Up Election 2022

Janjwar Ground Report: बुन्देलखण्ड में वर्चुअल रैलियों की बाधाएं, विपक्षी दलों के सामने ये होंगी चुनौतियां

Janjwar Desk
11 Jan 2022 4:56 AM GMT
Janjwar Ground Report: बुन्देलखण्ड में वर्चुअल रैलियों की बाधाएं, विपक्षी दलों के सामने ये होंगी चुनौतियां
x

Janjwar Ground Report: बुन्देलखण्ड में वर्चुअल रैलियों की बाधाएं, विपक्षी दलों के सामने ये होंगी चुनौतियां

Janjwar Ground Report: पांच राज्यों के लिए विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और चुनाव आयोग के अब तक के निर्देशों व संकेतों से साफ है कि राजनीतिक दलों के अधिकांश आयोजन वर्चुअल यानी डिजिटल माध्यम से किये जायेंगे।

लक्ष्मी नारायण शर्मा की रिपोर्ट

Janjwar Ground Report: पांच राज्यों के लिए विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है और चुनाव आयोग के अब तक के निर्देशों व संकेतों से साफ है कि राजनीतिक दलों के अधिकांश आयोजन वर्चुअल यानी डिजिटल माध्यम से किये जायेंगे। चुनावी सभाओं से लेकर कार्यकर्ता सम्मेलन तक, अधिकांश आयोजन वर्चुअल ही आयोजित होंगे। चुनावी मैदान में उतरने वाले सभी दलों ने डिजिटल माध्यमों से मतदाताओं और कार्यकर्ताओं तक पहुंचने की कवायद शुरू भी कर दी है लेकिन उन दलों को अभी अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनके पास तकनीकी संसाधनों की कमी है और जिनके मतदाता वर्ग तक इंटरनेट और एंड्रॉयड मोबाइल की पहुंच कम है। उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड अंचल में डिजिटल असमानता की समस्या एक बड़ा मसला है, जिस कारण हर दल अपने सम्भावित मतदाता तक पहुंच सके, उनके लिए यह एक बड़ी चुनौती और चिंता है।

संसाधनों की असमानता

उत्तर प्रदेश के सात जिलों में फैले बुन्देलखण्ड अंचल की बहुतायत आबादी ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में निवासी करती है। कुछ क्षेत्र नदियों के किनारों पर बसे हैं तो कुछ जंगलों के आसपास। इन क्षेत्रों तक इंटरनेट, बिजली और एंड्रायड मोबाइल सेट, लैपटॉप व अन्य तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता शहरों की तुलना में बेहद कम है। इंटरनेट के मामले में भी काफी असमानता है। शहर से दूरदराज रहने वाले लोग अधिकांश समय नेटवर्क कमजोर होने से परेशान दिखाई देते हैं। डाटा महंगा होना भी एक बड़ी समस्या है। एक, डेढ़ और दो जीबी प्रतिदिन के प्लान चुनावी मौसम में अपर्याप्त हैं। वर्चुअल रैली के समय के हिसाब से यह डाटा अपर्याप्त है। ग्रामीण क्षेत्रों में एंड्रॉयड मोबाइल सेट की उपलब्धता का आंकलन भी राजनीतिक दल नए सिरे से कर रहे हैं और इस लिहाज से विपक्षी दलों को इस बात की खास चिंता है कि वे अपने मतदाताओं तक किस तरह पहुंच बना सकेंगे। सत्ताधारी दल इस मामले में कुछ अधिक निश्चिंत दिखाई दे रहा है। इसका कारण यह है कि कोविड काल में विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों से सम्पर्क करने और उनसे जुड़े आयोजनों के दौरान उन्होंने तमाम तरह की बारीकियां सीख लीं। बड़े पैमाने पर सरकारी बैठकें व पार्टी की निरंतर गतिविधियाँ भी भाजपा वर्चुअल माध्यम से करती रही है। विपक्ष इस स्तर पर कुछ खास तैयारी कर पाने में असफल रहा।

ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी संसाधनों का अभाव

समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व में झाँसी सदर विधान सभा सीट से चुनाव लड़ चुके सीताराम कुशवाहा जनज्वार से बात करते हुए कहते हैं कि कोविड काल में सभी दलों की यह जिम्मेदारी बन जाती है कि हम अपने नागरिकों का बचाव करें लेकिन जहां तक वर्चुअल माध्यम से सभाओं का सवाल है तो देश में और प्रदेश में जिस दल की सरकार है, वह काफी पहले से इस विषय पर काम कर रही थी। सत्ता में होने के कारण हर साधन है उनके पास लेकिन विपक्ष के पास न तो उतने साधन हैं न ही उतने साधन जुटा सकते हैं। आज भी 70 से 80 प्रतिशत जनता देहात में रहती है। इनमें 20 से 30 प्रतिशत लोग होंगे, जिनके पास ये साधन मुहैया होंगे जिससे किसी पार्टी का नेता उन तक अपनी बात पहुंचा सके। बाकी 35 से 40 प्रतिशत लोग है जो इस विषय से पूरी तरह अंजान हैं। ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि हर पार्टी के नेता को अपनी बात बराबरी से रखने का मौका दिया जाए क्योंकि सरकारी संसाधन सबके होते हैं।

चुनावी राज्यों में सबको मिले मुफ्त डाटा

किसान रक्षा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गौरी शंकर विदुआ इस मसले पर कहते हैं कि पैसे वालों ने राजनीति पर कब्जा कर लिया है। हमारे जैसे छोटे दलों को चुनाव लड़ना मुश्किल होता है। वर्तमान माहौल में रैलियां और सभाएं वर्चुअल होंगी। ग्रामीण क्षेत्रों में कितने लोगों के पास फोर जी मोबाइल हैं। जहां गांव में खाने की व्यवस्था न हो, वहां लोग इतना महंगा डाटा कैसे रिचार्ज कराएंगे। बड़ी पार्टियों के पास संसाधन हैं। ये अपने लोगों तक मोबाइल पहुंचा सकते हैं और उन तक डाटा पहुंचा सकते हैं। चुनाव आयोग के सामने सभी पार्टियां बराबर होनी चाहिए। जिन राज्यों में चुनाव होना है, उनमें चुनाव के दौरान लोगों तक मुफ्त डाटा पहुंचना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम सचिवालय में एक बड़ी स्क्रीन लगाकर सभी प्रत्याशियों को समानता से अपनी बात रखने का समय देना चाहिए। जिस तरह की व्यवस्थाएं हो रही हैं, वह हमारे लिए उचित नहीं हैं। चुनाव आयोग ऐसी व्यवस्था करे जिससे हमें भी उतना अवसर मिले मतदाताओं तक पहुंचने का जितना अवसर बड़ी पार्टियों को मिलता है। अन्यथा यह असमानता होगी।

सबकी समान भागीदारी की हो व्यवस्था

वरिष्ठ पत्रकार दीपक चंदेल कहते हैं कि बुन्देलखण्ड की आर्थिक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यहां के लोगों का जीवन स्तर और रहन-सहन भी किसी से छिपा नहीं है। जहां तक वर्चुअल या डिजिटल रैलियों की बात हो रही है, इसमें सौ प्रतिशत लोग शामिल नहीं हो पाएंगे। कोई किसी राजनीतिक दल का समर्थक है लेकिन आर्थिक रूप से विपन्न है और डाटा रिचार्ज नहीं करवा सकता है तो ऐसे में वह किस तरह वर्चुअल रैली में शामिल हो सकेगा। ऐसी स्थिति में जो राजनीतिक दल आर्थिक रूप से सक्षम है, वे अपने समर्थकों तक डाटा भी पहुचायेंगे और मोबाइल भी पहुचायेंगे। दूसरी ओर जो सिद्धांतों की राजनीति पर चलते हैं और इतना खर्च नहीं कर सकते, वे अपने समर्थक तक कैसे पहुंचेंगे। इस पर चिंतन-मनन बेहद जरूरी है। इंटरनेट की उपलब्धता भी एक समस्या है। कई बार तो शहर से तीस किलोमीटर की दूरी पर ही नेटवर्क नहीं मिलता जबकि इस जनपद की सीमा एक सौ बीस किलोमीटर दूर तक फैली हुई है। चुनाव आयोग, सरकार और राजनीतिक दलों को इस विषय पर चिंतन करना चाहिए जिससे प्रत्येक मतदाता चुनाव में अपनी शत प्रतिशत भागीदारी निभा सकें।

Next Story

विविध

Share it