्ल्यूसी के उद्देश्य को पीछे छोड़ दिया है। वहीं, फादर जाॅच जेम्स का दावा है कि यह आवश्यक है कि संस्थान स्वतंत्र हों। वे कहते हैं, हमें बाल कल्याण समितियों की स्वतंत्रता बनाए रखने की आवश्यकता है। राजनीतिक दलों द्वारा संस्थानों का अपहरण किए जाने का परिणाम न्याय से वंचित होना होता है, जैसा ही मैंने वालयार बहनों के मामले में देखा था। अभियुक्तों के वकील को पलक्कड सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। वे कहते हैं, अगर सीडब्ल्यूसी अगर निष्पक्ष है तो कोई भी ऐसे मामलों में गड़बड़ी नहीं कर सकता है।

अदालत के भीतर अन्याय

ऐसे मामलों में अदालत के भीतर पीड़ित बच्चों व गवाह को पूछताछ के दौरान गहरे मानसिक आघात व पीड़ा से गुजरना पड़ सकता है, क्योंकि पूछताछ की तय लाइन के तहत उन चीजों को दोहराना पड़ सकता है। हाइकोर्ट के पूर्व जज कमाल पाशा कहते हैं, ऐसे में जजों को पाॅस्को मामलों की सुनवाई कैसी होनी चाहिए इस पर संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।

वे कहते हैं कि दुव्र्यवहार करने वालों के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि वह आसानी से बच्चों का मुंह बंद कराया जा सकता है, उन्हें धमकाया व डराया जा सकता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए अदालतों को इन मामलों में उदार रुख अपनाना चाहिए, जैसे कि जब बच्चे सही तरीके से बात नहीं कर सकते हैं या तारीखों या विवरणों को याद नहीं कर सकते हैं।

वे कहते हैं कि जब बच्चों से कई बार पूछताछ की जाती है तो वे गलत हो सकते हैं। वे पालाथाई मामले का उदाहरण देते हैं जहां एक स्कूल शिक्षक व स्थानीय भाजपा नेता पद्मराजन को नौ साल की एक लड़की के साथ यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यहां तक कि लड़की की सहपाठियों ने शिक्षक के खिलाफ बयान दिया था, लेकिन जब क्राइम ब्रांच ने इस केस को हाथ में लिया तो अदालत में दायर चार्जशीट में पाॅस्को के आरोप नहीं थे। लिहाजा, आरोपी को आसानी से जमानत मिल गई।

जस्टिस पाशा कहते हैं, पालाथाई मामले में बच्ची से कई बार पूछताछ की गई, जाहिर है ऐसे में उससे गलती हो सकती है। ऐसे में पास्को मामले में दिए जाने वाला संदेह का लाभ अन्य मामलों से अलग होना चाहिए। यहां एप्रिसिएशंस आॅफ एविडेंस अलग होना चाहिए।

पुलिस व जांच अधिकारी के सामने पहले दिए गए बयानों को बच्चों को कोर्टरूम में दोहराना आसान नहीं होता है। मणिकंदन कहते हैं कि ऐसे मामलों में जब बच्चे को को अदालत में एक साल में चार या पांच बार बुलाया जाता है, जिससे उन पर दबाव बनता है। इस बीच बच्चे की कस्टडी पाने के लिए रिश्तेदार हाइकोर्ट का रुख करते हैं और बच्चे घर पहुंचने के बाद परिवार द्वारा प्रभावित करने के कारण खुद को शत्रुतापूर्ण स्थिति में पाते है।

वे कहते हैं, दबाव बनाने के लिए हमने आरोपियों को पास्को मामलों से निबटने वाली एजेंसियों के खिलाफ हाइकोर्ट में एक शिकायत दर्ज कराते हुए देखा है। पीड़ित परिवार से बातचीत के बाद वे ऐसा करते हैं।

अनवर कहते हैं, हालांकि कुछ अदालतें बच्चों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं, अगर बच्चे के विपरीत स्थितियां हो जाती हैं तो फिर कुछ होता नहीं है। यदि बच्चा चुप रहता है तो बच्चों को कटघरे में बोलने के लिए बाध्य करने के प्रयास करने की जरूरत नहीं है।

बाल सहायता और फाॅलोअप

बाल यौन शोषण के मामले में परिप्रेक्ष्य में बदलाव की भी जरूरत है। जैसे कई चाइल्डलाइन समन्वयक बताते हैं कि पुरुष यौन शोषण लोगों को कम चिंतित करते हैं।

फादर जाॅय जेम्स कहते हैं, कई लोग बाल यौन शोषण के मामले को उनके अधिकार के रूप में नहीं बल्कि उनकी चैरिटी के रूप में देखते हैं, इस धारणा को बदलना होगा। दृष्टिकोण न्याय और अधिकारों पर आधारित होना चाहिए। वे इन मामलों में चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता पर भी जोर देते हैं।

वे कहते हैं, हमें पीड़ितों के साथ-साथ अभियुक्तों को मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है, ताकि बाद में ऐसे अपराधों को दोहराया नहीं जाए। सीडब्ल्यूसी बड़ी संख्या में ऐसे मामलों से निबटती है, जो प्रत्येक बच्चे को लगातार सहायता प्रदान करने में सक्षम नहीं है। प्रत्येक जिले में मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सकों व सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम ऐसे मामलों के लिए आवश्यक है।

मणिकंदन कहते हैं कि एक उचित ट्रैकिंग सिस्टम की आवश्यकता है। वे कहते हैं, पास्को मामलों में से केवल कुछ पर ध्यान दिया जाता है, ट्रायल के दौरान बच्चों के साथ-साथ आरोपी को फालो करने के लिए सिस्टम चाहिए। केवल कुछ पास्को केस नोटिस किए जाते हैं। जबकि दूसरे सैकड़ों ऐसे मामलों में फालोअप नहीं किया गया और नतीजतन आरोपी बरी हो जाती है और किसी को परेशन नहीं किया जाता है।

अनवर अदालतों में उपयोग के लिए बच्चे के शुरुआती बयानों की रिकार्डिंग की आवश्यकता पर जोर देते हैं। वे कहते हैं, हमें बच्चों का बयान रिकार्ड करने क लिए एक प्रणाली की आवश्यकता है और इसे सबूत के रूप में माना जाना चाहिए। इसके अलावा हमें एफआइआर दर्ज करने से पहले बच्चे की चिकित्सा जांच कराने क लिए प्रणाली की आवश्यकता है, ताकि उसका विवरण भी इसमें शामिल हो जाएगा। वर्तमान में एफआइआर के बाद चिकित्सा परीक्षण किया जाता है।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पाॅस्को मामलों को हैंडल करने वाले जांचकर्ताओं, न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों को उचित प्रशिक्षण से गुजरना चाहिए।

न्यायमूर्ति पाशा कहते हैं, हमें न्यायाधीशों और सरकारी वकीलों को विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। बच्चे को अदालत के अंदर एक सहायक माहौल मिलना चाहिए। पाॅस्को मामलों को संभालने वाले न्यायालयों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए।

आलेख में पीड़ितों के नाम परिवर्तित हैं।

(द न्यूज मिनट्स डाॅट काॅम में प्रकाशित मूल आलेख से अनूदित।)






Next Story

विविध

Share it